मुख्यपृष्ठस्तंभमझगांव में ‘सेवन वंडर्स’! शहर का दूसरा हैंगिंग गार्डन है यहां

मझगांव में ‘सेवन वंडर्स’! शहर का दूसरा हैंगिंग गार्डन है यहां

विमल मिश्र

मुंबई जितना ऊपर है, उतना ही नीचे भी। आसमान चूमने वाले इस शहर में उसके ऐसे कई भूमिगत अंग हैं, जो प्यास बुझाने सहित उसके लोगों की पानी की तमाम जरूरतें पूरी करते हैं। मलबार हिल का हैंगिंग गार्डन उसके नीचे मौजूद जलाशय के पुनर्निर्माण को लेकर जब सुर्खियों में है, तो शहर के एक दूसरे हैंगिंग गार्डन के बारे में जानने का मौका है, जिसके बारे में बहुतों ने सुना भी नहीं होगा। दु‌निया भर के आश्चर्यों को समाए मझगांव का जोसेफ बैप्टिस्टा गार्डन अपने-आप में भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

५, ४४, ००० वर्ग फुट में फैला यह शहर के सबसे बड़े और पुराने बागों में से है। पूर्वी समुद्री तट और ईस्टर्न एक्सप्रेस फ्रीवे सहित दक्षिणी मुंबई का विहंगम नजारा यहां से देखा जा सकता है। मुंबई महानगरपालिका द्वारा दुनिया के सात आश्चर्यों के प्रतिरूप स्थापित किए जाने के बाद यह मुंबई का नया पर्यटन आकर्षण भी बन गया है। यह है मझगांव का जोसेफ बैप्टिस्टा गार्डन।

जोसेफ बैप्टिस्टा गार्डन, दरअसल उद्यान नहीं, मलबार हिल के हैंगिंग गार्डन की तरह मझगांव की भंडारवाडा पहाड़ी पर बना मुंबई का अत्यंत प्राचीन मझगांव किला होता था। मुंबई का एक प्रमुख जलाशय। वह जानकारी, जो डॉकयार्ड रोड में रहने वाले लोगों को भी मालूम नहीं, जिसके रेलवे स्टेशन के ठीक बाहर यह उद्यान है।

किले की जगह के नीचे है जलाशय

मझगांव किला का अब कोई अवशेष मौजूद नहीं है। यह १६८० के आस-पास निर्मित ब्रिटिश काल का किला था और महाराष्ट्र के सबसे प्राचीन किलों में अपनी गिनती कराता था। सिद्दी सेनानायक याकूत खान ने जून, १६९० में हमला कर इसे नेस्तनाबूद कर डाला।
‘मलबार हिल के बाहर मुंबई में यह दूसरा हैंगिंग गार्डन है’, यहां के हेड माली प्रेमानंद ने विशाल उद्यान परिसर में घुमाते हुए हमें बताया। एक के ऊपर एक-तीन टंकियों वाला यह उद्यान दरअसल, अपने- आप में एक चमत्कार है। ऊपर से इसे देखकर कल्पना भी नहीं की जा सकती कि इसके नीचे हमारे नलों को पानी सप्लाई करने वाली अंडरग्राउंड पाइपलाइनों का एक जटिल नेटवर्क छिपा हो सकता है।

मुंबई में उसके उपनगरों सहित लगभग १७ छोटे जलाशय हैं, जो लगभग ६५० किमी ट्रांसमिशन मेन, ३२,००० किमी डिस्ट्रिब्यूशन मेन और ३,२०० किलोमीटर सर्विस पाइप के माध्यम से पानी की सप्लाई करते हैं। १८४० के दशक में मुंबईवासियों द्वारा पेयजल की कमी पर छेड़े आंदोलन ने ब्रिटिश नागरिक प्रशासन को मुख्य भूमि में १०० किलोमीटर तक जल स्रोतों से संधान के लिए प्रेरित किया। ये निवासी शहर के कुओं और तालाबों पर निर्भर थे, जिनमें भायखला टैंक, बाबूला तालाब और मुंबादेवी तालाब शामिल थे। बढ़ती आबादी के साथ ये जलस्रोत सूखने लगे या खारे हो गए थे। बेसाल्ट रॉक पहाड़ियों को चुनकर मझगांव जलाशय का निर्माण १८८४ में किया गया था। भंडारवाड़ा हिल जलाशय की क्षमता १०० मिलियन लीटर है। इसे तानसा, वैतरणा और भात्सा झीलों से पानी मिलता है।

जब हमने भंडारवाड़ा हिल जलाशय देखा, तब इनमें एक टंकी फिलहाल, कार्यरत नहीं थी। सिक्यूरटी कर्मी गणेश ने आस-पास के इलाकों को पानी की सप्लाई करने वाली मशीनरी के तहत विशेष सुरक्षा उपायों की बाबत हमें बताया, जो हमें नजर नहीं आए। कुछ वर्ष पहले उद्यान के सुंदरीकरण की योजना को २.६ करोड़ रुपए लागत से अंजाम दिया गया, जिसके पूरा होने के बाद स्थानीय के अलावा दूसरे पर्यटक भी यहां आने लगे हैं। यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है खूबसूरती से तराशी घास पर बने ‘वंडर’ कहलाने वाले विश्व भर के स्मारक, जिनमें पीसा की झुकी मीनार, न्यू यार्क की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी, रियो डी जेनेरियो का क्राइस्ट द रिडीमर, रोम का कोलेसियम, पेरिस का ऐफिल टॉवर, मैक्सिको का चिचेन इट्जा पिरामिड और हमारा अपना ताजमहल। डेढ़ एकड़ में पैâला यह संरक्षित पार्क है – प्लेइंग एरिया और जॉगिंग ट्रैक के साथ। मुंबई के सबसे पुराने बैंड स्टैंडों में से एक इसी पार्क में है।
मुंबई गोदी के पास मझगांव का यह इलाका कभी मलबार हिल से भी अधिक पॉश होता था। पुराने बंगलों ने आज भी इसकी शान कायम रखी है। गांवदेवी मंदिर और सेंट मेरी स्कूल यहां से ज्यादा दूर नहीं हैं। यहां से पूर्वी समुद्री तट और नए ईस्टर्न एक्सप्रेस प्रâी वे सहित दक्षिणी मुंबई का नजारा साफ दिखता है, दूर आकाश में उड़ते सारस पं‌छियों की तरह।
स्वतंत्रता सेनानी जोसेफ बैप्टिस्टा की याद में
लोकमान्य गंगाधर तिलक के समकालीन स्वतंत्रता सेनानी काका या जोसेफ बैप्टिस्टा, जिनके नाम पर यह उद्यान है, ईस्ट इंडियन समुदाय से ताल्लुक रखते थे। उद्यान की सौंदर्यीकरण योजना के तहत यहां उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है।
‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ आम विश्वास है कि यह नारा लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का दि‌या हुआ है, पर बैप्टिस्टा के प्रशंसकों का मानना है कि यह उद्घोष उनकी देन है और‌ तिलक महाराज ने उसे लोकप्रिय बनाकर लोगों की जुबान पर चढ़ाने का काम किया। मझगांव में ईस्ट इंडियन समुदाय के गांव म्हातारपाखडी में पैदा जोसेफ या काका बैप्टिस्टा लोकमान्य तिलक के अनुयायी थे। १९१६ में एनी बेसेंट के ‘होम रूल आंदोलन’ के पुरोधा। १९२५ – २६ में वे मुंबई के महापौर भी रहे। १९३० में देहांत के बाद शिवड़ी के एक कब्रिस्तान में बैप्टिस्टा अंतिम नींद में सोए हुए हैं। मनोरी का ईस्ट इंडियन म्यूजियम – भी उनके नाम पर ही है। उत्तन में भी – जहां उनका पैत्रिक गांव है – उनकी एक प्रतिमा है।

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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