मुख्यपृष्ठनए समाचारसामना संपादकीय: फंसानेवालों को राहत! माय लॉर्ड, ये क्या?

सामना संपादकीय: फंसानेवालों को राहत! माय लॉर्ड, ये क्या?

‘विक्रांत बचाओ’ के नाम पर करोड़ों रुपए जमा करके गबन करनेवाले संदिग्ध अपराधियों को मुंबई उच्च न्यायालय ने अंतरिम जमानत दे दी है। पैसा एकत्रित करनेवाली माफिया टोली के सूत्रधार किरीट सोमैया व उनके पुत्र बीते कुछ दिनों से फरार थे। उच्च न्यायालय द्वारा राहत दिए जाने के बाद वे प्रकट हुए। जिनके खिलाफ पैसों के गबन का मामला दर्ज है व न्यायालय ने जिन्हें प्रतिदिन पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगाने को कहा है, ऐसे सोमैया कहते हैं कि महाविकास आघाड़ी के घोटाले बाहर निकालेंगे! सोमैया के खिलाफ ही घोटाले के संबंध में आपराधिक मामला दर्ज है। ‘आईएनएस विक्रांत बचाओ’ के नाम पर उन्होंने बड़ी मात्रा में पैसे जुटाए हैं। उसे राजभवन में जमा करेंगे, ऐसा वचन उन्होंने दिया था। उक्त रकम बीच में ही गायब हो गई। राजभवन ने तो पैसे जमा हुए ही नहीं, ऐसा लिखित में कहा है। परंतु हमारी अदालत पैसों के गबन के इस सबूत को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। खुद आरोपी के वकील कबूल करते हैं कि पैसे एकत्रित किए तो उसे राजभवन में जमा ही नहीं किया। आरोपी ने उसे भाजपा कार्यालय में जमा किया। भाजपा कार्यालय में विक्रांत का धन जमा किया और सैकड़ों लोगों से जालसाजी की गई। ये मानने को हमारी अदालत तैयार नहीं होगी तो हम किस युग से गुजर रहे हैं, आनेवाला समय कितना कठिन होगा यह समझ में आ जाएगा। आरोपी सोमैया की जमानत अर्जी सत्र न्यायालय ने निरस्त की तब सत्र न्यायालय ने कुछ मुद्दे दर्ज कराए थे। जो मतलब, ‘सोमैया व उनके बेटे ने गैरकानूनी ढंग से पैसे एकत्रित किए। उन्होंने किसी कॉम्पिटेंट अथॉरिटी से अनुमति नहीं ली थी। यह कृत्य अनियमितता ही है। जनता से पैसा एकत्रित किया गया, यह साफ दिख ही रहा है। ये जुटाए गए पैसे सोमैया पिता-पुत्र ने किसी को नहीं दिए और जुटाए गए पैसों का हिसाब भी नहीं रखा। इसलिए सत्र न्यायालय ने आरोपियों की जमानत ठुकरा दी। जमानत नकारते ही आरोपी बाप-बेटे फरार हो गए। अब हमारे विद्वान हाईकोर्ट ने आरोपी को राहत देते समय क्या कहा, यह देखो- शिकायत कई वर्षों के बाद दर्ज की गई है। २०१३ से २०२२ के बीच शिकायत दर्ज नहीं हुई और घोटाले के ५७ करोड़ रुपयों का आंकड़ा कहां से आया? प्रमाण क्या है? अखबारों में छपी खबरों के आधार पर शिकायतकर्ता ने मामला दर्ज कराया था। आदरणीय न्यायालय को साष्टांग दंडवत करते हुए विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं कि माय
लॉर्ड २०१३ में पैसे एकत्रित किए गए थे। जिन्हें राजभवन में जमा किया गया होगा, ऐसा दानदाताओं को लगा था। परंतु राजभवन द्वारा ही वर्ष २०२२ में घोटाले का खुलासा किए जाने पर दानदाता दहल उठे और हमारे साथ जालसाजी हुई इसलिए पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसमें क्या गलत हुआ? घोटाला ५७ करोड़ का या ५७ रुपए का ये जांच में सिद्ध होगा, परंतु मुख्य आरोपी सोमैया व उनके बेटे ने विक्रांत के नाम पर जनता को फंसाकर पैसे एकत्रित किए और धांधली की, यह अपराध ही है। इस अफरातफरी के अपराध का रंग सफेद नहीं किया जा सकता है। बैंक में, पतपेढ़ियों में सार्वजनिक उत्सव मंडलों में सौ-पांच सौ रुपयों तक का हिसाब नहीं लगता इसलिए जालसाजी के अपराध में न्यायालय ने आम लोगों को जेल में भेजा है। लेकिन यहां चोर को पकड़ा इसलिए न्यायालय पुलिस को ही फटकार रही है। फिलहाल, सुर्खियों में आई पत्रा चाल, गोवा वाला कंपाऊंड प्रकरण तो २०१३ से भी पहले का है और उन्हें खोदकर निकालकर महाविकास आघाड़ी के लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए गए और उन्हें जेल में भेज दिया गया। परंतु दूसरी तरफ मुंबई बैंक से विक्रांत निधि घोटाले तक ठोस सबूत होने के बावजूद न्यायालय जमानत दे रहा है। दिशा सालियन प्रकरण में भी महिला आयोग की शिकायत पर ध्यान न देते हुए आरोपियों को राहत दी गई। महाराष्ट्र में एक विशिष्ट राजनीतिक दल के लोगों ने केंद्रीय जांच एजेंसियों पर कब्जा ही जमा लिया। न्याय पालिका तो खुद पर छींटें न उड़ने दें लेकिन क्या करेंगे? मुझे न्याय चाहिए होगा तो मैं न्यायालय नहीं जाऊंगा, वहां न्याय नहीं मिलता ऐसा पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा है। मुख्य न्यायाधीश की ही ऐसी अवस्था होगी तो आम जनता का क्या? विक्रांत युद्ध पोत के नाम पर पैसे एकत्रित करके उसका गबन करना देशद्रोह नहीं है क्या? माय लॉर्ड, आप ही बताएं!

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