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संपादकीय : दूसरी आजादी!

पूरी दुनिया को डरानेवाले कोरोना की दहशत अब कम हो गई है। मरीजों की संख्या और मृत्यु दर दिन-प्रतिदिन कम होने के कारण कोरोना से संबंधित नियमों और पाबंदियों का बोझ उतारकर जनता को बंधनमुक्त करना भी उतना ही जरूरी था। उसके अनुसार केंद्र सरकार ने ३१ मार्च से पूरे देश में कोरोना से संबंधित पाबंदियों को वापस लेने का निर्णय लिया है। कोरोना से मुकाबला करने के लिए लगाई गई पाबंदियों के कारण सिर्फ देश के नागरिकों को ही परेशानी हुई थी ऐसा नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था का दम भी घुट गया था। लॉकडाउन जैसे अपरिहार्य एवं सख्त कदम हिंदुस्थान ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के देशों को उठाने पड़े थे। उद्योग, व्यापार, कारखाना, कार्यालय हर तरफ तालाबंदी का अभूतपूर्व दृश्य दुनिया ने देखा। वीरान सड़कें, भयानक शांति और कोरोना मरीजों को लेकर रफ्तार से दौड़नेवाली एंबुलेंस का दृश्य ही हर गांव में नजर आता था। सुनाई देती थी तो सिर्फ रूह कंपानेवाली एंबुलेंस की सायरन की आवाज! कोरोना की पहली व दूसरी लहर की ये कड़वी यादें आज भी सभी के शरीर में सिहरन पैदा कर देती हैं। एक-दूसरे के संपर्क से संक्रमण के बढ़ने से वैश्विक स्वास्थ्य संगठन के निर्देशानुसार दुनियाभर के देशों ने कोरोना का मुकाबला करने के लिए पाबंदियों की एक सूची ही तैयार की थी। हमारे यहां भी केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को समय-समय पर दिशा-निर्देश देकर कोरोना प्रतिबंधक पाबंदियों का सख्ती के साथ व प्रभावी ढंग से अमल में लाने को आगाह किया था। राजनीतिक कीचड़ उछालने की छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो केंद्र व तमाम राज्य सरकारों ने इस वैश्विक संकट के कठिन दौर में हाथ में हाथ डालकर काम किया। लगभग २४ महीने कोरोना को रोकने के लिए अलग-अलग योजनाएं बनाई गर्इं। हर चरण में कोरोना की महामारी ने जैसे-जैसे उग्र रूप धारण किया, वैसे-वैसे पाबंदियों में भी बदलाव होता गया। आज तक कभी नहीं देखी थी, ऐसी इस बीमारी से लड़ें वैâसे? यही चिकित्सा विशेषज्ञों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी। कोरोना की जांच, स्क्रीनिंग, मॉनिटरिंग, कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग, मकान, कॉलोनी सील करना, सेनेटाइज करना, पीपीई किट पहनकर डॉक्टर एवं स्वास्थ्यकर्मियों के लिए इलाज करने की मजबूरी ये सब दृश्य अनोखा ही था। देश का, सरकारों का, प्रशासन का, स्वास्थ्य सेवा का और देशवासियों के भी सत्व परीक्षण का यह काल था। परंतु देश के नागरिकों एवं प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों ने समर्पित भाव से कोविड संकट का बड़े धैर्य से मुकाबला किया। ‘जहां हो वहीं रुक जाओ’ इस आदेश के साथ देशभर में लागू किया गया लॉकडाउन और उसी के साथ कोरोना को रोकने के लिए जारी की गई तमाम पाबंदियों पर अमल करने में जनता ने भी केंद्र व राज्य सरकारों का अनमोल साथ दिया। ये पाबंदियां मतलब हमारी आजादी का हनन न होकर हमारे ही जीवन की रक्षा के लिए सरकार को मजबूरी में कदम उठाने पड़ रहे हैं। इसे जनता ने पूरी तरह समझा। इसलिए केंद्र और राज्य सरकार से समय-समय पर मिलनेवाले निर्देशों एवं कोविड प्रतिबंधक आचार संहिता का सख्ती से पालन किया। इलाज के साथ-साथ सरकार द्वारा कोविड प्रतिबंधक वैक्सीन के निर्माण के लिए किए गए प्रयास और हिंदुस्थान जैसे देश में टीकाकरण का राष्ट्रीय कार्यक्रम अमल में लाना निश्चित तौर पर आसान नहीं था। फिर भी देश के नागरिकों को अब तक १८१.५६ करोड़ वैक्सीन की खुराक दी गई है। लगातार दो वर्षों तक देश की जनता ने कोविड प्रतिबंधक नियमों का ईमानदारी से पालन किया है। कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए सरकार से किया गया सहयोग, टीकाकरण मुहिम का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन के कारण ही कोरोना के प्रकोप का प्रभाव कम हुआ। कोरोना की दहशत का साया दूर हुआ। इसीलिए केंद्र सरकार ने दो साल पहले लगाई गई तमाम पाबंदियों को ३१ मार्च से हटाने का निर्णय लिया है। परंतु मास्क का इस्तेमाल और सुरक्षित अंतर इन दो पाबंदियों का पालन करना ही होगा। केंद्र द्वारा हटाई गर्इं पाबंदियां एक तरह से दूसरी आजादी ही है। परंतु दोबारा पाबंदियों की गुलामी न आए, यह एहतियात देश के हर नागरिक को बरतना ही होगा। कोरोना की लड़ाई में हमने पांच लाख से अधिक देशवासियों को गंवाया है। इसे हम भूल नहीं सकते हैं।

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