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रोखठोख: महाभारत हो गई पर धर्मराज, भीष्म कहां हैं?

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक 

महाराष्ट्र में सीधे-सीधे महाभारत हुई। एक ही घर के लोग एक-दूसरे के सामने युद्ध के लिए खड़े हैं, ये सत्य है लेकिन यहां कोई भीष्म, कृपाचार्य व द्रोणाचार्य नहीं दिख रहे हैं। हारुन-अल-रशीद के पात्र महाभारत में नए सिरे से प्रगट हुए, इतना ही।
भारत के सामने यक्ष प्रश्न कौन से हैं और वो कैसे हल किए जाएं? इस पर कोई भी बात नहीं कर रहा है। चर्चा हो रही है तो महाराष्ट्र के अप्राकृतिक सत्ता परिवर्तन की। अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपया ‘८०’ तक नीचे गिर गया। एक डॉलर खरीदने के लिए हमें ८० रुपए गिनने पड़ रहे हैं। इसका मतलब भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से हिचकोले खा रही है। गैस सिलिंडर ५० रुपए महंगा हो गया इसलिए मध्यमवर्गीय परिवार त्रस्त है। और एक खबर आई है कि स्विस बैंक में हिंदुस्थानियों का काला धन २०,७०० करोड़ रुपए हो गया है। इसमें वृद्ध हुई है और अब इसके ३९,४६८ करोड़ रुपए तक होने की अधिकृत जानकारी सामने आई है। इसलिए अब नागरिकों के खाते में १५-१५ लाख नहीं, बल्कि ४० से ४५ लाख रुपए मोदी सरकार द्वारा जमा कराए जाएंगे, ऐसी उम्मीद रखने में कोई हर्ज नहीं है। काले धन का सैलाब वैâसे आया यह महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के माध्यम से देखने को मिला। गुवाहाटी की झाड़ियों का वर्णन करनेवाले विधायक शहाजी पाटील का एक डायलॉग फिलहाल सुर्खियों में है। उस पार्श्वभूमि में जालना के कांग्रेसी विधायक वैâलास गोरंट्याल द्वारा मारा गया ‘पंच’ उससे भी ज्यादा चमकदार है।

‘क्या झाड़ी,
क्या पहाड़ी,
क्या हॉटेल,
एकदम ओक्के!
यहां एक छोटे अल्पविराम के बाद गोरंट्याल फिर कहते हैं-
‘पचास खोके… पक्के!
एकदम ओक्के!’

इस सब पर अब लोगों के बीच खुलकर चर्चा होने लगी है। बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना हमारी ही है, ऐसा कहनेवालों की आत्मा इन खोखों में बंद है, ऐसा श्री गोरंट्याल कहते हैं, जो कि गलत नहीं है।

वेशांतर का ड्रामा!
एकनाथ शिंदे ने विधायकों के साथ जो बगावत की इसका भाजपा से संबंध नहीं है, ऐसा कहनेवाले भाजपाइयों की पोल खुल चुकी है। श्री शिंदे ने खुद ही पर्दे के पीछे की सारी साजिश विधानसभा में खोलकर रख दी और अब श्रीमती अमृता फडणवीस ने भी घर का गुप्त राज सार्वजनिक कर दिया है। ‘इस पूरे दौर में देवेंद्र फडणवीस रात-बिरात वेश बदलकर शिंदे से मिलने बाहर जाते थे।’ काला कोट, काला चश्मा, फेल्ट हैट इस तरह जेम्स बॉन्ड अथवा शेरलॉक होम्स जैसा वेश बनाकर वे बाहर निकलते रहे होंगे। उनके मुंह में सिगार वगैरह और हाथ में नक्काशीदार छड़ी होती थी क्या? इसका खुलासा होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी कपड़ों के व रूप बदलकर घूमने के शौकीन हैं, परंतु फडणवीस भी वही करने लगे। उन्होंने शिंदे से मिलने जाने के दौरान कई बार नकली दाढ़ी और मूंछें भी लगाई होंगी। इन तमाम रहस्यों से उनकी पत्नी श्रीमती अमृता फडणवीस ने पर्दा नहीं उठाया होता तो इस महान कलाकार से महाराष्ट्र का परिचय नहीं हुआ होता। श्रीमती फडणवीस का जितना आभार माना जाए उतना कम ही है। श्री मोदी का अनुकरण उनके लोगों को कितना करना चाहिए, ये देखें। श्री फडणवीस ने महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन कराने के लिए जो वेश बदला वो तमाम कपड़े और दूसरी सामग्री आनेवाली पीढ़ी के लिए किसी संग्रहालय में ही रखनी चाहिए। बगदाद के खलीफा हारुन-अल-रशीद कई बार वेश बदलकर अपने राज्य में रात में घूमते थे। परंतु वे क्यों घूमते होंगे? अपने राज्य का प्रशासन, सरदार प्रजा से सही बर्ताव कर रहे हैं न? प्रजा की समस्या क्या है? अपना शासन सुचारु ढंग से चल रहा है न? राज-काज करने के दौरान कोई हमें फंसा तो नहीं रहा है न? ये जानने के लिए। परंतु नागपुर व ठाणे के हारुन-अल-रशीद वेश बदलकर मिलते थे, तो बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना को तोड़ने की साजिश को अंजाम तक पहुंचाने के लिए। हारुन-अल-रशीद एक महान खलीफा होने के साथ-साथ बगदाद के लिए जिस तरह से अच्छे राजा थे उसी तरह चोर और लुटेरों की भी भरमार थी। ‘थीफ ऑफ बगदाद’ अथवा ‘अलीबाबा चालीस चोर’ की तमाम कहानियां एवं दंत कथाएं बगदाद से ही संबंधित हैं इसलिए महाराष्ट्र को मिले नए हारुन-अल-रशीद निश्चित तौर पर क्या करेंगे?

भैंसे की सच्चाई!
गुवाहाटी गए विधायकों को ‘भैंसा’ कहा गया इससे वे नाराज हो गए और उन्होंने इसी वजह से शिवसेना से बाहर निकलने की बात कहनी शुरू कर दी यह गलतफहमी है। ‘निठल्ला’ इस शब्द का प्रचार हमारे यहां आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता है। अत्रे-ठाकरे ने इनका सार्वजनिक सभाओं में इस्तेमाल किया है। भैंसा हिंदू संस्कृति का एक प्रतीक है। अन्य देवताओं की तरह मृत्यु के देवता यमदेव हैं। उनका वाहन भैंसा है। शिव के नंदी जितना ही भैंसे का हिंदू संस्कृति में महत्व है। ये भाजपा के नवहिंदुत्ववादी भूल गए हैं, ऐसा प्रतीत होता है। ज्ञानेश्वर ने ‘वेद’ बुलवाने के लिए भैंसे को ही चुना। ‘यम’ को धर्मराज, सूर्यपुत्र ऐसे कई नामों से जाना जाता है। ‘यम’ को ‘काल’ के रूप में भी जाना जाता है और भैंसे के बिना उस काल का कोई महत्व नहीं है। हिंदुत्व का यह अध्याय है। शिवसेना छोड़कर अलग गुट में गए विधायकों को हिंदुत्व का यह अध्याय समझ लेना चाहिए। कौरव-पांडव के युद्ध में पहले युधिष्ठिर अकेले ही पैदल युद्ध का मैदान पार करके सामने युद्धसेना में खड़े अपने सगे-संबंधियों से युद्ध करने के संबंध में आज्ञा लेते हैं। भीष्म पितामह को प्रणाम करके पूछते हैं, ‘मुझे आपसे लड़ना है। युद्ध की आज्ञा और विजय का आशीर्वाद दें।’ भीष्म पितामह जवाब देते हैं, ‘इस युद्ध में मेरा शरीर दुर्योधन के साथ रहेगा क्योंकि मैंने उसका अन्न खाया है, परंतु धर्म से युक्त मेरा मन तुम्हारे साथ रहेगा। वह तुम्हारे मंगल की कामना करेगा। तुम्हारी जीत की आकांक्षा रखेगा।’ युधिष्ठिर ने इसी प्रकार गुरु द्रोणाचार्य व कृपाचार्य की भी वंदना की।
महाभारत का यह भाग सबसे श्रेष्ठ है! आज की महाभारत में सामने कोई भीष्म नहीं, कृपाचार्य और द्रोणाचार्य नहीं है!
कौरव भी नैतिकता व अन्याय पर प्रवचन झाड़ रहे हैं। यही नई महाभारत का दुर्भाग्य है! यही देश के समक्ष वास्तविक यक्ष प्रश्न है!!

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