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सामना शोध : डॉक्टरों ने माना टीकाकरण में कम है वयस्क दर

हिंदुस्थान के १६ शहरों में ५० साल और उससे अधिक उम्र के लोगों, उनकी देखभाल करनेवालों और डॉक्टरों के बीच द एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया और इप्सोस ने हाल ही में वयस्क टीकाकरण के बारे में एक महत्वपूर्ण सर्वे किया है। सर्वे से पता चला है कि वयस्क टीकाकरण की दर आखिर क्यों कम है। हिंदुस्थान में वयस्क टीकाकरण सर्वे से पता चला है कि ५० वर्ष की आयु के ७१ फीसदी लोग वयस्क टीकाकरण के बारे में जानते हैं लेकिन इनमें से केवल १६ फीसदी ने ही कोई वयस्क टीका लगवाया है। मरीजों और डॉक्टरों ने कम टीकाकरण के लिए अलग-अलग कारण बताए हैं। सर्वे में शामिल ९० फीसदी डॉक्टरों का कहना है कि औपचारिक दिशा-निर्देशों की कमी के कारण रोगियों में टीकाकरण के प्रति रुचि और इसे अपनाने में कमी आई है। डॉक्टर भी अपने मरीजों के साथ वयस्क टीकाकरण पर चर्चा करने में झिझकते हैं, क्योंकि उनके पास समय की कमी होती है और उन्हें यह भी लगता है कि मरीज लागत की वजह से बीमारी का जल्द उपचार कराना चाहते हैं।
डॉक्टरों का मानना है कि मरीज टीकाकरण की सिफारिशों के प्रति कम उत्सुकता दिखाते हैं। वहीं मरीजों का कहना है कि उन्हें अपने डॉक्टरों से टीकाकरण के लिए कोई ठोस सिफारिश नहीं मिलती है। इसलिए उन्होंने सक्रिय रूप से वयस्क टीकाकरण नहीं कराया है।
५० आयु वर्ग के करीब ६९ फीसदी और उनकी देखभाल करनेवाले ७६ फीसदी लोग डॉक्टरों से वयस्क टीकाकरण के बारे में नहीं पूछते, क्योंकि उनका मानना है कि यदि उन्हें इसकी आवश्यकता होगी, तो उनके डॉक्टर खुद इसकी सिफारिश करेंगे। इस बारे में पूछे जाने पर कि वयस्क टीकाकरण में सुधार वैâसे किया जाए, तो ५५ फीसदी वयस्क उत्तरदाताओं और उनकी देखभाल करने वाले ४८ फीसदी लोगों ने कहा कि कोविड-१९ टीकाकरण जागरूकता के लिए लागू किए गए उपाय वयस्क टीकाकरण को अपनाने में वृद्धि कर सकते हैं। एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया के सचिव डॉ. अगम वोरा ने कहा कि ५० वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए टीकाकरण की सिफारिश करने में डॉक्टरों का विश्वास बढ़ाने के लिए उपाय किए जाने की जरूरत है। हमारे सर्वे से यह भी पता चला है कि हिंदुस्थान में टीकाकरण से रोकी जा सकने वाली बीमारियों के बारे में जागरूकता बहुत कम है। हमारा मानना है कि ५० वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में बीमारी के प्रभाव के बारे में पूरी जानकारी दी जाएगी, तभी वे टीकाकरण को गंभीरता से लेंगे। उस भूमिका को भी स्वीकार करना होगा जो देखभाल करने वाले (केयरगिवर) वयस्क टीकाकरण के बारे में जानकारी बेहतर बनाने में निभा सकते हैं। वयस्कों के टीकाकरण के बारे में कुछ गलतफहमियां भी लोगों को टीका लगवाने से रोकती हैं। ५० फीसदी यह भी मानते हैं कि टीकों की एक से अधिक खुराक उन्हें टीकों पर निर्भर बना सकती है। ५८ फीसदी वयस्क और उनकी देखभाल करनेवाले ६२ फीसदी को लगता है कि खुद को बचाने के लिए टीकाकरण से भी बेहतर तरीके हैं। डॉ. वोरा ने कहा कि मुंबई में ५२ फीसदी वयस्कों को ऐसा ही लगता है और ३६ फीसदी का मानना है कि कोविड के अलावा अन्य बीमारियां इतनी गंभीर नहीं हैं कि टीकाकरण की आवश्यकता हो। इस स्थिति के बारे में जागरूकता के स्तर और प्रभाव को समझने के लिए दाद के रोगियों के साथ सर्वेक्षण का दूसरा भाग आयोजित किया गया था। सर्वेक्षण से पता चलता है कि देश में इस स्थिति के बारे में जागरूकता कम है। सर्वेक्षण से पता चला है कि इसमें शामिल ६६ फीसदी रोगियों ने मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों से पीड़ित होने की जानकारी दी।

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