लघुकथा : इलेक्शन

आज शहर के रेड लाइट एरिया में उनका आना हुआ। दरवाजे पर खड़ी एक अधेड़ औरत को देख कुकरेजा जी हाथ जोड़ते हुए बोले- ‘बहन जी, इलेक्शन में खड़ा हूं। इस बार मुझे शहर की सेवा करने का अवसर दीजिएगा। समाज सेवा की बड़ी चाहत है, जो आपके आशीष के बगैर संभव नहीं है।’ स्वयं को समाजसेवी समझने वाले कुकरेजा जी के साथ उनके दो-चार सेवक भी थे।
कुकरेजा जी की बात सुन अधेड़ औरत जरा मुस्कुराई। फिर मन में बात चली- ‘न जाने कितनी बार पार्टी बदल चुका है। दलबदलू कहीं का। जो अपनी पार्टी का न हो सका वो समाज का क्या होगा?’ वह औरत चाहते हुए भी कुछ न बोली।
फिर कुकरेजा जी इधर-उधर ताकने लगे और जैसे ही उस अधेड़ औरत को नोट की एक गड्डी थमाने को हुए उस अधेड़ औरत ने कहा, ‘कुकरेजा जी, कांतिबाई हूं मैं, कांतिबाई…। मैं ईमान वाला जिस्म-ओ-जिगर रखती हूं। इसे आप ही रखें।’ शर्मिंदगी से भरे कुकरेजा जी के मुड़ते ही कांतिबाई ने धड़ाम से दरवाजा बंद कर लिया।
– टीकेश्वर सिन्हा ‘गब्दीवाला’, छत्तीसगढ़

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