मुख्यपृष्ठसंपादकीयसामना संपादकीय: मरण यातनाओं का बोझ!

सामना संपादकीय: मरण यातनाओं का बोझ!

हमारे देश ने ७० वर्षों में जितनी प्रगति नहीं की उतनी ६ वर्षों में की, ऐसा दावा वर्तमान सत्ताधारी हमेशा ही करते रहते हैं। पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनाने का दावा किया जा रहा है। महंगाई दिन-प्रतिदिन नए-नए कीर्तिमान बना रही है फिर भी हमारा देश आर्थिक महासत्ता बनने की दिशा में तेजी से वैâसे बढ़ रहा है, ऐसी तस्वीर तैयार की जा रही है। परंतु इन तमाम गुब्बारों में पिन टोंचनेवाली तथा तस्वीरों का रंग खराब करनेवाली एक हृदयविदारक घटना मध्य प्रदेश में घटी। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। मध्य प्रदेश के रीवा में बीमार महिला को १० किलोमीटर दूर स्थित स्वास्थ्य केंद्र में उपचार के लिए ले जाना था, परंतु उसके लिए एंबुलेंस उपलब्ध नहीं थी। आखिरकार, उस महिला की बेटियों ने बीमार मां को खाट पर सुलाकर १० किलोमीटर पैदल चलते हुए स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाया, परंतु तब तक बीमार महिला की मौत हो गई थी। फिर उस महिला की बेटियां की बदकिस्मती यहीं नहीं रुकी। शव वापस गांव ले जाने के लिए भी उन्हें एंबुलेंस नहीं मिली इसलिए उन पर मां के शव को खाट पर ही बांधकर पैदल ले जाने की नौबत आई। इसमें भी रोष की बात ये है कि संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों को इसमें कुछ भी गलत नहीं लगा। उनकी संवेदनाएं जागृत नहीं हुर्इं, बल्कि इस घटना को अधिक महत्व देने की आवश्यकता नहीं है। सोशल मीडिया पर बेवजह इस घटना को ‘वायरल’ किया जा रहा है, ऐसी बुद्धिमत्ता उन महाशय ने दिखाई। उस पर मध्य प्रदेश के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधक ही नहीं, बल्कि प्रशासन की भी क्या दुर्गति है, यह समझ में आ गया। मध्य प्रदेश जैसा ‘बीमारू’ राज्य भाजपा के शासन में ‘विकास के मार्ग पर’ लाया गया है। ऐसा प्रचार हमेशा किया जाता है, परंतु रीवा जैसी घटना इस प्रचार की हवा निकाल देती है। ग्रामीण-आदिवासी जनता के नसीब में आज भी कितनी भयंकर यातना लिख रखी है। इस ज्वलंत सच्चाई का एहसास करानेवाली यह घटना है। लेकिन यह पहली ही घटना नहीं है। इससे पहले ऐसी असंख्य घटनाएं घट चुकी हैं। पांच ही दिन पहले छत्तीसगढ़ के ईश्वरदास नामक बदनसीब पिता को अपने सात वर्ष की बच्ची का शव कंधे पर लेकर दस किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। दो साल पहले ओडिशा में ‘तितली’ तूफान के प्रहार से मारी गई बबिता नामक सात वर्षीय बच्ची का शव कंधे पर लेकर उसके पिता को आठ किलोमीटर चलना पड़ा। फिर यही पदयात्रा उन्हें सरकारी नियमों के अनुसार शव के ‘पोस्टमार्टम’ के लिए करनी पड़ी। इसे नियति का क्रूर मजाक कहा जाए या सरकारी कामकाज की असंवेदनशीलता? मतलब तूफान में लापता हुई बच्ची का शव मिला इसलिए वह पिता हाय तौबा करे या बाद में जो दिव्य कार्य करना पड़ा उसके लिए अपने नसीब को कोसे? एंबुलेंस न मिलने के कारण पत्नी का शव कंधे पर लेकर बारह किलोमीटर पदयात्रा करनेवाले ओडिशा के दाना माझी और बाद में उनकी बेटी की झकझोरनेवाली पदयात्रा तीन साल पहले इसी तरह से दुनिया के सामने आई थी। उत्तर प्रदेश में दिव्यांग बच्चे को पिता के शव के लिए एंबुलेंस नकार दी गई तो उसे साइकिल रिक्शा में ले जाना पड़ा। छत्तीसगढ़ में तो आत्महत्या करनेवाली लड़की का पोस्टमार्टम करने के लिए साढ़े सात सौ रुपए की रिश्वत मांगी गई। वह न देने पर बेवजह वक्त बर्बाद किया गया और एंबुलेंस समय पर न मिलने की वजह से लड़की की लाश ठेले पर ले जाने की नौबत परिजनों पर आई। देश के ग्रामीण आदिवासी भागों में स्वास्थ्य सुविधाओं की दुर्गति हमारे यहां कोई नई समस्या नहीं है। मरीजों अथवा शवों को कंधे पर लेकर मीलों पदयात्रा करना वहां के गरीबों के नसीब में लिखा गया है। मध्य प्रदेश के रीवा में इसी तरह की घटना से यह अव्यवस्था एक बार फिर सुर्खियों में आ गई, इतना ही। ‘मृत्यु द्वारा मिली रिहाई, जिंदगी ने प्रताड़ित किया’ ऐसा कविवर्य सुरेश भट्ट ने कहा है। परंतु यहां तो मृत्यु के बाद भी मरण यातना से मुक्ति नहीं, ऐसी इस बदनसीब जीवन की दुर्गति है। उनके कंधों पर से यह मरण यातना का बोझ कभी उतरेगा क्या?

अन्य समाचार