मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनासटायर : मुझे भारत रत्न दिला दो

सटायर : मुझे भारत रत्न दिला दो

डॉ. रवींद्र कुमार

आजकल डर लगा रहता है कहीं कोई मेरे से बदला लेने के लिए मुझे भारत रत्न दिलाने की बात न छेड़ दे। बात छेड़े तो छेड़े, कहीं आंदोलन ही न छेड़ दे। आपको तो पता है इधर आंदोलन छिड़ा, उधर कितने लोग इसमें आ कूदेंगे। भीड़ का एक भभ्भड़ सा जुट जाएगा जंतर-मंतर पर। आनन-फानन में कोई आमरण अनशन की घोषणा कर देगा। मैं भला क्या बिगाड़ लूंगा उसका? टीवी का माइक पकड़े लड़के-लड़कियां अलग भागते डोलेंगे मेरे पीछे-पीछे: `… यही है हिंदी के महान गुमनाम ‘साहित्यकार’ का गुमनाम-सा मकान… शहर से दूर… बस्ती से दूर…देखिए वैâसे इस घर की दीवारें बोल रही हैं, जबकि अंदर घर में चारों ओर सन्नाटा पसरा पड़ा है या सन्नाटा बोल रहा है…और हो भी क्यों न..’
दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों में वैंâडल लेकर ‘लेडीज’ लोग अलग तैयार बैठी हैं कि कब वे वैंâडल मार्च निकालें ताकि टीवी पर कवरेज मिले। पीछे नाम आमंत्रित किए गए थे तो चयन समिति के सदस्यों ने अपनी पत्नी, पुत्र-पुत्रियों के नाम की अनुशंसा कर दी थी। सच है ‘चैरिटी बिगिन्स एट होम’ नहीं तो कहावत झूठी न पड़ जाती। अपने लिए सफेद झूठ बोलना शुरू में मुश्किल मालूम देता है।
मैं भारत का एक अदना नागरिक हूं। आप इंडियन कहो, हिंदू कहो या ‘अलपसंख्यक।’ मैं अपने आप को कलप संख्यक मानता हूं। सभी छोटी-छोटी चीजों के लिए कलपना पड़ता है। मेरे जैसे इस देश में बहुत `कलप’ संख्यक हैं। दरअसल, इस देश में हम कलपसंख्यक ही बहुसंख्यक हैं। मैं बड़ा ही शांति प्रिय जीव हूं। हमेशा ट्रैफिक सिपाही को भी कमिश्नर पुलिस समझता हूं। जब जितने पैसे ट्रैफिक सिगनल पर, टोल पर मांगते हैं मैं बगैर चूं चां के दे देता हूं। इनकम हो न हो, ये बैरी ऑफिस वाले सीधे-सीधे इनकम टैक्स काट लेते हैं। सच पूछो तो जितना खर्चा-पानी भारत रत्न बनवाने में आएगा उससे कई गुना अधिक इनकम टैक्स मेरे खाते में जमा हो गया है।
टमाटर, कांदा आप जिस भाव बेचते हो मैं उस भाव खरीदता हूं। दूध, गाय-भैंस का या फिर वैâमीकल का जिस भाव बिका मैंने उस भाव खरीदा है और सदैव इतने चाव से उसकी कीटनाशक मिली चाय पी है कि इतने चाव से तो द्वापर में कन्हैया ने लस्सी न पी होगी। पेट्रोल, गैस, दालें जब भी जितने रेट की रही हों उतने पैसे देकर खरीदी हैं। आंदोलन तो दूर कभी उसका सोचा भी नहीं। मल्टीप्लैक्स वाले लोटा भर पानी ढाई सौ रुपए में बोतल में डाल कर बेचते हैं मैं खरीदता हूं और तो और पांच सौ रुपए का बर्गर भी खाया है मैंने। ये सोच के कि ‘क्या पता! मेरे इस पैसे से ही विकास हो रहा होगा।’ मैं हर दिन भारत की पावनभूमि पर ठगा जाता हूं।
मैं इस महंगाई के दौर में बच्चों को पढ़ा रहा हूं, जहां ज्यादा पढ़ गए हैं उन्हें वापिस ‘लाईन’ पर ला रहा हूं। अब भला आप ही बताओ? है कोई जो आपके इस भारतरत्न का मुझ से अधिक लायक हो? अब अगर मैं चूक जाऊं तो इसी बात से चूक सकता हूं कि मेरे पास ले-देकर एक ही सैलरी खाता है और पूरा घर उसी से खाता है। इसके अलावा दूसरा खाता न तो स्विट्जरलैंड में है न किसी और ‘लैंड’ में। जितने वेतन आयोग बनते गए मैं उतना ही बे-वेतन होता गया हूं। मैं आपके लिए वोट भी नहीं बटोर सकता। अपना वोट आपको दे सकता हूं। अब आप सोचो मैं इतनी विकट परिस्थिति में भी जिंदा हूं और खुशहाल होने की कित्ती अच्छी एक्टिंग कर रहा हूं। भला इससे बढ़ कर भारतरत्न के लिए आपको और क्या दरकार है? अब एक मेडल के लिए छोरे की जान लोगे क्या?

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