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सावन के झूलों में जीवन का रहस्य

सावन के महीने में झूला झूलने का विशेष महत्व माना जाता है। इसके पीछे कुछ पौराणिक मान्यताएं तो हैं ही, साथ ही ये स्वास्थ्य लाभ भी देता है। सावन में अब झूलों का चलन बहुत ही कम हो गया है, कुछ जगहों पर ही झूले देखने को मिलते हैं। चिकित्सकों के अनुसार झूला झूलने के पीछे के रहस्यों को जानकर आप झूला झूलने के लिए विवश हो जाएंगे।
वरिष्ठ मनोचिकित्सक
आज के दौर में तनावमुक्त रहना बहुत मुश्किल हो चुका है। सावन का महीना हरा भरा महीना होता है और इस महीने में मन को तरोताजा रखने का माहौल प्रकृति देती है। इस हरे भरे और लुभावने वातावरण में तनावमुक्त रहने और अपने आप को खुशी देने का आसान और सस्ता विकल्प झूला होता है। इसलिए सावन के महीने में झूले का प्रचलन है।
कोशिकाएं सक्रिय हो उठती हैं
वहीं चिकित्सक कहते हैं कि हमारे शरीर के हर अंग को लगभग २५ फीसदी कोशिकाएं सुस्त रहती हैं। इन निष्क्रिय कोशिकाओं को सक्रिय रखने के लिए झूला झूलने का व्यायाम बहुत की सरल होता है। झूला झूलने से हमारे शरीर की ऑक्सीजन निष्क्रिय कोशिकाओं को नया आयाम देती है और ये कोशिकाएं सक्रिय हो उठती हैं।
पारंपरिक परंपरा
सावन के महीने में हरे भरे पेड़ के नीचे झूला डालने की परंपरा महज एक परंपरा ही नहीं है। बल्कि ये मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत लाभकारी है। झूला झूलने से शरीर का एक व्यायाम तो होता ही है साथ ही ये फेफड़े, हृदय और अन्य अंगों को फायदा पहुंचाता है। अस्थि रोग विशेषज्ञ का कहना है कि पैरों से दबाव डालकर झोटे लेने पर मांसपेशियों का व्यायाम होता है जिससे मांसपेशियों को मजबूती मिलती है।
शुद्ध ऑक्सीजन का स्रोत
झूले अक्सर नीम, आम, बरगद के पेड़ों पर डाले जाते हैंं। बरसात के मौसम में इन पेड़ों से ऑक्सीजन की अच्छी खासी मात्रा शरीर को मिलती है। इससे शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है। वहीं बुजुर्ग इस मौमस में पेड़ों के नीचे झूला झूलते हैं तो तो मानसिक तनाव से उन्हें मुक्ति मिलती है।
अब कम दिखते हैं झूले
एक दौर था जब झूलों पर फिल्मी गाने फिल्माए जाते थे, लेकिन आज के इस भागदौड़ भरे जीवन में झूले खत्म होने के कगार पर हैं। अब न तो शहरों में पेड़ बचे हैं और न एकल परिवारों के दौर में ये परंपरा। झूला झूलने की परंपरा अब विलुप्त होती जा रही है।

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