मुख्यपृष्ठस्तंभसटायर : `मत' मतदान!

सटायर : `मत’ मतदान!

डॉ. रवींद्र कुमार
मत का अन्य अर्थ ‘नहीं’ होता है। आपने ‘रोको मत जाने दो’ की कहानी तो सुनी होगी। कैसे कौमा रोको के बाद लगाओ तो एक अर्थ होता है और मत के बाद लगाओ तो दूसरा एकदम उलट अर्थ। इसी प्रकार मतदान से आप प्रत्याशी को जाने दे सकते हैं। चाहे तो रोक भी सकते हैं। श्रद्धा आपकी, हृदय आपका, जो चिकनी-चुपड़ी बातों में आए अथवा कंबल, शराब और दो हजार के नोट में।
हम लोग बिल्ले (बैज) में ही खुश हो जाते थे और बिल्ले वाले के लिए दुआ करते थे ताकि हमें और बिल्ले मिल जाएं। अब टेंकरों में शराब, जीप में हथियार लेकर लोग आते हैं। बोलो क्या मांगता? पर वोट अपुन को। पहले जमाने में राजा लोग एक दूसरे के राज्य पर चढ़ाई करते थे, आजकल ईवीएम झटक लेते हैं कितनी `यूजर प्रâेंडली’ प्रणाली है। पहले लोग बात के धनी होते थे और बातों से मान जाते थे। अब लोग धन की बात करते हैं और बिना एडवांस लिए नहीं मानते, चुनाव लाठी-भाला और दंगे की स्टेज से निरंतर क्रमिक विकास करते हुए अब कट्टा-तमंचों, बंब और ए.के. ४७ तक आ पहुंचे हैं। ए.के.४७ तो कहते हैं बनी ही हिंदुस्थान के लिए है। सन ४७ में हमें आजादी मिली थी। शायद उसी के स्मृति स्वरूप इसका नामकरण किया गया है।
मतदान के दिनों खूब त्योहारमय माहौल रहता है। चुनाव के दिनों में ऐसे-ऐसे प्रत्याशी आपसे मिलते हैं, जिन्हें पहले आपने कभी देखा नहीं और यकीनन आगे भी पांच साल भले जीतें या हारें, देख न पाएंगे। जिस मोहल्ले में जनसंपर्क करना होता है वहां पहले ही जयकारा करने हेतु चेला-पार्टी भेज दी जाती है, घरों में से माएं-बहुएं निकलकर आशीष देती हैं तथा चेला पार्टी द्वारा पहले से वितरित पुष्पाहार पहनाती हैं। प्रत्याशी खीसें निपोरते और सेवक भाव से हाथ जोड़ते आगे बढ़ते जाते हैं। बिल्ले-झंडे, झंडी से यात्रा करते हुए ‘जनसंपर्क’ भी हाइ-टेक हो गया है। ऑडिओ वैâसट और जीप पुराने पड़ गए हैं। अब समय है टी.वी. नेटवर्क, चुनाव रथ, हेलिकॉप्टर और विडियो फिल्मों का। अब शराब की बोतलें नहीं बांटी जातीं बल्कि पानी के बड़े-बड़े टैंकर शराब से भरकर गांव, मोहल्लों में पार्क कर दिए जाते हैं:
कबिरा खड़ा बाजर में लिए टैंकर भराय
जाको जितनी चाहिए बाल्टी भर-भर ले जाए। इससे उम्मीदवार की फिराक दिली का पता चलता है। वह पुराने जमाने के कैंडिडेट्स की तरह नहीं कि बोतलें बांटे और हिसाब रखे।
साकी मैं तेरी तंग दिली जानता हूं इसलिए ओक से पीता हूं कि अंदाज न हो।
मैंने सुना है कि अगले चुनाव में वीडियो की प्रचारात्मक शैली में भी आमूल परिवर्तन लाए जा रहे हैं। बंबइया फिल्मों के निर्देशक, संगीतकार, गीतकार, डांस मास्टर, फाइट मास्टरों की कड़ी निगरानी में उम्मीदवारों की शूटिंग गुपचुप चल रही है। इसमें शॉर्ट फिल्में बनाई जा रही हैं, जिसमें प्रत्याशी कभी डिस्को करता है, कभी गुंडों से ‘भारत माता’ की लाज बचाता है। टाइटल गीत में वह गाता हुआ पेड़ों के या जो भी उसका चुनाव चिह्न है उसके चक्कर लगाता है। बहुत ही चमत्कारिक डायलॉग रखे गए हैं। विरोधी दल के नेता का नाम लेकर हीरो (नेता) आंखें लाल करके ललकारता है ‘पूरन चंद अब ये ताला (सत्ता का) मैं तेरी जेब से चाबी निकाल कर ही खोलूंगा।’

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