मुख्यपृष्ठस्तंभसटायर : तू खींच मेरी फोटो...

सटायर : तू खींच मेरी फोटो…

डॉ. रवींद्र कुमार

जिंदगी में कूड़े का बहुत महत्व है। प्राचीन समय से ही घूरे की पूजा का रिवाज है। कूड़े से जैविक खाद बनती है। इधर देखता हूं कूड़े के चलते बहुतों की राजनीति चल निकली है। जगह-जगह बाल्टी भर-भरकर पहले कूड़ा लाया जाता है। लंबे हैंडल वाली डिजाइनर्स झाड़ू आजकल इसके भी अनेक नाम हो गए हैं ब्रूम, वाईपर आदि। स्वच्छता दिवस के लिए देसी झाड़ू में अच्छा चिकना-सा हैंडल (डंडा) लगाकर एक तरह की ‘हाइब्रिड’ झाड़ू तैयार की जाती है। अब क्योंकि झाड़ू सेलिब्रिटीज के हाथों तक पहुंचने से पहले न जाने कितने और वैâसे-वैâसे ‘डर्टी’ हाथों से गुजरती होगी, इन्फेक्शन का खतरा रहेगा। अत: सुंदर, सॉफ्ट महंगे मैचिंग ग्लव्स भी चाहिए होते हैं। सभी सेलिब्रिटीज डिजाइनर्स पोशाक में आए हैं। कलफ लगी लक-दक कड़क। महिला नेत्रियां तो भाग लेने सीधे ब्यूटी पार्लर से भागते-भागते आ रही हैं। वे सब महंगी-महंगी एस.यू.वी. और लंबी-लंबी ए़ सी. कारों से पृथ्वी पर एक-एक करके पल्लू संभालते,ड्रेस ठीक-ठाक करते अवतरित हो रही हैं। मंद-मंद सौम्य मुस्कान के साथ। पता नहीं कौन-किस एंगल से फोटू खींच रहा हो। सभी आकर मुख्य अतिथि को घेरकर उनके आस-पास खड़े हो जाते हैं, तभी पहले से नामित एक सफारी सूट धारक सफाईकर्मी कूड़े को इस तरह बिखेर देता है कि सबके हिस्से में दो-दो, तीन-तीन टुकड़े आ जाएं। कूड़ा क्या, पहले से फाड़े हुए सफेद कागज के टुकड़े हैं। थोड़ा हास्यास्पद दृश्य बन रहा है, क्योंकि उनका इतने लंबे-लंबे हैंडल (डंडे) वाले झाड़ू पकड़ने का जिंदगी में ये पहला मौका था। उनके कानों में गूंज रहा था…`(ऐ कुर्सी) मैं तेरे प्यार में क्या-क्या न बना…’ उन्हें पता ही नहीं चल रहा कि डंडे को वैâसे और कहां से पकड़ना है। कन्फ्यूज से हैं। वातावरण में बहुत एक्साइटमेंट है। लाउडस्पीकर से देशभक्ति के गाने सुबह से ही बज रहे हैं। आखिर सोनेवालों को जगाना भी है। नए नए भक्क सफेद हैंड टॉवल रखे हुए हैं। खुशबू वाले लिक्विड साबुन के स्प्रे रखे हुए हैं। ‘सफाई’ के बाद लाइट रिप्रâेशमेंट का भी इंतजाम है। भुने हुए काजू, ढोकला, टी-कॉफी, महंगी क्रॉकरी से लेकर पेपर प्लेट, कप का इफरात में इंतजाम है। जब सब एक पंक्ति में खड़े हो गए और मंद-मंद मुस्कराने लगे तभी आवाज आई ‘लाइट…साउंड…वैâमरा… एक्शन…’ कहते ही सभी अफरातफरी में झाड़ू घुमाने लगे। तभी चीख की आवाज आई, किसी का हैंडल किसी की नाक पर लग गया। शूटिंग रोक देनी पड़ी। वो तो अच्छा हुआ कि फर्स्ट-एड बॉक्स मौजूद था सो फौरन मरहम पट्टी कर दी। डॉक्टर ने जोश-जोश में टिटनेस का इंजेक्शन भी लगा दिया। डॉक्टर साब का बस चलता तो ऑक्सिजन देने और खून चढ़ाने में भी देर न लगाते। दरअसल, उनकी मनचाही जगह ट्रांसफर की फाइल मंत्रालय में पेंडिंग है।
पुनः एक बार फिर लाईट …साउंड…कैमरा…एक्शन… और चमचमाती सड़क पर झाडू चलने लगी। हाय! कितना मनमोहक दृश्य था। नेता, नेत्री, सिने तारिका जिस नजाकत से कभी फ्रंट पोज, कभी साइड पोज, कभी क्लोज-अप दे रहे थे देखते ही बनता था। दरअसल, कागज कम थे और झाडू ज्यादा। कितने वी़ आई.पी. आ जाएं सोचकर दो दर्जन झाडू और चार रिम कागज (ए-४ बंडल) के लाकर रखे हुए थे। सबने इतने मोहक-मोहक चित्र खिंचवाए, भले झाडू थोड़ी आड़ी-तिरछी पकड़ी हुई थी।

अन्य समाचार