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रोखठोक : जब महाराष्ट्र का अपमान होता है

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक 

विश्वासघात और मतभेद की राजनीति महाराष्ट्र में चल रही है। शिवछत्रपति के बाद उनका अभिमान बोला तो सिर्पâ लोकमान्य तिलक और बालासाहेब ठाकरे के मुख से। उसके बाद महाराष्ट्र को ऐसा नेता नहीं मिला। अब तो राज्य दिल्ली के आगे झुकनेवाले सेवकों के हाथ में चला गया है। यह बकवास ही है!

इतिहास की पुनरावृत्ति सतत होती रहती है। इसका एहसास दिलानेवाला काल फिलहाल महाराष्ट्र में चल रहा है। शिवाजी महाराज का नाम हम लेते रहते हैं। मराठों का मतभेद, घर के स्तंभ ही राज्य के लिए काल बन गए ऐसी अवस्था देखकर व्यथित मन से शिवाजी महाराज ने अपना शरीर रायगढ़ पर रख दिया। मतभेद और विश्वासघात की राजनीति उस दौर में भी चली थी। आज भी चल रही है। शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि व जयंती, राज्याभिषेक का उत्सव मनाने का अधिकार आज किसे है? चंद्रराव मोरे व गणोजी शिर्के की ही राजनीति अभी भी चल रही है। दिल्ली के बादशाह के दरबार में सिर नहीं झुकाना है इस महज एक अभिमान के मुद्दे पर शिवछत्रपति ने भरे मुगल दरबार में प्राणों की परवाह किए बगैर मराठों की अस्मिता की दिव्य खोज का प्रदर्शन किया। उस दिल्ली के आज के दरबार में ‘हमारे महाराष्ट्र को ही नष्ट कर दो!’ कहते हुए मराठे ही शिष्टमंडल लेकर जा रहे हैं। शिवसेना से एक गुट दिल्ली ने तोड़ दिया। वही असली शिवसेना है, ऐसा आभास कराया जा रहा है। शिंदे गट का उल्लेख श्री देवेंद्र फडणवीस ‘शिवसेना’ के रूप में करते हैं। आपका उद्धव ठाकरे से व्यक्तिगत बैर है इसे समझ सकते हैं, परंतु टूटे हुए गुट को शिवसेना कहकर संबोधित करना बालासाहेब ठाकरे से बेईमानी है। विधायक, सांसद टूट गए इस पर आज किसी को भी हैरानी नहीं हो रही है। व्यक्तिगत स्वार्थ, सत्ता की अभिलाषा से ग्रस्त मुट्ठीभर लोग सत्ता के बिना मानो कोई देश सेवा नहीं, ऐसी व्याकुलता के साथ एक समूह की ओर भाग रहे हैं। इसका सर्वाधिक हर्ष भाजपा और वर्तमान दिल्ली दरबार को हो रहा है। मुगलों में सभी मराठे शामिल हो गए, ऐसा ही यह मामला है। शिवाजी राजे ‘मराठा’ थे इसलिए अधिक अभिमान करनेवाले मराठा समाज के कई नेताओं ने (लोगों ने नहीं!) महाराष्ट्र की तौहीन की है।
राष्ट्रवादी के साथ कौन?
शिवसेना ने राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। यह शिंदे गुट के कुछ सरदारों को नागवार गुजरा व उन्होंने इस दिव्य विचार को सार्वजनिक तौर पर कहकर प्रदर्शित किया। लेकिन उनका ज्ञान कच्चा है। वर्ष २०१९ में भाजपा ने ही राष्ट्रवादी के साथ गठबंधन करके सत्ता स्थापना का प्रयास किया था। जैसे शिंदे टूट गए, उसी तरह राष्ट्रवादी से अजीत पवार टूटे थे। राष्ट्रवादी के साथ भाजपा की सरकार स्थापित की जानी थी लेकिन इस वजह से राष्ट्रवादी के कारण भाजपा खत्म हो जाएगी अथवा खत्म हो गई, ऐसा शोर भाजपाई विधायकों ने नहीं मचाया। भाजपा और राष्ट्रवादी की सरकार तब बनी होती तो क्या वह प्राकृतिक युति होती? राजनीति में प्राकृतिक और अप्राकृतिक ऐसा कुछ भी नहीं होता है। वर्ष २०१४ में भाजपा और शिवसेना ने अलग-अलग विधानसभा चुनाव लड़ा। परिणाम के बाद सरकार स्थापना में विलंब हुआ तब राष्ट्रवादी के नेता प्रफुल्ल पटेल ने खुद सामने आकर सरकार स्थापना के लिए भाजपा को समर्थन दिया और भाजपा ने उस समर्थन को तब नकारा नहीं था। भाजपा व श्री मोदी को राष्ट्रवादी कांग्रेस व श्री शरद पवार से बैर कभी भी नहीं था। हिंदुत्व के मुद्दे पर जो विधायक शिंदे गुट में गए हैं उनमें से दीपक केसरकर, उदय सामंत ये विधायक तो पवार की ही पाठशाला से प्रमाणपत्र और लिविंग सर्टिफिकेट लेकर शिवेसना में आए। उन्हें राष्ट्रवादी से इतना द्वेष क्यों होना चाहिए? यहां नैतिकता का विषय नहीं है, बल्कि राजनीतिक स्वार्थ अधिक है। दुविधा की राजनीति शिवराय के महाराष्ट्र को शोभा नहीं देगी। शिवाजी राजा ने जय सिंह से संधि और जोड़-तोड़ किया, परंतु दिल्ली के बादशाह के दरबार में सिर नहीं झुकाया। दिल्ली और महाराष्ट्र का नाता हमेशा संघर्ष का ही रहा है। बल्कि एक बात हम भूल जाएं, ये चलेगा नहीं कि महाराष्ट्र का नेतृत्व स्वतंत्र रूप से बड़ा बने इसे दिल्ली ने कभी भी स्वीकार नहीं किया। उनकी छाया व आश्रय में ही आप रहें, ऐसी उनकी अपेक्षा है। संयुक्त महाराष्ट्र के निर्माण के समय से मुंबई, बेलगाव के सवाल तक महाराष्ट्र की शक्ति नहीं बढ़ेगी, ऐसा प्रयास दिल्ली ने लगातार किया है। श्री उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की हैसियत से राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व कर सकते हैं, भविष्य में उनकी चुनौती खड़ी हो सकती है इस भय से शिवसेना को तोड़ दिया व उद्धव ठाकरे के पैर खींचे, यही सच्चाई है। देवेंद्र फडणवीस का नेतृत्व राष्ट्रीय स्तर पर बढ़े नहीं इसलिए उन्हें शिंदे के मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री का पद स्वीकार करने को मजबूर किया, ऐसी चर्चा खुद भाजपा में ही है। सच-झूठ दिल्ली ही जानती है!
एक ही एजेंडा!
शिवसेना तोड़ी जाए और महाराष्ट्र को कमजोर किया जाए, इस एक ही एजेंडे पर फिलहाल काम चल रहा है। इस साजिश में खुद को बालासाहेब ठाकरे का शिवसैनिक कहनेवाले लोग शामिल हो गए। ये उचित नहीं है। महाराष्ट्र की महानगरपालिका के चुनाव अक्टूबर महीने में होंगे इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनाव मुंबई का होगा। शिंदे गुट की मदद से भाजपा को मुंबई पर से मराठी छाप मिटानी है। महापालिका पर शिवसेना का भगवा झंडा है, उसे उतारना है। शिंदे गुट को यह स्वीकार है क्या? शिवछत्रपति के बाद उनके अभिमान बोला तो सिर्फ लोकमान्य तिलक और बालासाहेब ठाकरे के मुख से। उसके बाद महाराष्ट्र को ऐसा नेता नहीं मिला। पुराना दारुण सत्य एक बार फिर सिद्ध हो गया है इतना ही!
महाराष्ट्र की राजनीति का पूरी तरह बंटाधार होता दिख रहा है। उसमें शिवसैनिक कहलवाने वाले शामिल हो गए हैं, इसका दुख अधिक है।

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