मुख्यपृष्ठस्तंभसामना एंकर: तालिबानी फरमान, हिंदू-सिख नहीं मनाएंगे दिवाली-लोहड़ी का त्योहार!

सामना एंकर: तालिबानी फरमान, हिंदू-सिख नहीं मनाएंगे दिवाली-लोहड़ी का त्योहार!

महिलाएं पहनेंगी बुर्का

एजेंसी / नई दिल्ली

अफगानिस्तान में अमेरिका और उसके साथियों को पीटकर भगाने का दावा करने वाला तालिबान अब फिर पुराने रंग दिखाने लगा है। तालिबान ने अफगानिस्तान के हिंदू और सिख जैसे अल्पसंख्यक समुदायों पर शिकंजा कसते हुए फरमान जारी किया है कि वे अपने दिवाली-लोहड़ी जैसे त्योहार नहीं मनाएंगे। त्योहार मनाना भी है तो अपने घर में ही मनाएंगे। अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए भी मुस्लिम महिलाओं की तरह सिर से पैर तक पूरा शरीर ढकने वाला बुर्का पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके अलावा भी तमाम ऐसे प्रतिबंध अल्पसंख्यक समुदायों पर थोपे जा रहे हैं, जिससे वे अफगानिस्तान छोड़कर भाग जाएं या इस्लाम में धर्म परिवर्तन करा लें।

खोखले साबित हुए तालिबानी वादे
आईएएनएस की रिपोर्ट के मुताबिक, साल २०२१ में अफगानिस्तान की सत्ता टेकओवर करते समय तालिबान ने धार्मिक स्वतंत्रता के वादे किए थे, लेकिन उसी दौरान हिंदू और सिख परिवारों ने बड़े पैमाने पर अफगानिस्तान से पलायन किया था, जो बेहद चर्चा का विषय भी बना था। तब तालिबान ने भारत से कूटनीतिक रिश्ते बनाने के लिए हिंदुओं व सिखों के देश छोड़ने पर एतराज जताया था और उनकी सुरक्षा का वादा किया था, जो अब पूरी तरह से खोखले साबित हुए हैं।

चोरी-छिपे पलायन कर रहे हैं हिंदू
रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान शासन में हिंदुओं और सिखों की हालत समाज के सबसे निचले तबके जैसी हो गई है। उनके सार्वजनिक रूप से अपनी धार्मिक परंपराओं के प्रदर्शन करने, त्योहार मनाने तक पर रोक लगा दी गई है। ऐसे में हिंदू और सिख लगातार अफगानिस्तान छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे हैं हालात
अफगानिस्तान में १९८० के दशक में रूस के हमला करने से पहले बेहद धार्मिक स्वतंत्रता थी। तब वहां करीब १ लाख हिंदू और सिख थे। रूसी हमले के बाद वहां धार्मिक कट्टरता शुरू हुई और जिहादी संगठन अस्तित्व में आ गए। रूस और जिहादी संगठनों के बीच के संघर्ष के कारण बहुत सारे अल्पसंख्यक अफगानिस्तान से पलायन कर गए। वहां हिंदू, सिख, अहमदी और शिया सहित अल्पसंख्यकों की स्थिति तेजी से खराब हो गई है।

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