मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका : देशप्रेम के भाव से परिपूर्ण कविताएं

साहित्य शलाका : देशप्रेम के भाव से परिपूर्ण कविताएं

डॉ. दयानंद तिवारी

श्रीधर पाठक जन्म- ११ जनवरी, १८६०, आगरा, उत्तर प्रदेश में और मृत्यु- १३ सितंबर, १९२८। वे स्वदेश प्रेम, प्राकृतिक सौंदर्य तथा समाज-सुधार की भावनाओं से ओत-प्रोत कवि थे।
शिक्षा पूर्ण करने के बाद श्रीधर पाठक की नियुक्ति राजकीय सेवा में हो गई। सर्वप्रथम उन्होंने जनगणना आयुक्त के रूप में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में कार्य किया। उन दिनों ब्रिटिश सरकार के अधिकांश केंद्रीय कार्यालय कलकत्ता में ही थे। जनगणना के संदर्भ में श्रीधर पाठक को भारत के कई नगरों में जाना पड़ा। इसी दौरान उन्होंने विभिन्न पर्वतीय प्रदेशों की यात्रा की तथा उन्हें प्रकृति-सौंदर्य का निकट से अवलोकन करने का अवसर मिला। कालांतर में अन्य अनेक विभागों में भी कार्य किया, जिनमें रेलवे, पब्लिक वर्क्स तथा सिंचाई-विभाग आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। धीरे-धीरे ये अधीक्षक के पद पर भी पहुंचे।
श्रीधर पाठक ने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में अच्छी कविता की है। उनकी ब्रजभाषा सहज और निराडंबर है, परंपरागत रूढ़ शब्दावली का प्रयोग उन्होंने प्राय: नहीं किया है। खड़ी बोली में काव्य रचना कर श्रीधर पाठक ने गद्य और पद्य की भाषाओं में एकता स्थापित करने का एतिहासिक कार्य किया। खड़ी बोली के वे प्रथम समर्थ कवि भी कहे जा सकते हैं। यद्यपि इनकी खड़ी बोली में कहीं-कहीं ब्रजभाषा के क्रियापद भी प्रयुक्त हैं, किंतु यह क्रम महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा ‘सरस्वती’ का संपादन संभालने से पूर्व ही उन्होंने खड़ी बोली में कविता लिखकर अपनी स्वच्छंद वृत्ति का परिचय दे दिया था। देश-प्रेम, समाज सुधार तथा प्रकृति-चित्रण उनकी कविता के मुख्य विषय थे। उन्होंने बड़े मनोयोग से देश का गौरव गान किया है, किंतु देश भक्ति के साथ उनमें भारतेंदु कालीन कवियों के समान राजभक्ति भी मिलती है।
श्रीधर पाठक की रचनाएं देशप्रेम के भाव से परिपूर्ण हैं। एक ओर श्रीधर पाठक ने ‘भारतोत्थान’, ‘भारत प्रशंसा’ आदि देशभक्ति पूर्ण कविताएं लिखी हैं तो दूसरी ओर ‘जार्ज वंदना’ जैसी कविताओं में राजभक्ति का भी प्रदर्शन किया है। समाज सुधार की ओर भी इनकी दृष्टि बराबर रही है। ‘बाल विधवा’ में उन्होंने विधवाओं की व्यथा का कारुणिक वर्णन किया है। परंतु उनको सर्वाधिक सफलता प्रकृति-चित्रण में प्राप्त हुई है। तत्कालीन कवियों में श्रीधर पाठक ने सबसे अधिक मात्रा में प्रकृति-चित्रण किया है। परिमाण की दृष्टि से ही नहीं, गुण-विशेषताओं की दृष्टि से भी वे सर्वश्रेष्ठ हैं। श्रीधर पाठक ने रूढ़ी का परित्याग कर प्रकृति का स्वतंत्र रूप में मनोहारी चित्रण किया है। उन्होंने अंग्रेजी तथा संस्कृत की पुस्तकों के अनुवाद भी किए।
श्रीधर पाठक एक कुशल अनुवादक थे। कालिदास कृत ‘ऋतुसंहार’ और गोल्डस्मिथ कृत ‘हरमिट’, ‘द डिजर्टेड विलेज’ तथा ‘द ट्रैवलर’ का वे बहुत पहले ही ‘एकांतवासी योग’, ‘ऊजड ग्राम’ और ‘श्रांत पथिक’ शीर्षक से काव्यानुवाद कर चुके थे। उनकी कुछ मौलिक कृतियों के निम्न प्रकार हैं।
पाठक जी मौलिक उद्भावनाओं के कवि हैं। विषय और शिल्प दोनों ही दृष्टियों से आधुनिक हिंदी काव्य को एक नया मोड़ देने के कारण उन्हें स्वच्छंद भावधारा का सच्चा प्रवर्तक ठहराया गया। उन्होंने काव्य को अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छंद, वैयक्तिक और यथार्थभरी दृष्टि से देखने का सफल प्रयास किया जिससे आगामी छायावादी भावभूमि को बड़ा बल मिला और पूर्वागत पारंपरिक रूढ़ काव्यढांचा टूट गया। सफल काव्यानुवादों द्वारा उन्होंने हिंदी को नई दृष्टि देने का प्रयत्न किया। यद्यपि उन्होंने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में रचनाएं कीं तथापि समर्थक वे खड़ी बोली के ही थे। थोड़े में, उनके काव्य की विशेषताएं हैं- सहज प्रकृति चित्रण, वैयक्तिक अनुभूति, राष्ट्रीयता, नए छंदों, लयों और बंदिशों की खोज, विषय प्रधान दृष्टि, नवीन भाव प्रकाशन की क्षमता से भरकर नवीन भाषा प्रयोग, प्राच्य और पाश्चात्य तथा पुराने और नए का समन्वय।
उजियाली निशा छविशाली दिशा अति सो हैं फूलें फले।
मलिक मोहम्मद जायसी जी ने जिस प्रकार ‘बारहमासा’ में हिंदी के बारह महीनों का अद्भुत वर्णन किया है, वैसे ही पाठक जी ने भी ऋतुओं का मानो सजीव वर्णन किया है। जिसको पढ़ने पर ऐसा लगता है कि हम वास्तव में उसी ऋतु की कल्पना में पहुंच चुके हैं। प्रस्तुत हैं वनाष्टक में ही समाहित ग्रीष्म ऋतु से संदर्भित कविता की पंक्तियां-
‘जलहीन जलाशय, व्याकुल हैं पशु पक्षी, प्रचंड है भानुकला।
किसी कानन कुंज के धाम में, प्यारे करैं विसराम चलौ तो भला।।’
‘ऋतुसंहार’ रचना का अलग ही महत्व है, क्योंकि इसमें संस्कृत के प्रकांड विद्वान आचार्य महाकवि कालिदास के नाटक के प्रारंभिक ३ सर्गों का अनुवाद श्रीधर ने ब्रज भाषा में किया है। श्रीधर पाठक ने लगभग सभी रचनाओं में अध्यात्म, योगी, तपी, राष्ट्रभक्ति, राजभक्ति, भारत की पवित्रता, प्राकृतिक चित्रण, सुख शांति, वैभव आदि का वर्णन किया है, साथ ही अपने जीवन के लक्ष्य भी भक्तिकालीन कवियों की तरह ही मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं।
श्रीधर पाठक के समय देश में भौतिक सुख साधन का अभाव था, किंतु प्रेम, सौहार्द, ममता व आपसी सामंजस्य अवश्य था। श्रीधर पाठक ने ‘गुनवंत हेमंत’ काव्य संग्रह में खेत-खलियान, मूली, गाजर, गेहूं, सरसों, रहट से पानी निकालना, फूल-पौधे आदि का मनोहारी वर्णन किया है। गुनवंत हेमंत का शाब्दिक अर्थ सुंदर प्रकृति और मानवीय कारणों से परिपूर्ण वसंत। कहा जा सकता है उपर्युक्त नाना विषय रूपी मोतियों को एक माला में पिरोने का प्रयास किया है-
‘जहां तहां रहट परोहे चल रहे।
बटहे जल के चारों ओर निकल रहे।
जो गेहूं के खेत सरस सरसों धनी।
दिन दिन बढ़ने लगी विपुल शोभा सनी।
सुंदर सौंफ और कुसुम की क्यारियां।
सोआ पालक आदि विविध तरकारियां।
अपने अपने ठौर सभी ये सोहते।
सुंदर शोभा से सबका मन मोहते।’
भारतेंदु युग के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र और महात्मा गांधी ने निज भाषा हिंदी को देश की उन्नति और देश की प्रगति का संकेत माना है। उसी प्रकार द्विवेदी युगीन कवि श्रीधर पाठक ने भी निज भाषा का महत्व बताते हुए लिखा है-
‘निज भाषा बोलहु लिखहु पढ़हु गुनहु सब लोग।
करहु सकल विषयन विषै निज भाषा उपयोग।।’
देश प्रेम से शिक्त कुछ रचनाएं यहां उल्लिखित हैं।
‘बंदहुं मातृ-भारत-धरनि
सकल-जग-सुख-श्रैनि, सुखमा-सुमति-संपति-सरनि
ज्ञान-धन, विज्ञान-धन-निधि, प्रेम-निर्झर-झरनि
त्रिजग-पावन-हृदय-भावन-भाव-जन-मन-भरनि।।
बंदहुं मातृ-भारत-धरनि
‘जय जय-रंजिनि, जय अय-गंजिनि
संपति-सुमति-सुकृत-सुख-पुंजनी
बुध-जन-हृदय-सरोवर-कंजिनी
सकल सुकर्मन की महतारी
जय-जय भारत-भूमि हमारी’
‘जय भुवि-थंबिनि, सिंधु-नितंबिनि
त्रिभुवन-प्रेयसि, प्रेम-प्रलंबिनी
जयति जननि निज जन-अवलंबिनि
जय तुअ सुअन तपोबल-धारी
जय जय भारत-भूमि हमारी’
‘भारत हमारा वैâसा सुंदर सुहा रहा है
शुचि भाल पै हिमाचल, चरणों पै सिंधु-अंचल
उर पर विशाल-सरिता-सित-हीर-हार-चंचल
मणि-बद्धनील-नभ का विस्तीर्ण-पट अचंचल
सारा सुदृश्य-वैभव मन को लुभा रहा है
भारत हमारा वैâसा सुंदर सुहा रहा है

(लेखक श्री जेजेटी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और साहित्यकार हैं।)

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