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साहित्य शलाका: काले तन के उज्ज्वल मन! छायावादी काव्यधारा के प्रमुख कवि रामकुमार वर्मा

डाॅ. दयानंद तिवारी/मुंबई। रामकुमार वर्मा का जन्म मध्यप्रदेश के सागर जिले में हुआ। प्रयाग से हिंदी में एम.ए. तथा नागपुर से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष पद पर वर्षों तक आसीन रहे। रामकुमार वर्मा एकांकीकार, आलोचक और कवि हैं। इनके काव्य में रहस्यवाद और छायावाद की झलक मिलती है। मुख्य काव्य संग्रह हैं- `अंजलि’, `हिमहास’, `निशीथ’, `जौहर’ तथा `चित्तौड़ की चिंता’। उपन्यास `चित्ररेखा’ के लिए इन्हें देव पुरस्कार एवं एकांकी संग्रह पर अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन पुरस्कार मिला। इनको भारत सरकार द्वारा `पद्मभूषण’ अलंकरण से विभूषित किया गया।
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूं,
जानता हूं इस जगत में फूल की है आयु कितनी,
और यौवन की उभरती सांस में है वायु कितनी,
इसलिए आकाश का विस्तार सारा चाहता हूं,
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूं,
प्रश्न-चिह्नों में उठी हैं भाग्य सागर की हिलोरें,
आंसुओं से रहित होंगी क्या नयन की नमित कोरें,
जो तुम्हें कर दे द्रवित वह अश्रु धारा चाहता हूं,
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूं,
शिशिर में दिनमान की न्यूनता, चक्रवात -चक्रवाती की व्यथा और शीत की अधिकता, प्रेम व्यथा की अनुरंजित इतिव्रतात्यकता में विशेष हृदयग्राहिणी हो जाती है। इस प्रकार मानव जीवन का प्रकृति से इतना संबंध हो जाता है कि अनुभव की प्रत्येक स्थिति में प्रकृति सहचरी के समान खड़ी हो जाती है। वर्मा जी ने अपने काव्य में प्रकृति को लंबे समय तक साथ रहने एक एवं सौंदर्य की अध्यक्षा के रूप में चित्रित किया है। उन्हें प्रकृति के दुख में दुखी और सुख में सुखी प्रतीत होने का अनुभव होता है। अत: रामकुमार वर्मा के काव्य में प्रकृति चित्रण के अनेक आयाम हैं।
इसके अलावा रामकुमार वर्मा आधुनिक हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि, एकांकीकार और आलोचक हैं। हिंदी एकांकी के जनक रामकुमार वर्मा ने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और साहित्यिक विषयों पर १५० से अधिक एकांकी लिखी हैं। भगवतीचरण वर्मा ने कहा था, `डॉ. रामकुमार वर्मा रहस्यवाद के पंडित हैं। उन्होंने रहस्यवाद के हर पहलू का अध्ययन किया है। उस पर मनन किया है। उसको समझना हो और उसका वास्तविक और वैज्ञानिक रूप देखना हो तो उसके लिए श्री वर्मा की ‘चित्ररेखा’ सर्वश्रेष्ठ काव्य ग्रंथ होगा।
वर्मा जी की कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है कि वे प्रकृति के कण-कण में समाए हुए थे। हिमालय को संबोधित करते हुए उनकी रचना की पंक्तियां देखी जा सकती हैं-
‘किसने कहा कि तुम जड़ हो,
क्या तुममें है वैâलाश नहीं?
क्या प्रलयंकर के डमरू से,
नचा कण-कण में नाश नहीं?
वह महाप्रलय फिर से होगा,
होगा विनाश प्राचीरों का।’
संसार सुनेगा शीध्र, कायरों का स्वर कितना धीमा है। यह तुंग हिमालय आज हमारी छाती की दृढ़ सीमा है।’
रामकुमार वर्मा जी ने प्रकृति के विभिन्न रूपों का वर्णन किया है। ‘बादल’ की बूंद को नीचे गिरते देखकर कवि को लगता है कि यह पतन वसुधा का अभिनंदन बनेगा। ‘बादल’ के तन काले हैं तो क्या, मन उज्ज्वल है-
काले तन के उज्ज्वल मन!
कलुष रहित हो तुम, फिर भी
क्यों इतना प्रिय है अध:पतन?’
मेघ क्या हैं, नभ के जीवन में लिखे
काले – काले भाग्य अंक है।
मेघों का यह मंडल अपार।
जिसमें पड़कर तम एक बार ही
कर उठता है चीत्कार !
ये काले-काले भाग्य अंक
नभ के जीवन में लिखे, हार।
सरिता के किनारे का सुंदर रूप पहचानने में रामकुमार वर्मा का मन नहीं चूकता। इनके लिए नदी की धारा का प्रवाह सरिता के सुखकर तट सरिता को बांध लेनेवाले बाहु पाश है, कवि को ऐसा लगता है कि नदी तट के बिना नियमित होकर चलती है। कवि सरिता-तट को संबोधित करते हुए लिखते हैं-
‘ओ सरिता-तट सुखकर।
जब सरिता के अंचल में नभ
सो जाता है शिशु बनकर ,
तभी लहर की सरस थपकियां
देते हो तुम अति मृदुतर।
बिजली का विचलित लेषधार।’
अन्य छायावादी कवियों की भांति वर्मा जी जीवन की पीड़ा के रूप में विद्युत शब्द का प्रयोग किया है जैसे –
‘मेरे वियोग के नभ में
कितना दुख का कालापन।
क्या विह्वल विद्युत ही में
होंगे प्रियतम के दर्शन?’
यहां रामकुमार वर्मा जी ने दुख के लिए कालापन और विद्युत शब्द आने से कवि के दोहरे प्रतीकों की प्रतिभा स्पष्ट परिलक्षित होती है। पेड़ और प्रकृति छायावाद के अवयव हैं। रामकुमार वर्मा ने अपनी रचनाओं में पेड़ों, लताओं, फूल-कलियां वनस्पति वस्तुओं का वर्णन पर्याप्त मात्रा में किया है। वर्मा जी सुबह की हवा से कहते हैं कि तुम धीरे से आओ! मेरे पल्लव सोते हैं तुम्हारी आहट से उनके सपनों के तार टूट न जाए-
‘सरल सुमन शिशुओं ने तेरी,
आहट से दी आंखें खोल।
कलियों को मत छुओ ,
बालिकाएं हैं, सरला है अनजान’
कवि रामकुमार वर्मा ने अपने काव्य में पशु-पक्षियों एवं कीट-पतंगों का अच्छा-खासा विवरण प्रस्तुत किया है। उनके द्वारा वर्णित पशुओं में हाथी, गाय, अश्व, व्याघ्र, हिरण, श्वान आदि और पक्षियों में कोकिल, हंस, मयूर, काक, गिद्ध, उलूक, कपोत, पपीहा, क्रौंच आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वर्मा जी भारतीय संस्कृति के उपासक थे और भारतीय संस्कृति में गाय को उन्होंने माता कहकर संबोधित किया है। तथा उसकी पूजा की जाती है राजा दिलीप द्वारा दी गई नंदिनी गाय का वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है-
‘इस वंश बेलि की वृद्धि हुई सुखकारी,
ये नृप दिलीप दार्गक्षण्य कीर्ति विस्तारी।
नंदिनी से सधा मनोरथ सुख से
ध्वनि- ‘धन्य’ की प्रजा-जनों के मुख से।
ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले वर्मा जी ने ग्राम्य जीवन का भी अद्भुत विविधता भरा चित्रण प्रस्तुत किया है।
हे ग्राम देवता ! नमस्कार !
सोने-चांदी से नहीं किंतु तुमने मिट्टी से किया प्यार।
हे ग्राम देवता ! नमस्कार !
जन कोलाहल से दूर-कहीं एकाकी सिमटा-सा निवास,
रवि-शशि का उतना नहीं कि जितना
प्राणों का होता प्रकाश
श्रम वैभव के बल पर करते हो जड़ में चेतन का विकास
दानों-दानों में फूट रहे सौ-सौ दानों के हरे हास,
यह है न पसीने की धारा, यह गंगा की है धवल धार।
हे ग्राम देवता ! नमस्कार
अंत में हम कह सकते हैं कि छायावाद के महत्वपूर्ण कवि रामकुमार वर्मा ने काव्य में सुंदर संकल्पना के साथ-साथ चिंतन और मनन के साथ प्रकृति का सुंदर चित्रण किया है। वर्मा जी के द्वारा उनकी रचनाओं में जो प्रकृति का चित्रण किया गया है, वह देखकर ऐसा लगता है कि वर्मा जी प्रकृति की गोद मे ही बड़े हुए हैं।
(क्रमश:)

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