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फटका को फ्री वे!… शांत हुए फटकामार तो शिथिल हुई सुरक्षा

जितेंद्र मल्लाह / मुंबई
रेलवे में मोबाइल स्नैचिंग आज सबसे बड़ी समस्या बन गई है। मोबाइल स्नैचरों के दुस्साहसी प्रयासों के कारण कई रेल यात्रियों को जान तक गंवानी पड़ी है। लेकिन रेलवे पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल मोबाइल स्नैचरों पर पूरी तरह से नकेल कसने में नाकाम सिद्ध हुआ है। रेलवे में मोबाइल चोरी का सबसे खतरनाक तरीका होता है ‘फटका’! जिसमें रेल पटरियों के बीच स्थित सिग्नल पर खड़ा फटकामार डंडे या हाथ से ट्रेन में गेट के पास खड़े यात्रियों के हाथ से मोबाइल पर वार करता है और यात्री के हाथ से मोबाइल फोन गिराने की कोशिश करता है। हालांकि मुंबई की उपनगरीय ट्रेनों में फटका की घटनाएं पिछले कुछ महीनों में कम हो गई हैं। इससे फटकामारों के प्रति रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था भी शिथिल नजर आने लगी है। इसकी झलक फटकामारों के लिए बेहद संवेदनशील माने जानेवाले बांद्रा खाड़ी पुल पर देखने को मिलती है। यहां रेलवे पुलिस और पत्रकारों के महीनों के प्रयासों के बाद जो लोहे की ग्रिल लगाई गई थी, उसे अब गर्दुल्ले धीरे-धीरे उखाड़कर ले जा रहे हैं। इससे गर्दुल्लों को एक बार फिर फ्री वे मिलने की आशंका जताई जाने लगी है।

बता दें कि कोरोना काल से पहले मुंबई में फटका मार कर मोबाइल गिराए जाने की घटनाएं काफी बढ़ गई थीं। मुंबई उपनगरीय रेल खंड के किसी न किसी हिस्से में फटका की खबर सुनने को मिल ही जाती थी। जिसके बाद रेलवे पुलिस ने मुंबई उपनगरीय रेल खंड में ९३ संवेदनशील स्पॉट चिन्हित किए थे। उनमें से बांद्रा रेलवे पुलिस की हद में मौजूद मिलन सबवे, गेईटी फाटक, बांद्रा खाड़ी ब्रिज एवं रहेजा ब्रिज ऐसे चार स्पॉट सर्वाधिक संवेदनशील स्पॉटों में शामिल थे। मिलन सबवे पर नियंति मिर्जनकर के साथ हुई घटना के बाद उसके सहकर्मी की रेल हादसे में मौत हो गई थी, तो वहीं बांद्रा खाड़ी पुल पर कई बार संदिग्ध फटकामारों के हादसे का शिकार होने की खबरें सामने आई थीं। बांद्रा खाड़ी पुल खासकर प्लेटफॉर्म नंबर सात से छूटनेवाली हार्बर लाइन की ट्रेनें और एक से बांद्रा आनेवाली ट्रेनों के यात्री फटकामारों का विशेष टारगेट बनते थे। इन इलाकों में फटकामार यात्रियों का मोबाइल गिराने के बाद दलदल वाले मैंग्रोव्ज में घुसकर भाग जाते थे। बांद्रा रेलवे पुलिस के तत्कालीन अधिकारियों के प्रयासों एवं ‘दोपहर का सामना’ सहित कुछ अन्य अखबारों द्वारा इस समस्या को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद बांद्रा-माहिम के बीच खाड़ी से रहेजा पुल तक लोहे की ग्रिल रेलवे ने लगवाई। इसके साथ-साथ रोशनी के लिए बिजली के खंभे भी लगवाए गए। लेकिन अब ग्रिल में लगी लोहे की पट्टियां एक-एक करके गर्दुल्ले उखाड़ कर ले जा रहे हैं। ग्रिल में से पट्टियों के गुल होने से फटकामारों के भागने का रास्ता लगातार चौड़ा होता जा रहा है।
रेलवे पुलिस का ये कहना है
फटकामारों के संदर्भ में बांद्रा रेलवे पुलिस के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक हमराज कुंभार कहते हैं कि हम इस बारे में रेलवे सुरक्षा बल और स्टेशन प्रबंधक से लगातार पत्र व्यवहार कर रहे हैं। फटकामारों के संबंध में कुंभार का कहना है कि बांद्रा रेलवे पुलिस की हद में मोबाइल स्नैिंचग की औसतन ६० घटनाएं हर महीने दर्ज होती हैं। वर्ष २०१८ में १६, २०१९ में २६, २०२० में ३ और २०२१ में पांच फटकामारों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। बांद्रा रेलवे पुलिस द्वारा गिरफ्तार २० आरोपी फिलहाल जेल में, १० लोगों के खिलाफ रेलवे पुलिस द्वारा प्रतिबंधक कार्रवाई की गई है जबकि २ लोगों को तड़ीपार किया जा चुका है। इन सभी के स्टेटस की रेलवे पुलिस लगातार जांच करती रहती है। इसके अलावा बांद्रा रेल पुलिस की हद में फटका के चार संवेदनशील पॉइंटों पर रेलवे पुलिस के ८ लोग तैनात किए जाते हैं। बांद्रा से सांताक्रुज के बीच लोकल ट्रेनों एवं प्लेटफॉर्म पर मोबाइल स्नैचिंग रोकने के लिए सुबह ९ बजे से रात ९ बजे के बीच ३ टीमें लगातार गश्त करती हैं। इन टीमों को एक स्टेशन पर दो घंटे गश्त करने के बाद अगले स्टेशन पर जाने का निर्देश दिया गया है। इसी तरह सबसे संवेदनशील माने जानेवाले बांद्रा के सात नंबर प्लेटफॉर्म से माहिम के बीच दोपहर ४ से रात दस बजे दो टीमें गश्त करती हैं। खाड़ी ब्रिज से ट्रेन के गुजरने के दौरान ये टीम और नीचे फटका पॉइंट पर खड़े जवान सीटी बजाकर कर एक-दूसरे को सब ठीक होने का संकेत देते हैं।
आरपीएफ का है ये कहना
खाड़ी पुल से गायब होती ग्रिल की पट्टियों के बारे में बांद्रा आरपीएफ के संदीप सिंह का कहना है कि कुल २१६ पट्टियों की चोरी हुई। २६ जुलाई को तीन चोरों को आरपीएफ ने गिरफ्तार किया था। फिलहाल चोरी बंद है।

इस वजह से भी कम हुए फटका के केस
कोरोना काल में लोकल ट्रेनों में आम यात्रियों की प्रवेश बंदी होने से मोबाइल स्नैचरों-फटकामारों का धंधा मंदा पड़ गया। इससे कुछ लोग महामारी का तो कुछ भुखमरी का शिकार हो गए। बचे खुचे लोगों ने या तो ‘धंधा’ बदल लिया या ठिकाना। बरसात भी एक वजह बताई जाती है। करंट लगने के डर से फटकामार सिग्नल एवं बिजली के खंभों से दूर रहते हैं। फटके में मोबाइल टूटने का जोखिम ज्यादा होने के कारण भी फटकामार कम हो गए हैं। लेकिन पुलिस की सख्ती कम हुई तो नए फटकामार पनप सकते हैं।

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