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प्रकृति को कृषि से जुड़ाव का लोक पर्व सतुआन

 

अनिल मिश्र। भारत विविधताओं से भरा दुनियाभर में एकलौता एक देश है, जहां मौसम के बदलाव की सूचना भी तीज-त्याेहार, पर्व, उत्सव से मिलतें हैं। इन मान्यताओं, परंपराओं में हमारी सभ्यता और संस्कृति के अनगिनत सरोकार छुपे हुए हैं। भारतीय संस्कृति में उत्सवों, पर्वों और त्योहारों का आदि काल से काफी महत्व रहा है। हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां मनाए जानेवाले सभी तीज-त्याेहार समाज में मानवीय गुणों को स्थापित करके लोगों में प्रेम और एकता को बढ़ाते हैं। पर्वों, त्योहारों और उत्सवों का संबंध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है। वहीं भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां की लगभग पचहत्तर प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है। अधिकांश लोगों के जीविकोपार्जन का माध्यम खेती-कृषि है। इसी कारण हर तीज-त्याेहार प्रकृति और कृषि से जोड़कर मनाए जातें हैं। भारतीय जीवन में प्रकृति, उत्सव एवं समाज का एकात्मकता का अद्भुत सुखद और अद्भुत संयोजन है। इस संयोजन में हमारा सामाजिक जीवन सालों चलता रहता है। देश में सालाें तक चलने वाले तीज-त्योहार में लोकचेतना के रस और रंग भरे पड़े हैं। प्रकृति और परमात्मा से जुड़ाव का विभिन्न पर्व, तीज-त्योहार और उत्सव यहां अपने-अपने देशज तरीके से मनाए जाते रहे हैं। इन्हीं में से एक बिहार में मनायी जानेवाली लोकपर्व बिसुआ जिसे मुख्य रूप से सतुआन कहा जाता है। प्रत्येक साल 14 या 15 अप्रैल को बिहार के साथ-साथ इससे अलग बंटकर बने झारखंड के साथ साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश के अलावा नेपाल के तराई क्षेत्र में यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। मिथिला क्षेत्र में गुड शीतल, टटका-बासी, सतुआ संक्रांति या बिसुआ कहा जाता है। उत्तर भारत का लोक संस्कृति में प्रकृति से जुड़ाव का यह पर्व है। हम सौभाग्य और कामना पूर्ति के लिए सहज भाव से पूजा आराधना करते हैं। सतुआन बैशाख संक्रान्ति प्रति वर्ष आता है। जब सूर्य देव मीन से मेष राशि में प्रवेश करते हैं तो उसे मेष संक्रान्ति कहते हैं। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मेष संक्रान्ति के पहले दिन से सौर कैलेन्डर के नया साल प्रारंभ होता है। भारत में विभिन्न सौर कैलेन्डर हैं जैसे ओडिया, तमिल, मलयालम, और बंगाली कैलेंडर में मेष संक्रान्ति के पहले दिन को नववर्ष मनाते हैं। उडीसा में हिंदू अर्ध रात्रि को मेष संक्रान्ति को नववर्ष के रूप में मनाते हैं। वहीं असम में बिहु, बंगाल में नवा वर्ष या पोहला बोइसाख, केरल में बिशु, तमिलनाडू में पुथांडु, पंजाब- हरियाणा में बैशाखी तो वहीं बिहार सहित झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और तराई नेपाल में सतुआन बिसुआ कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन खरमास का समापन हो जाता है तथा मांगलिक कृत यथा वैवाहिक कार्य शादी-दुरागमन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। हिंदू पंचाग और ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक श्रद्धा और विश्वास के साथ पारंपरिक लोक पर्व सतुआ संक्रान्ति के अवसर पर अपने घरों में सूर्य देव और विष्णु भगवान की पूजा अर्चना करते हैं। इस अवसर पर भगवान के साथ-साथ पितरों को मिट्टी का घड़ा जल भरकर, जौ का सतु, गुड, आम के टिकोले का भोग लगाया जाता है।इस अवसर पर भगवान सूर्य और विष्णु को जौ के सत्तु, घी और गुड मिलाकर लड्डू बनाकर अर्पित किए जाते हैं। प्रेत योनि में भटक रहे मृत आत्माओं के नाम से सत्तु अर्पन करने से उनकी आत्मा को जहां शांति मिलती है, वहीं स्वर्ग लोक में वास करते हैं। इसी कारण भगवान विष्णु की नगरी और मोक्ष धाम बिहार के गया स्थित प्रेत शिला पहाड़ी पर सत्तु उड़ाया जाता है। गया शहर से दस किलोमीटर की दूरी पर प्रेत शिला पहाड़ स्थित है। इस पहाड़ी के 975 फीट उंचाई पर ब्रम्हा, विष्णु और महेश की प्रतिमा स्थापित है। जहां श्रद्धालु पिण्डदानी द्वारा पहाड़ी के चोटी पर स्थित चट्टान की परिक्रमा कर उस पर सत्तु उड़ाया जाता है। विष्णु पुराण के मुताबिक यहां पिण्डदान से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है और वो प्रेत योनि से मुक्त हो स्वर्ग में वास करतें हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु पितृदेवता के रूप में यहां विराजमान है। उत्तर भारत की यह लोक संस्कृति में प्रकृति से जुड़ान के पर्व ‘सतुआन ‘को लेकर कई कहानियाँ प्रचलित हैं। वैदिक काल में अपाला नाम की एक विदुषी महिला सफेद दाग जैसी बिमारी से ग्रस्त थी। उसने इस रोग से मुक्ति के लिए इंद्र देव कि तपस्या की और सत्तु का भोग लगाया तथा गन्ना का रस चढ़ाया। जो सामान्य सनातन धर्मावलंबी द्वारा किया जाता है। इन्द्र इस भोग को पाकर प्रसन्न हुए और अपाला को रोग मुक्त कर दिए। वहीं सतुआ नवीन फसल का यह पर्व है। सतुआन में खेतों से नये कटे अन्न जौ, चना आदि मोटे अनाज के सत्तु ,आम के टिकोरे, पुदीना के चटनी के साथ हरी मिर्च का प्रयोग होता है। प्राचीन काल में लोगों का मुख्य भोजन में जौ, गेंहू, मक्का, चना आदि मोटा अनाज होता था। कहा जाता है कि ॠषि-मुनियों का मुख्य आहार जौ हीं था। सिन्धु घाटी सभ्यता में भी मुख्य भोजन जौ हुआ करता था। इसके अलावा वेदों में यज्ञ की आहूति के रूप में भी जौ को स्वीकार किया गया। प्राचीन काल से सत्तु अक्सर सात मोटे अनाज मिलाकर बनाया जाता है। ये मक्का, जौ, चना, खेसारी, अरहर, कुलथी, मटर को भुनकर पीस लिया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार सत्तु का सेवन उल्टी, गले की बिमारी, आंखों का रोग, भूख-प्यास और कई बीमारियों में फायदेमंद है। वहीं सतु में प्रचुर मात्रा में फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि पाया जाता है। जो मानव के शरीर को ठंठक प्रदान करता है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बंगाल जैसे राज्यों के लोगों के बीच सत्तु काफी मशहूर और लोकप्रिय है। कभी गरीब आदमी का प्रोटीन कहे जाने वाला सत्तु अब बिहार छोड़कर पूरे देश हीं नहीं बल्कि दुनियाभर में अपनी एक अलग पहचान बना रहा है। यही वजह है कि सत्तु को सुपर फूड्स की श्रेणी में भी शामिल किया गया है। सत्तु का सेवन आमतौर पर गर्मी के दिनों में किया जाता है। यह पेट को ठंडा रखने में मदद करता है। सत्तु खाने का सिलसिला यहीं नहीं खत्म होता। बिहारी व्यंजन में अगर लिट्टी की बात नहीं हो तो यह अधुरी है। आंटे से बने लिट्टी में सत्तु को उसके बीच में भरे होने का स्वाद का आनंद देश-विदेश में भी प्रचलित है। सत्तु जहां खाने में स्वादिष्ट होता है वहीं स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी काफी फायदेमंद है। एक ओर जहां कभी गरीब लोगों का पेट भरने का जरिया मोटा अनाज से बने सत्तु होता था। वहीं सेहत का खजाना भी हुआ करता था। कालांतर में इसकी उपज को लेकर लोगों में शिथिलता के कारण इसके उत्पादन न के बराबर हो गया है। हाल के दिनों में भारत सरकार द्वारा मोटे अनाज के उत्पादन को पुनर्जीवित करने के प्रयास से इसके बुआई व उत्पादन क्षमता बढ़ाने से जहां एक ओर भूखमरी जैसे प्राकृतिक आपदा से राहत मिलेगा। वहीं इन अनाजों में छिपे सेहत का खजाना से लोगों को आने वाले समय में काफी फायदा होने की उम्मीद है।

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