मुख्यपृष्ठस्तंभधर्म-ग्रंथ सहेजने की वस्तु नहीं

धर्म-ग्रंथ सहेजने की वस्तु नहीं

डॉ.दिनदयाल मुरारका। मिश्र देश में एक लोकप्रिय संत सेरोपिया हुए। वे बचपन से ही बहुत परोपकारी थे। दूसरों की सेवा करना उनकी दिनचर्या का एक हिस्सा था। इससे उन्हें बहुत सुकून मिलता था। संत का पहनावा बहुत ही सादा था। वे हमेशा मोटे कपड़े का चोगा पहनते थे। एक दिन उनके चोगे को फटा हुआ देखकर एक व्यक्ति ने उनसे कहा, आपका चोगा फट गया है। इसके बदले नया चोगा क्यों नहीं पहनते? संत ने कहा, भाई बात यह है कि मैं मानता हूं कि एक इंसान को दूसरे इंसान की मदद करनी चाहिए। इसके लिए उसे अपने शरीर का बिल्कुल खयाल नहीं करना चाहिए। यही धर्म की सीख हैं और आदेश भी। उस व्यक्ति ने हैरान होकर पूछा, धर्म की सीख, जरा वो ग्रंथ तो दिखाइए, जिसमें ऐसा आदेश दिया हुआ है।
संत ने कहा, वह ग्रंथ मेरे पास नहीं हैं, मैंने उसे बेच दिया। उस व्यक्ति को हंसी आ गई। वो बोला क्या पवित्र ग्रंथ भी कभी बेचा जाता है? संत ने कहा, बेशक बेचा जाता है। जो ग्रंथ दूसरों की सेवा करने के लिए अपनी चीजों को बेचने का उपदेश देता है, उसे बेचने में कोई हर्ज नहीं है। इस ग्रंथ को बेचने पर जो रकम मिली थी, उसे मैंने जरूरतमंदों की जरूरतें पूरी कीं, जिसके पास भी वह ग्रंथ होगा, उसके गुणों का विकास होगा। वह परोपकारी बनेगा।
किसी भी धर्म का पवित्र ग्रंथ के सहेजकर रखने के लिए नहीं होता है, बल्कि उसमें लिखे हुए ज्ञान का अनुसरण करने के लिए होता है। ईश्वर को पूजा-पाठ में तलाशने के साथ-साथ, अपने काम के प्रति निष्ठा और ईमानदारी जैसी वृत्तियों को भी बनाए रखें। जहां तक हमारे बस में हो, हम कोई ऐसा काम नहीं करें, जिससे किसी निर्दोष को तकलीफ हो। अच्छे काम से मेरा मतलब है अपनी और अपने आस-पास की दुनिया को संवारना। हम सबमें ईश्वर के वास की बात करते हैं। दुनिया में थोड़ी-सी भी खुशी यदि हम बिखेर सकें तो यही हमारी सबसे बड़ी खुशी होगी। हमारे आनंद का पल होगा। ऐसा करना ही हमारा कर्म है और यही हमारा धर्म है। वास्तव में इस दुनिया में हमारा ज्ञान, हमारा अस्तित्व, सदा दूसरों की भलाई के काम में आना चाहिए।

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