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गांधीगीरी की राह पर कश्मीर के अलगाववादी! २०१४ में यासीन मलिक ने शुरू की थी गांधीगीरी, अब सज्जाद लोन भी उसे अपनाएंगे

सुरेश एस. डुग्गर / जम्मू

यह पूरी तरह से सच है कि कश्मीर के अलगावा वादी नेता अब गांधीगीरी की राह पर चलना चाहते हैं। वैसे कश्मीर के अलगाव वादियों द्वारा गांधीगीरी का रास्ता अपनाना कोई नई बात नहीं है, बल्कि वर्ष २०१४ में जेकेएलएफ नेता यासीन मलिक एक बार ऐसा कर चुके हैं और वे अभी भी तिहाड़ जेल में इसी ‘हथियार’ का इस्तेमाल कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में बाहरी नागरिकों को विधानसभा चुनावों में भी मतदान का अधिकर देने का विवाद मुद्दा बना हुआ है। हालांकि अन्य राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा अलगाववादी दल विरोध प्रदर्शनों को हथियार बनाए हुए हैं पर जम्मू कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस – जेकेपीसी ने अलग ही रास्ता चुना है। वह अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए गांधीगीरी करेगी।
पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और तत्कालीन राज्य सरकार में मंत्री रह चुके व अपने आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का छोटा भाई कहनेवाले सज्जाद गनी लोन ने संसद के समक्ष इस मांग की खातिर धरना देने और भूख हड़ताल करने की बात कही है। वे कहते थे कि अगर जरूरत पड़ी तो वे आमरण अनशन भी करेंगे।
यह बात अलग थी कि बाहरी लोगों को विधानसभा चुनावों में मतदान का अधिकार देने के मुद्दे को सभी दल प्रदेश के डेमोग्राफी बदलाव के तौर पर देख रहे थे। सज्जाद गनी लोन भी ऐसा कहते थे पर उनका कहना था कि यह मामला लोकतंत्र का है तो लोकतांत्रिक तरीके से ही इसका विरोध होना चाहिए। वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं कि कोई अलगाववादी दल अपनी मांगों के लिए भूख हड़ताल या फिर आमरण अनशन का सहारा लेना चाहता हो, बल्कि वर्ष २०१४ में कथित पुलिस अत्याचारों के विरुद्ध जेकेएलएफ नेता यासीन मलिक अपने साथियों समेत श्रीनगर के लाल चौक में तीन दिनों की भूख हड़ताल पर बैठ चुके हैं। तब अन्य अलगाववादी नेताओं ने उनके इस कदम पर हैरानगी जताई थी। याद रहे अभी तिहाड़ जेल में बंद मलिक ने थोड़े दिन पहले भी गांधागीरी का ही सहारा लेते हुए जेल में भूख हड़ताल को कई दिनों तक जारी रखा था।

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