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शिंदे सरकार का चला हंटर कोविड प्रभावित बच्चों का विशेष कोटे में नहीं होगा दाखिला!

सामना संवाददाता / मुंबई
शिंदे सरकार हमेशा से प्रदेश में शिक्षा के स्तर को मजबूत करने का दावा करते रही है। लेकिन उसके दावों की अब पोल खुल चुकी है। सूत्रों के मुताबिक महाविकास आघाड़ी सरकार के कार्यकाल में कोविड प्रभावित बच्चों के लिए आरटीई के तहत शुरू किए गए विशेष कोटा पर इस सरकार ने हंटर चला दिया है। इस कोटे को खत्म किए जाने से अब आगे से कोविड प्रभावित बच्चों का अच्छे स्कूलों में दाखिला नहीं हो सकेगा। इसे लेकर कोविड प्रभावित लोग तीखी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि कोरोना महामारी के दौरान अपने माता-पिता को खो चुके अनाथ बच्चों के लिए साल २०२१ में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली वैâबिनेट ने शिक्षा और सरकारी नौकरियों में विशेष कोटा को मंजूरी दी थी। महाविकास आघाड़ी सरकार गिरने के बाद सत्ता में आई शिंदे सरकार ने मविआ के इस प्रस्ताव को काफी समय के बाद हरी झंडी दिखाते हुए शासनादेश जारी किया था। इसके तहत प्रदेश में रहनेवाले अनाथ बच्चों को शिक्षा और नौकरी में एक फीसदी का आरक्षण दिया जाना है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि १८ साल की उम्र से पहले अपने माता-पिता दोनों को खो देने वाले बच्चे भी नौकरी के लिए पात्र होंगे। साथ ही यह भी बताया गया कि अनाथों के लिए एक फीसदी आरक्षण नौकरियों में रिक्तियों की कुल संख्या और प्रवेश के लिए सामान्य सीटों की संख्या के आधार पर प्रदान किया जाएगा।
बता दें कि राज्य में चार हजार से अधिक बच्चे अनाथ हैं। जिनका कोई रिश्तेदार नहीं है, उन बच्चों को ‘ए’ श्रेणी, जिन बच्चों ने माता-पिता को खो दिया है, उनके पास कोई जाति प्रमाण पत्र नहीं है और वे अनाथालय में रह रहे हैं, उन्हें ‘बी’ श्रेणी और जिन बच्चों ने १८ साल की उम्र से पहले दोनों माता-पिता को खो दिया है, लेकिन रिश्तेदारों, खासकर पैतृक द्वारा पाला जा रहा है उन्हें ‘सी’ श्रेणी में रखा गया है।
इस साल इसे खत्म करने की नहीं थी जरुरत
शिक्षा कार्यकर्ता प्रशांत साठे ने कहा है कि जिन बच्चों ने कोविड के समय अपने माता-पिता में से किसी एक या दोनों को खो दिया है, उन्हें पिछले साल एक विशेष प्रावधान के रूप में प्रवेश प्रक्रिया में शामिल किया गया था। उन्होंने कहा कि राज्य शिक्षा विभाग को इस साल इस प्रावधान को खत्म करने की कोई जरूरत नहीं थी। पिछले साल, जिन बच्चों के माता-पिता की मृत्यु एक अप्रैल, २०२० और ३१ मार्च, २०२२ के बीच हुई थी, उन्हें आरटीई अधिनियम के तहत विशेष मामलों के रूप में प्रवेश के लिए मान्य किया गया था।
अगले तीन सालों तक आरटीई के तहत मिलना चाहिए दाखिला
एक अन्य शैक्षणिक कार्यकर्ता तुकाराम सराफ ने कहा कि कोविड से प्रभावित बच्चों को कम से कम अगले तीन वर्षों तक आरटीई अधिनियम के तहत प्रवेश मिलना चाहिए। उन्होंने कहा है कि बिना किसी परामर्श के संबंधित कोटा हटाना अधिकारियों की ओर से असंवेदनशीलता है। कोविड महामारी के दौरान बड़ी संख्या में बच्चे अनाथ हो गए हैं और उनकी मदद की जानी चाहिए। प्रवेश विंडो बंद होने से पहले सुधारात्मक उपायों पर जोर देते हुए शैक्षणिक कार्यकर्ता ने इस प्रक्रिया में अनाथ और एचआईवी पॉजिटिव बच्चों को भी शामिल करने की मांग की। बता दें कि आरटीई के तहत पंजीकरण की अंतिम तिथि ३१ मई है।

कोविड में ८०० बच्चों के सिर से उठ गया था माता-पिता का साया
सरकारी अनुमानों के अनुसार कोरोना महामारी में राज्य में लगभग ८०० बच्चों के सिर से उनके माता-पिता का साया उठ गया है। ऐसे में तत्कालीन मविआ सरकार ने ऐसे बच्चों के लिए विशेष कोटे का प्रस्ताव तैयार किया गया था, जिसे मंजूरी मिल गई थी। इसके तहत कोविड प्रभावित बच्चों को आयु, ट्यूशन और परीक्षा शुल्क में छूट दिए जाने का प्रावधान था। सूत्रों के मुताबिक, आरटीई के तहत शैक्षणिक वर्ष २०२४-२५ के लिए प्रवेश प्रक्रिया से कोविड प्रभावित छात्रों के लिए विशेष कोटा हटा दिया गया है। बताया गया है कि इस प्रवेश प्रक्रिया में अनाथ और एचआईवी पॉजिटिव छात्रों के लिए कोई आरक्षण नहीं है। ऐसे में इस पर फिर से विचार किए जाने की मांग हो रही है।

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