मुख्यपृष्ठसंपादकीयरोखठोकरोखठोक : पांच राज्यों का मैच कौन जीतेगा?

रोखठोक : पांच राज्यों का मैच कौन जीतेगा?

संजय राऊत

अमदाबाद के ‘मोदी’ स्टेडियम में भारत वर्ल्ड कप की लड़ाई हारा तब महाशक्तिमान मोदी-शाह उस मैदान पर ही थे। दूसरी तरफ पांच राज्यों के विधानसभाओं का रणसंग्राम शुरू है। मोदी-शाह के सामने चुनौती गांधी और कांग्रेस हैं। कपट नीति का पाखंड शुरू है, लेकिन मोदी-शाह के लिए चुनाव आसान नहीं!
पांच राज्यों के चुनाव का परिणाम देश के लिए निर्णायक साबित होगा। लेकिन पांच राज्यों के परिणाम ‘मोदी स्टेडियम’ में वर्ल्ड कप नतीजों की तरह ही होगा, ऐसी हवा है। १० नवंबर को वर्ल्ड कप क्रिकेट मैच में भारतीय टीम की पराजय हुई। अंतिम मैच अमदाबाद में हुआ। भारतीय टीम जीतेगी ही इस आत्मविश्वास से प्रधानमंत्री मोदी व गृहमंत्री शाह अंतिम मैच देखने के लिए स्टेडियम पर उपस्थित थे। भारतीय टीम जीतेगी, प्रधानमंत्री मोदी के हाथों वर्ल्ड कप भारतीय टीम को देने का राजनीतिक समारोह संपन्न होगा और निश्चय किए हुए कि देशभर में भाजपा कार्यालयों के सामने विजय उत्सव मनाया जाएगा, ऐसा पूरा नियोजन था, लेकिन ऑस्ट्रेलियाई टीम ने ‘मिट्टी’ खाई नहीं ऐसे ही कहना पड़ेगा। उन्होंने ऐसा खेल खेला कि भारतीय जनता पार्टी के मंसूबों पर पानी फिर गया। पांच राज्यों के चुनाव के नतीजे एक जैसे होंगे क्या? प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह पिछले महीनेभर से राजधानी दिल्ली को रामभरोसे छोड़कर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के चुनावी दौरे में लगे रहे। देश के सामने कई समस्याएं हैं, लेकिन पांच राज्यों के चुनाव जीतना इससे आगे मोदी-शाह का मन घूमते हुए नहीं दिख रहा है। पांच राज्यों में भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं है। श्री मोदी १२ साल से ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा लगा रहे हैं, लेकिन उसी कांग्रेस का भूत बार-बार उनके सिर पर बैठता है। इसलिए बेजार हुई भाजपा और मोदी पांच राज्यों में हर तरह के जंतर-मंतर करते नजर आ रहे हैं। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी ने जब मोदी-शाह के सामने चुनौती खड़ी की, तब मोदी ने ‘गांधी’ को मात देने के लिए ईडी को मैदान में उतारा। कांग्रेस और गांधी परिवार के स्वामित्व वाले अखबार ‘नेशनल हेराल्ड’ की करीब छह सौ करोड़ की संपत्ति ईडी ने जब्त कर ली। यह आश्चर्य की बात है। ऐसा करके विधानसभा चुनाव में जीत मिलेगी, ऐसा उनका ‘व्यापारी’ दिमाग है।
अंधभक्तों की फसल
भाजपा में अंधभक्तों की फसल आ गई है, लेकिन यही अंधभक्ति देश की मारक है। मोदी को हमारा समर्थन हिंदुत्व के लिए है, ऐसा कहनेवाले सफेदपोश लोग मिलते हैं तब आश्चर्य होता है। जाति-धर्म में झगड़े, लोकतंत्र के पतन, एक ही उद्योगपति की संपत्ति बढ़ना इसे हिंदुत्व मानने वाले देश के शत्रु हैं। धर्म मतलब क्या है ये इन लोगों को समझा ही नहीं और अंधभक्त कहेंगे कि वो ‘धर्म’ इस तरह अब शुरू है। कौरवों और पांडवों का युद्ध धर्मयुद्ध था, ऐसा आज भी माना जाता है। कौरव-पांडवों में युद्ध से पहले युधिष्ठिर अकेले ही पैदल युद्धक्षेत्र पार करके सामने खड़े शत्रु सेना में खड़े हुए अपने सगे-संबंधियों से युद्ध करने का आदेश मांगने के लिए जाते हैं।
भीष्म पितामह को प्रणाम कर वो पूछते हैं, ‘मैं आपसे युद्ध करना चाहता हूं। मुझे युद्ध की आज्ञा और विजय का आशीर्वाद दीजिए।’
भीष्म पितामह उत्तर देते हैं, ‘इस युद्ध में मेरा शरीर दुर्योधन के पास रहेगा, क्योंकि मैंने उसका अन्न खाया है, लेकिन धर्म से भरा मेरा मन तुम्हारे साथ रहेगा। यह तुम्हारे कल्याण की कामना करेगा। तुम्हारे विजय की आकांक्षा रखेगा।’
युधिष्ठिर ने इसी प्रकार गुरु द्रोणाचार्य और कृपाचार्य को प्रणाम किया। आज ऐसे धर्म और योद्धा नहीं बचे हैं। अमदाबाद के ‘मोदी’ स्टेडियम में सरकार के भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य आकर बैठे, लेकिन प्रत्यक्ष मैदान में योद्धाओं के मन पर इतना दबाव बना कि, वे पराजित हो गए। भारतीय जनता पार्टी के विजय उत्सव की हुई तैयारी बर्बाद हो गई। इस देश में जो कुछ भी अच्छा हो रहा है वो केवल एक ही व्यक्ति के कारण, ऐसी अंधश्रद्धा भले ही पैâलाई गई फिर भी क्रिकेट वर्ल्ड कप हम जीत नहीं सके। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का परिणाम भी मोदी के पक्ष में लगेगा इसकी गारंटी नहीं है, क्योंकि कांग्रेस पार्टी अभी भी खत्म नहीं हुई है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी की छलांग शुरू है।
कांग्रेस है ही!
जिस ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा नरेंद्र मोदी ने दिया उस मोदी की लड़ाई कांग्रेस पार्टी के साथ ही है और पांच राज्यों में मोदी के सामने कांग्रेस की चुनौती है। मिजोरम और तेलंगाना राज्यों में भाजपा मुकाबले में ही नहीं है। तेलंगाना में भाजपा के मुकाबले में न होने से उन्होंने अपने मतदाताओं को संदेश दिया है कि तेलंगाना राष्ट्रीय पार्टी की तरफ मतदाताओं को घुमाओ। किसी भी हालत में कांग्रेस को जीतने मत देना। मोदी-शाह की अपेक्षा भीड़ राहुल और प्रियंका की सभाओं में हो रही है। एमआईएम, बसपा जैसे दलों से भाजपा की अंदरूनी मिलीभगत है, वो सिर्फ कांग्रेस को दिक्कत में लाने के लिए हैं। इसका मतलब मोदी के मन में कांग्रेस का भय कायम है। मध्य प्रदेश, राजस्थान ये दोनों राज्य महत्वपूर्ण हैं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के साथ दिल्ली के भाजपा नेताओं को वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पराजित करना ही है, लेकिन महिला मतदाताओं में शिवराज सिंह लोकप्रिय हैं। मध्य प्रदेश में मौजूदा समय में कोई भी लहर, विचार नहीं। घोषणा, आश्वासनों, पैसा और सरकारी मशीनरी के मुक्त इस्तेमाल पर चुनाव लड़ा गया। मध्य प्रदेश में जीत का अंतर बहुत ज्यादा नहीं, लेकिन निश्चित रूप से इतना तय है कि मध्य प्रदेश में मोदी-शाह के पसीने कांग्रेस ने छुड़ा दिए, राजस्थान में कांग्रेस का राज रहेगा या नहीं ये निश्चित नहीं, लेकिन महाशक्तिमान मोदी को जयपुर में डेरा डालना पड़ा। कांग्रेस पर हमले करने पड़े। राहुल गांधी पर आरोप लगाने पड़े यही कांग्रेस की ताकत है। राजस्थान में कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट में नहीं बनती थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में उनका मनोमिलन हुआ। पहले सत्ता, फिर झगड़ा ऐसा उन्होंने पैâसला किया। भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का महत्व राजस्थान की राजनीति में है और ३० विधानसभा उम्मीदवार अंतिम में ‘राजे’ के मन मुताबिक देने पड़े। क्योंकि झालावाड़ विभाग में कांग्रेस की चुनौती है और मोदी-शाह की अपेक्षा वहां ‘राजे’ का करिश्मा है।
राजस्थान में क्या होगा वह इस समय कोई कह नहीं सकेगा। ओपिनियन और एक्जिट पोल उड़ जाएंगे, ऐसी तस्वीर है। क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतना तय था। जीत के बाद जश्न की पूरी तैयारी की गई थी, लेकिन आखिर में मैदान पर नतीजा कुछ और निकला!
पांच राज्यों की विजय का कप कौन जीतेगा? इस पर ही २०२४ का भविष्य टिका है। देश में अच्छा ही हो यही अपेक्षा!

अन्य समाचार