रोते देखा

हमने खुद को रोते देखा।
विश्व वेदना ढोते देखा।।
आंखों के ही ठीक सामने।
खेल तमाशा होते देखा।।
अपने ही प्यारे मित्रों को।
रोज एकता खोते देखा।।
क्रांति हमारी जाग रही थी।
मगर समय को सोते देखा।।
सत्ता के घर में कुबेर को।
हरदम पूड़ी पोते देखा।।
पूंजी के सारे दलाल को।
बस्ती में दुख बोते देखा।।
धनबल के आगे मौसम को।
अपना सब कुछ खोते देखा।।
जीते जी ही लाचारी में।
बदहाली को होते देखा।।
अपने घर की सारी पूंजी।
नादानी में खोते देखा।।
नासमझी का नाच देखकर।
मौसम को भी रोते देखा।।
हमने खुद को रोते देखा।
विश्व वेदना ढोते देखा।।

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