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रोखठोख : महाराष्ट्र में सियासी पेच : कानून के पचड़े में लोकतंत्र!

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक 

महाराष्ट्र विधानसभा के १६ बागी विधायकों का क्या होगा? सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई होने तक यह कानूनी पेच बरकरार रहेगा। लोकतंत्र के तमाम मंदिर किस कदर भ्रष्ट हो गए हैं और मंदिर के ट्रस्टी ही कलश काटकर ले जाते हैं, तब न्यायालय ही लोकतंत्र का रखवाला सिद्ध होता है!

महाराष्ट्र में आज जितना राजनीतिक पेच कभी भी निर्माण नहीं हुआ था। पूरा राज्य ही कानून के पेच में फंस गया है। एकनाथ शिंदे के गुट में शामिल हुए १६ विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय १ अगस्त तक के लिए आगे टालकर सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के पेच को बरकरार रखा है। उन १६ विधायकों में खुद मुख्यमंत्री शिंदे हैं। श्री शिंदे मंगलवार को दिल्ली पहुंचे व उन्होंने लोकसभा के १२ बागी सांसदों का स्वागत किया। विधायकों के साथ-साथ शिवसेना के सांसद भी टूट गए, ऐसा दृश्य राष्ट्रीय स्तर पर निर्माण किया। महाराष्ट्र विधानसभा के जो सदस्य शिवसेना से बाहर निकले उनका एक ही तर्क है मतलब हमारी ही शिवसेना असली है। हमने शिवसेना नहीं छोड़ी है! उनकी यह भूमिका चमड़ी बचानेवाली है। संविधान आखिरकार इंसानों के लिए होता है। इंसान संविधान के लिए नहीं होते हैं। संविधान के दसवें शेड्यूल के अनुसार १६ बागी विधायक सीधे-सीधे अयोग्य ठहराए जाएंगे। सरकार बचाने व शिवसेना को स्थायी तौर पर खत्म करने के लिए १६ अयोग्य विधायकों को केंद्र सरकार में बैठे लोग बचा रहे हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ क्या निर्णय लेती है इस पर अब देश और लोकतंत्र का भविष्य निर्भर है।
लोकतंत्र का भविष्य
हिंदुस्थान के लोकतंत्र का भविष्य किस कदर अंधकारमय हो गया है, ऐसा अनुभव रोज ही देखने को मिल रहा है। देश के मुख्य न्यायाधीश श्री रमन्ना ने जयपुर में एक कार्यक्रम के दौरान लोकतंत्र व संसद के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त की। विपक्ष की जगह भी सत्ताधारियों को हथियानी है, यह दृश्य घातक है। ऐसा मुख्य न्यायाधीश रमन्ना जब सार्वजनिक तौर पर कहते हैं तो डर लगता है। लेकिन तानाशाही और सर्वसत्तावाद का कितना भी तांडव मचा लिया जाए, परंतु लोकतंत्र इस देश में मरेगा नहीं। कुछ साल पहले ‘भारतीय लोकतंत्र का भविष्य’ इस विषय पर एक सर्वदलीय परिचर्चा का आयोजन किया गया था। उसमें विट्ठलराव गाडगिल सहित कई नेता मौजूद थे। गाडगिल से पहले बोलनेवाले नेताओं ने लोकतंत्र के भविष्य को लेकर निराशाजनक राग अलापा। ‘हमारा लोकतंत्र अंतत: आखिरी सांसें ले रहा है। हमारा लोकतंत्र आईसीयू में है, कोमा में है।’ किसी ने कहा, लोकतंत्र की शव यात्रा निकल रही है। इन सभी के बाद श्री गाडगिल भाषण के लिए खड़े हुए और उन्होंने एक अच्छी बात कही, ‘एक वृद्धा थी। वह गरीब थी। एक जर्जर झोपड़े में रहती थी। उसके झोपड़े के बाहर एक आम का पेड़ था। उस पेड़ के आम बेचकर वह अपना पेट पालती थी। लेकिन उसके पड़ोसी वो आम चुराने लगे। वह और भी गरीब हो गई। एक दिन एक साधु उसकी झोपड़ी में आया और बोला, ‘माताजी मैं भूखा हूं। मुझे कुछ खाने के लिए दो।’ वृद्धा बोली, ‘मैं गरीब हूं। मेरे पास एक ही रोटी है। मैं उसमें से आधी आपको खाने के लिए देती हूं।’ साधु ने आधी रोटी खाई, पानी पीया और प्रसन्न हो गया। वह उससे बोला, ‘माई तू गरीब होगी परंतु तुझमें वास्तव में मानवता है। तुमने मुझे अपनी आधी रोटी दी। मैं प्रसन्न हूं। तुम मुझसे वर मांगो।’
वृद्धा बोली, ‘मुझे ऐसा वर दो कि मेरे पड़ोसी आम चुराने आएं तो उनके पेड़ को हाथ लगाते ही वे पेड़ से चिपककर लटकते रहें और मेरी आज्ञा के बिना नहीं छूटें।’ साधु ने कहा, ‘तथास्तु!’ अगले दिन सुबह उसे आठ-दस पड़ोसी आम के पेड़ में चिपके दिखे। सभी चिल्ला रहे थे, ‘माताजी छुड़ाओ! माताजी छुड़ाओ! दोबारा पेड़ को हाथ नहीं लगाएंगे।’ ऐसा उनके द्वारा कबूल करने पर वृद्धा ने उन्हें छोड़ दिया।
कुछ और वर्ष बीते। वृद्धा और बूढ़ी हो गई। उसकी मृत्यु का समय करीब आया। उसकी मृत्यु का दिन आ गया। एक दिन यमराज उसे लेने आए। वह यमराज से बोली, ‘मुझे और कुछ दिन जीने दो!’ यमराज ने कहा, ‘नहीं, यह संभव नहीं है क्योंकि तुम्हारे भाग्य में मृत्यु का दिन आज ही लिखा है इसलिए तुम्हें आज ही ले जाना होगा। परंतु तुम्हारी कोई आखिरी इच्छा होगी तो बताओ।’
वृद्ध होशियार थी। उसने कहा, ‘मेरी झोपड़ी के बाहर मेरा एक आम का पेड़ है। मरने से पहले उसका एक आम खाना चाहती हूं।’ आम लाने के लिए यमराज खुद पेड़ के पास गए। पेड़ को स्पर्श करते ही यमराज पेड़ से चिपक गए और चिल्लाने लगे, ‘माताजी छुड़ाओ, माताजी छुड़ाओ।’ वृद्धा बोली, ‘एक शर्त पर छुड़ाऊंगी। जब मेरी इच्छा होगी तभी मैं मरूंगी। मुझे इच्छा मृत्यु का वरदान दोगे तभी छुड़ाऊंगी।’ यमराज ने कहा, ‘तथास्तु!’
इसलिए वह वृद्धा अभी भी जीवित है और वह कभी भी मरेगी नहीं। उसका नाम है- ‘हिंदुस्थानी लोकतंत्र!’
भारतीय लोकतंत्र का दृश्य आज भी बदला नहीं है। वह पूर्ववत ही है।
ये क्यों हुआ?
महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन ने लोकतंत्र के मूल्यों को नष्ट कर दिया। ये केंद्र के शासक मानने को तैयार नहीं हैं। विधायक तोड़े और सांसद भी तोड़े। उद्धव ठाकरे ने मोदी-शाह के खिलाफ जाकर सरकार बनाई। उसका बदला अंतत: शिवसेना तोड़कर लिया गया। तेलंगाना के के.सी. चंद्रशेखर राव व झारखंड के हेमंत सोरेन की सरकारें भी भविष्य में इसी तरह से पीसी जाएंगी। सोरेन के निकटवर्तियों के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों के छापे पड़ने लगे हैं। उसी दौरान जिनके खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों के प्रकरण चल रहे थे, ऐसे शिवसेना के बागी विधायक, सांसदों को तमाम जांचों से मुक्त कर दिया गया। अब उन्हें सुकून  की नींद आती है। ईडी, सीबीआई उनकी चौखट पर नहीं जाएगी। समान न्याय की नीति कितने गलत ढंग से चलाई जा रही है, यह साफ दिखता है। भारतीय लोकतंत्र जीवित है लेकिन वह किसी की तो आज बुटिक है।

ऐसा दृश्य क्या कहता है?
शिवसेना के १२ सांसद अलग हुए और उन्होंने अलग गुट स्थापित किया। मूल शिवसेना से वे सीधे बाहर निकल गए इसलिए दल-बदल विरोधी कानून उन पर भी लागू होता है। शिवसेना के लोकसभा के गुट नेता विनायक राऊत द्वारा विभाजन समर्थकों के संदर्भ में दिए गए पत्र पर बिल्कुल भी ध्यान दिए बगैर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अलग हुए गुट को मान्यता दे दी और कानूनी अड़चनों के बगैर किस कदर टूटा जाए इस संदर्भ में व्यवस्थित मार्गदर्शन किया। इतिहास में यह घटना दर्ज होगी। विधानसभा व लोकसभा लोकतंत्र के शक्ति स्थल हैं। महाराष्ट्र के विधानसभा अध्यक्ष ने नई सरकार स्थापित होते ही संविधान को रौंदा। लोकसभा में भी उससे अलग दृश्य नहीं दिखा। मंदिर की दानपेटी पुजारी द्वारा लूटी जाए, मंदिर का कलश मंदिर के ट्रस्टी ही काटकर ले जाएं, ऐसी ही घटना देश में लोकतंत्र के सभी मंदिरों में घट रही है। फिर भी लोग श्रद्धा के साथ मंदिर में जाते हैं और मूर्ति के समक्ष नाक रगड़ते हैं।
राष्ट्रपति क्या करेंगे?
यह मजमून प्रकाशित होने के बाद देश को नया राष्ट्रपति मिल गया होगा। ओडिशा की आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति की हैसियत से विराजमान हो जाएंगी। श्रीमती मुर्मू की अपनी कोई राय अथवा विचार है क्या? उन्हें सार्वजनिक तौर पर बोलते हुए अभी तक किसी ने नहीं देखा है। देश की वर्तमान स्थिति पर निवर्तमान राष्ट्रपति श्री कोविंद ने कभी टिप्पणी नहीं की। द्रौपदी मुर्मू भी कुछ बोलेंगी क्या? नहीं बोलनेवाले, कार्य नहीं करनेवाले और आंख बंद करके सब कुछ सहन करनेवालों के समक्ष भारतीय लोकतंत्र विवशता के साथ खड़ा है। यह जीवंत इतना ही। दूध, दही, अनाज, स्टेशनरी आदि सभी पर सरकार ने ‘जीएसटी’ लगा दिया है। यह कांग्रेस के दौर में हुआ होता तो भारतीय लोकतंत्र उफान मारकर सड़क पर उतर आया होता। आज वह वृद्धा आम के पेड़ से चिपकी पड़ी है। ‘मुझे मुक्त कराओ, मुझे बचाओ’, ऐसा उसका क्रंदन चल रहा है।
लोकतंत्र जीवित है, परंतु वह मरणासन्न हो गया है।

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