मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका : नवजागरण काव्य के प्रतिनिधि रचनाकार! रामनरेश त्रिपाठी

साहित्य शलाका : नवजागरण काव्य के प्रतिनिधि रचनाकार! रामनरेश त्रिपाठी


भाग-1

डॉ. दयानंद तिवारी

कविवर रामनरेश त्रिपाठी हिंदी नवजागरण काव्य के प्रतिनिधि रचनाकार हैं। उनकी कविता में नवजागरणकालीन काव्य की संपूर्ण विशेषताएं एक साथ उपलब्ध होती हैं। नवजागरणकाल में राष्ट्रीयता, समाज-सुधार, स्वातंत्र्य चेतना, मानवतावाद, सामाजिक समरसता एवं गांधीवाद का बोलबाला था। त्रिपाठीजी ने अपनी रचनाओं में इन मूल्यों का पर्याप्त समावेश करते हुए युगबोध एवं सामयिकता का परिचय दिया है। उनकी आकांक्षा है कि प्रत्येक मानव अपनी पूरी शक्ति से उठ खड़ा हो, उसे अपने अधिकारों और कर्तव्यों की पूरी समझ हो और अत्याचारों का वह पुरजोर विरोध कर सके। रूढ़िवादी मान्यताओं को दूर करने का दृढ़ संकल्प भी उनकी रचनाओं में मौजूद है। सामाजिक व्यवस्था को संवारने के प्रति उनकी कविताओं में विशेष आग्रह दिखाई देता है।
विकसित राजनैतिक चेतना तथा सांस्कृतिक पुनरुत्थान के परिणामस्वरूप राष्ट्रीयता की भावना हिंदी नवजागरण काव्य की केंद्रीय विषय रही है। रामनरेश त्रिपाठी की कविता का मुख्य स्वर भी राष्ट्रीयता ही है। कविवर त्रिपाठी अपनी रचनाओं में देशभक्ति का प्रणयन करते हैं तथा उनके माध्यम से क्रांति तथा आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा देते हैं एवं परतंत्रता के बंधन तोड़ डालने का संदेश देते हैं-
सच्चा प्रेम वही है जिसकी, तृप्ति आत्मबल पर हो निर्भर। त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है, करो प्रेम पर प्राण निछावर।। देश-प्रेम वह पुण्य-क्षेत्र है, अमल असीम त्याग से विलसित। आत्मा के विकास से जिसमें मनुष्यता होती है विकसित।।
रामनरेश त्रिपाठी जिस सामाजिक परंपरा के रचनाकार हैं, उसका आधार भारतीय नवजागरण से उत्पन्न सांस्कृतिक और राजनैतिक मूल्य हैं। वस्तुत: हिंदी नवजागरण काव्य को सुधारवादी काव्य भी कहा जाता है। रामनरेश त्रिपाठी अनेक सामाजिक समस्याओं तथा धार्मिक जड़ताओं को अपनी कविता का विषय बनाते हैं। जिस समाज ने उनकी रचनात्मक दृष्टि का निर्माण किया है और उसे सामाजिक प्रतिबद्धता से जोड़ा है, वह समय और समाज भारत में सामाजिक और राजनैतिक आंदोलन की चरम अवस्था है।
तत्कालीन आंदोलनों के मूल में भारतीय सामाजिक चिंतन की एक व्यापक और मानवीय भूमिका दिखाई देती है। रामनरेश त्रिपाठी भारतीय स्वतंत्रता के निहितार्थ सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक सुधारों को राजनैतिक चेतना से जोड़कर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सामाजिक आंदोलन का सूत्रपात करते हैं। उनकी कविताएं जहां तत्युगीन सामाजिक परिस्थितियों के प्रति ध्यानाकर्षित करती हैं, वहीं समसामयिक समस्याओं के प्रति एक गहन चिंता भाव भी उनमें दिखाई देता है-
तुम मनुष्य हो,
अमित बुद्धि-बल-विलसित जन्म तुम्हारा।
क्या उद्देश्य रहित है जग में, तुमने कभी विचारा?
बुरा न मानो, एक बार सोचो तुम अपने मन में।
क्या कर्तव्य समाप्त कर लिए तुमने निज जीवन में।
रामनरेश त्रिपाठी काव्य में आदर्श एवं नैतिकता के प्रबल पक्षधर थे। अपने रचनात्मक तेवर और समर्पित जीवन शैली के कारण वे आदर्शवाद एवं नैतिकता का समर्थन करते हैं। जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठापनार्थ वे अभिव्यक्ति के केंद्रीयकरण पर बल देकर उसे असीम शक्तिशाली बना देते हैं। उनकी कविताएं उच्च मानवीय आदर्शों और उच्चतर सामाजिक चेतना के यथार्थबोध का लक्ष्य लेकर चलती हैं जिनका मानवमात्र के लिए समर्पित दृष्टिकोण अपनी बुनियादी शर्तों के कारण और भी महत्वपूर्ण हो उठता है।
इसीलिए उनका रचनात्मक दृष्टिकोण निरंतर प्रवाहमान है। उनकी कविताओं का केंद्र बिंदु मानव हित है। मनुष्य के सारे अनुभव अपनी पूरी गहनता और संवेदना के साथ दूसरों तक संप्रेषित हो जाएं, यही उनका परम लक्ष्य है। उनके द्वारा विरचित कुछ नीतिपरक दोहे द्रष्टव्य हैं-
विद्या, साहस, धैर्य, बल, पटुता और चरित्र।
बुद्धिमान के ये छवि, हैं स्वाभाविक मित्र।।
नारिकेल सम हैं सुजन, अन्तर दया निधान।
बाहर मृदु भीतर कठिन शठ हैं बेर समान।।
आकृति, लोचन, बचन, मुख, इंगित, चेष्टा, चाल।
बतला देते हैं यही, भीतर का सब हाल।।
स्थान-भ्रष्ट कुलकामिनी, ब्राह्मण सचिव नरेश।
ये शोभा पाते नहीं, नर, नख, रद, कुच, केश।।
शस्त्र, वस्त्र, भोजन, भवन, नारी सुखद नवीन।
किंतु अन्न, सेवक, सचिव, उत्तम हैं प्राचीन।।
व्यक्तिगत जीवन की पद्धत्ति जब समष्टि की संवेदना के साथ संधारित हो जाती है तब अनुभव की सामाजिक परंपरा जन्म लेने लगती है। धीरे-धीरे व्यक्तिगत संवेदना का रूपांतरण सामाजिक संवेदना के साथ एक ओर तो संघर्ष की प्रक्रिया से जूझता है और दूसरी ओर उसकी दृष्टि को भी विकसित करता है। किंतु यदि अनुभव की संवेदना आदर्श एवं नैतिक मूल्यों की पहचान न बन सके तो एक ओर जहां उसकी संवेदना जड़ होने की प्रक्रिया में आ जाती है, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिवादिता और आत्मनिर्वासन की जड़ इतनी गहरी हो जाती हैं कि संपूर्ण मानसिकता ही संज्ञा शून्य और विद्रूप हो जाती है। व्यक्तित्व के विकास की पहली दशा आदर्शवादी एवं नैतिक प्रक्रिया है, जबकि दूसरी दशा लगातार जड़ होते भावबोध की एकालाप स्थिति। कवि रामनरेश त्रिपाठी की कविताएं अपनी यात्रा पहली दशा से आरंभ करके उसे क्रमश: पूर्ण करती हैं। उनके द्वारा विरचित ‘मानसी’, ‘मिलन’, ‘पथिक’ आदि रचनाएं आदर्शवादी हैं। उनके काव्य-यात्रा की संवेदनशीलता व चिंतन की गहराई निम्नलिखित पंक्तियों से अनुभव की जा सकती हैं-
कभी उदर ने भूखे जन को प्रस्तुत भोजन पानी।
देकर मुदित भूख के सुख की क्या महिमा है जानी?
मार्ग पतित असहाय किसी मानव का भार उठा के।
पीठ पवित्र हुई क्या सुख से उसे सदन पहुंचा के?
रामनरेश त्रिपाठी अपनी काव्यगत प्रस्तुति में प्रेम के आदर्श स्वरूप को अभिव्यक्त करते हैं। उनकी दृष्टि में प्रेम जीवन की अद्भुत शक्ति है तथा उसके बिना जीवन अर्थहीन है। उन्होंने अपनी कविताओं में प्रेम का चित्रण रीतिकालीन कवियों की भांति नहीं किया है। उनके यहां प्रेम के निहितार्थ प्रयुक्त शब्दों एवं संवेदनाओं का विस्तार व्यापक है। उनकी प्रेमानुभूति उनके मानस से निकलकर संसार के हरेक प्राणी की अनुभूति बन गई है। उनका हृदय हर पीड़ित का हृदय है जिसमें विश्व के सारे सुख-दु:ख समाहित हैं। वे मानवता की मर्यादा और उसकी अनंत सीमाओं को जानते हैं और उसका निर्वाह करने के आकांक्षी हैं। प्रेम के उदात्त स्वरूप को अनुभूति और चिंतन दोनों स्तरों पर प्रस्तुत करने में त्रिपाठीजी सफल हुए हैं। प्रेम की महिमा का गुणगान करतीं निम्नलिखित पंक्तियां देखिए-
गंध विहीन फूल हैं जैसे चंद्र चंद्रिका हीन।
यों ही फीका है मनुष्य का जीवन प्रेम-विहीन।।
प्रेम स्वर्ग है, स्वर्ग प्रेम है, प्रेम अशंक अशोक।
ईश्वर का प्रतिबिंब प्रेम है, प्रेम हृदय-आलोक।।
हिंदी नवजागरण काव्य में वर्ण्य विषय का अद्भुत विस्तार देखने को मिलता है। यह अकारण नहीं है कि रामनरेश त्रिपाठी सदृश संवेदनशील कवि ने प्रकृति को भी स्वतंत्र रूप में काव्य का विषय बनाया है। जीवन और जगत् के प्राय: समस्त दृश्यों और पदार्थों को काव्य का विषय बनाते हुए वे अपनी रचनाओं में प्रकृति का बड़ा ही मनोहारी चित्रण करते हैं। मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के लिए प्रकृति का उपयोग वे खास ढंग से करते हैं। वे प्रकृति के इर्द-गिर्द नहीं घूमते अपितु प्रकृति और उसके बिंबों को मनुष्य की दुनिया के इर्द-गिर्द घुमाते हैं। वे मानव जीवन में व्याप्त विषमता, असमानता, निरर्थकता आदि को काव्य संवेदना के स्तर पर प्रकृति के माध्यम से भी प्रकट करते हैं। उदाहरण देखिए-
या अनंत के वातायन से स्वर्गिक विपुल विमलता।
झलक रही थी धरा धाम को थी धो रही धवलता।।
सुख की निद्रा में निमग्न था एक-एक तृण वन का।
था बस, सुखद सुशीतल स+सन मंद प्रवाह पवन का।।
(क्रमश:)

(लेखक श्री जेजेटी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और साहित्यकार हैं।)

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