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यूएसएड का चौंकाने वाला खुलासा : देश की आधी जनता अब भी फूंक रही है चूल्हा! …केंद्र के १० करोड़ एलपीजी कनेक्शन का फूटा ढोल

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
केंद्र सरकार ने देश की महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर २०१६ में प्रधानमंत्री उज्जवला योजना (पीएमवाई) को शुरू किया था। इस योजना के अंतर्गत अब तक करीब १० एलपीजी सिलिंडर कनेक्शन देने का ढोल पीट रही है। हालांकि, केंद्र सरकार एक तरफ सिलिंडर देने का दावा तो कि लेकिन उसकी गलत नीतियों की वजह से सिलिंडर की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी की वजह से देश की जनता खरीदने में असमर्थ है। यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएड) समर्थित क्लीनर एयर एंड बेटर हेल्थ के अध्ययन से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। देश की आधी जनता अब भी चूल्हा फूंक रही है।
मिली जानकारी के अनुसार, तरल पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का सिलिंडर जैसे-जैसे महंगा हो रहा है, निम्न आय वर्ग के लोग इससे दूरी बनाने लगे हैं। यूएसएड समर्थित क्लीनर एयर एंड बेटर हेल्थ के अध्ययन में बताया गया है कि देश में निम्न आय वर्ग के ४१ फीसदी लोग अब भी खाना पकाने में कोयला व लकड़ी जैसे ज्यादा प्रदूषण करने वाले र्इंधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
महंगी कीमत असल मुद्दा
यह हालात तब हैं, जब प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत ९.५९ करोड़ एलपीजी कनेक्शन दिए गए हैं, लेकिन सिलिंडर को फिर से भरवाने की बढ़ती कीमत के चलते ज्यादातर घरों में ये सिलिंडर खाली पड़े हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस) के आंकड़ों के मुताबिक, निम्न आय वर्ग के लिए एलपीजी की कीमत बड़ा मुद्दा है। अध्ययन में सामने आया कि देश में सबसे ज्यादा झारखंड में ६७.८ फीसदी परिवार ठोस र्इंधन का प्रयोग कर रहे हैं, जबकि दिल्ली में सबसे कम ०.८ फीसदी लोग ही ठोस र्इंधन इस्तेमाल करते हैं।
५ किलो के सिलिंडरों की उपलब्धता बढ़े
सर्वे के मुताबिक, इस वर्ग के ज्यादातर लोग घरेलू प्रदूषण के बारे में भी नहीं जानते हैं। यदि जानते तो वे ठोस र्इंधन से बचने के लिए और ज्यादा प्रयास करते। कई लोग सिलिंडर की आसान उपलब्धता भी चाहते हैं। अध्ययन के मुताबिक, निम्न आय वर्ग के परिवारों में एलपीजी के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए स्थानीय आपूर्ति व शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत बनाने के साथ ही ५ किलो के सिलिंडर की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया जाना चाहिए।

१० समूह चर्चा और ९ साक्षात्कार हुए
मार्च २०२३ तक करीब ९.५९ करोड़ कनेक्शन जारी किए जा चुके हैं। अध्ययन से पता चला कि एलपीजी का कनेक्शन मिल जाना उसके निरंतर उपयोग की गारंटी नहीं है। इस अध्ययन के तहत चयनित क्षेत्रों में प्राथमिक र्इंधन का उपयोग करने वाली १८ वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं ने १० समूह चर्चाओं और नौ गहन साक्षात्कारों में भाग लिया। झारखंड जैसे राज्य में ६७.८ फीसदी घरों में ठोस र्इंधन का उपयोग किया जाता है और दिल्ली में ऐसे घर सिर्फ ०.८ फीसदी हैं।

अध्ययन का उद्देश्य
यह अध्ययन स्वच्छ वायु और बेहतर स्वास्थ्य (सीएबीएच) परियोजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य अशुद्ध जैव र्इंधन के उपयोग को छोड़ने में आने वाली अड़चनों की पहचान करना और लोगों के व्यवहार में बदलाव लाना है। अध्ययन में कई आयामों की जांच की गई, जिसमें जैव र्इंधन उपयोग के प्रति महिलाओं का नजरिया, एलपीजी का सतत उपयोग करने, घरेलू वायु प्रदूषण (एचएपी) की धारणाएं और इससे जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में जागरूक करना शामिल हैं। अध्ययन के मुख्य निष्कर्षों में से एक यह है कि कम आय वाले परिवार उस र्इंधन पर खाना बनाना पसंद करते हैं, जो आसानी से उनकी पहुंच में हैं। साथ ही एलपीजी की अधिक कीमत, सुरक्षा, स्वाद और स्वास्थ्य संबंधी धारणाओं के कारण लोग इसे आसानी से नहीं अपनाते हैं।

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