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संपादकीय : संभाजी ब्रिगेड व हम, लड़ेंगे और जीतेंगे!

शिवसेना की तरह ही संभाजी ब्रिगेड भी महाराष्ट्र का खौलते खूनवाला संगठन है। मांसाहेब जीजाऊ, छत्रपति शिवाजी राजे, छत्रपति संभाजी राजे के सामाजिक, राजनीतिक, जनकल्याणकारी एवं महाराष्ट्र धर्म से निष्ठा रखनेवाले संभाजी ब्रिगेड द्वारा कठिन दौर में शिवसेना को प्रेमपूर्वक गले लगाया जाना, इससे बड़ा राजधर्म कौन-सा होगा? महाराष्ट्र के हितों की रक्षा के लिए, राज्य के स्वाभिमान की रक्षा के लिए शिवसेना और संभाजी ब्रिगेड का एक साथ आना राज्य में बड़े परिवर्तन की आहट है। आज शिवसेना की पीठ में चालीस खंजर तथाकथित हिंदुत्ववादियों ने घोंपे हैं। छत्रपति संभाजी राजा को औरंगजेब ने कड़ी यातनाएं दीं क्योंकि राजे धर्म रक्षक थे। दिल्ली के बादशाह ने छत्रपति शिवराय को दिल्ली बुलाकर अपमानित किया और बाद में बंदी बना लिया। क्योंकि छत्रपति शिवराय हिंदवी स्वराज्य की स्थापना का कार्य हाथ में लेकर दिग्विजय की दिशा में आगे बढ़ रहे थे। शिवसेना यह प्रखर हिंदुत्ववादी शिवराय-संभाजी राजे प्रेमी संगठन भी दिल्ली के बादशाह की आंखों में चुभने लगा है। इसलिए शिवसेना की पीठ में चालीस खंजर घोंपकर महाराष्ट्र की भूमि में बेईमानी और फूट का बीज उन्होंने फेंका। इस कठिन समय में संभाजी ब्रिगेड जैसा खौलते खूनवाला संगठन भाई के साथ ममता की भावना से खड़ा रहा, इसे इतिहास में दर्ज करना ही होगा। हर तरफ गद्दारी का मूसलाधार सुकाल चल रहा है। निष्ठा की दुम छिपाकर हर किसी के अपनी बेईमानी का सर्टिफिकेट दिखाने के लिए आगे आने के दौरान बीते २५ वर्षों से महाराष्ट्र के गांव-देहातों में काम करनेवाले संभाजी ब्रिगेड ने शिवसेना का हाथ थामा है। यह शुभ संकेत है। संभाजी ब्रिगेड के प्रमुख ने स्पष्ट ही कहा है, हम महाराष्ट्र के हित के लिए साथ आ रहे हैं, जो कि सत्य ही है। संभाजी ब्रिगेड से चर्चा और युति सिर्फ शुरुआत है। महाराष्ट्र के हित के लिए और कुछ महत्वपूर्ण घटक एक साथ आएंगे और स्वाभिमान-अभिमान के लिए शंखनाद किया जाएगा। तमाम राजनीतिक मतभेदों से आगे बढ़कर महाराष्ट्र हित के शिखर की ओर देखना होगा। दूसरे विश्वयुद्ध में जो देश एक-दूसरे के खिलाफ खड़े थे, एक-दूसरे की भारी बर्बादी की वजह बने थे। वही देश आज इतिहास और बैर भूलकर एक-दूसरे को नए सिरे से सहयोग करने के लिए आगे आए हैं। इस एक ही उदाहरण से महाराष्ट्र के स्वाभिमानी सबक सीख सकते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध में जो देश बर्बाद हो गए और उन्होंने भी आपसी मतभेद भूलकर अपने-अपने देशों का पुनर्निर्माण किया तथा पुराने दुश्मनों से मेल-मिलाप किया। इतिहास में अथवा भूतकाल में कुछ घटनाओं को जान-बूझकर कोयले की तरह उगलते रहने में कोई अर्थ नहीं है, यह अब उन्हें ध्यान रखना चाहिए। आज महाराष्ट्र के स्वाभिमान की काफी शक्ति, धर्म और जाति के नाम पर गाली-गलौच करने में, एक-दूसरे को उकसाने में, हमला करने में खर्च की जा रही है। उससे एक-दूसरे का बल कम हो रहा है और इसी का लाभ भाजपा जैसे लोग देशभर में उठा रहे हैं, इसे याद रखना चाहिए। दूसरी बात ये है कि आज के भाजपाई व उनकी मौजूदा ४०-५० ‘खोके हराम’ टोली हर बार शिवराय का नाम लेती रहती है। परंतु राष्ट्रभक्ति के लिए नि:स्वार्थ भावना से किया गया इतिहास का पुनरीक्षण अलग है। शिवराय-संभाजी राजे का नाम स्मरण अलग और इस या उस मतलब से शिवराय का नाम लेना अलग है। आज सहूलियत के अनुसार शिवराय का जाप चल रहा है। इस तमाम ढोंग पर प्रहार करने के लिए संभाजी ब्रिगेड नामक मर्द मावलों की फौज शिवसेना के साथ आई है। यह एक नए सफर की शुरुआत है। संभाजी ब्रिगेड के श्री पुरुषोत्तम खेडेकर महाराष्ट्र धर्म मानते हैं। वे प्रबोधनकार ठाकरे के सामाजिक विचारों को माननेवाले हैं। प्रबोधनकार हिंदुत्व के जुझारू वीर सिपाही थे ही, इसलिए अधिक से अधिक एकजुटता पर दो लड़ाकू संगठनों की युति हुई है, ऐसा समझ लें! अन्यथा जिस भाजपा के साथ हमने २५ वर्ष हिंदुत्व के नाम पर बिताए, उन्होंने भी हिंदुत्व का ऐसा कौन-सा दीया जलाया? राजनीतिक स्वार्थ के लिए पूरा बाजार और नीलामी थी। वहां कश्मीर में भाजपा ने अलगाववादी महबूबा बाई की पार्टी से संबंध जोड़ा और बाद में यही टोली दुनिया को हिंदुत्व का पाठ पढ़ा रही है। नहीं कहें तो राम मंदिर आदि मुद्दों का विरोध करनेवाले नीतिश कुमार के साथ उन्होंने बिहार में संबंध जोड़ा ही था और बाद में उनकी पीठ में खंजर भी घोंपा। मौजूदा भाजपाइयों को शिवसेनाप्रमुख से प्रेम का झूठा उबाल आ ही रहा है इसलिए बालासाहेब का एक सत्य विचार कहता हूं। ‘दगाबाज मित्रों से दिलदार शत्रु बेहतर है!’ ऐसा बालासाहेब ठाकरे कहते थे। अब ‘आप निश्चित तौर पर कौन हैं?’ यह भाजपा ही तय करे। इन्हें न ही हिंदुत्व प्यारा है, और न ही शिवराय। इन्हें सिर्फ सत्ता प्यारी है। उस सत्ता के लिए इन्होंने महाराष्ट्र की इज्जत से खिलवाड़ शुरू की है। अर्थात ऐसे गद्दारों को महाराष्ट्र कई बार भारी पड़ेगा। शिवसेना के साथ अब संभाजी ब्रिगेड है। छत्रपति संभाजी के नाम से भी दिल्ली के बादशाहों की रूह कांपती थी। वे वास्तविक धर्मवीर थे। उन धर्मवीर ने धर्मरक्षा के लिए, महाराष्ट्र के लिए शहादत स्वीकार की। उस दौर में औरंगजेब के पास ‘ईडी’ का खंजर नहीं था। अन्यथा उसने उसका भी इस्तेमाल किया होता। छत्रपति संभाजी राजा के शहादत की चिंगारी से महाराष्ट्र में स्वाभिमान और क्रांति का दावानल भड़का। महाराष्ट्र लड़ता रहा और जीता। अब संभाजी ब्रिगेड और हम उसी महाराष्ट्र के स्वाभिमान की क्रांति के दावानल को भड़काने के लिए एक साथ आए हैं। हम भी जीतेंगे, अवश्य जीतेंगे! महाराष्ट्र के दुश्मनों याद रखो!

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