मुख्यपृष्ठधर्म विशेषश्रीराम ने ब्रह्मास्त्र से किया था दशानन को विदीर्ण

श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र से किया था दशानन को विदीर्ण

स्रुनीता मिश्रा

विजयादशमी या दशहरा अर्थात आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के समय ‘विजयकाल’ रहता है। यह सभी कार्यों को सिद्ध करता है। आश्विन शुक्ल दशमी पूर्वविद्धा निषिद्ध, परविद्धा शुद्ध और श्रवण नक्षत्रयुक्त सूर्योदयव्यापिनी सर्वश्रेष्ठ होती है। अपराह्न काल, श्रवण नक्षत्र तथा दशमी का प्रारंभ विजय यात्रा का मुहूर्त माना गया है। दुर्गा विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजय प्रयाग, शमी पूजन तथा नवरात्रि पारण इस पर्व के महान कर्म हैं। इस दिन संध्या के समय नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। क्षत्रिय / राजपूत इस दिन प्रात: स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर संकल्प मंत्र लेते हैं। इसके पश्चात देवताओं, गुरुजन, अस्त्र-शस्त्र, अश्व आदि के यथाविधि पूजन की परंपरा है।
राम-रावण युद्ध
श्रीराम और रावण का युद्ध उनके ही समान था, उसकी कहीं भी दूसरी कोई उपमा नहीं थी। रावण वानरों पर प्रहार करता था और हनुमान आदि वानर रावण को चोट पहुंचाते थे। जैसे मेघ पानी बरसाता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथ जी ने रावण के ऊपर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा आरंभ कर दी। उन्होंने रावण के रथ, ध्वज, अश्व, सारथी, धनुष, बाहु और मस्तक काट डाले। काटे हुए मस्तकों के स्थान पर दूसरे नए मस्तक उत्पन्न हो जाते थे। यह देखकर श्रीरामचंद्रजी ने ब्रह्मास्त्र के द्वारा रावण का वक्ष स्थल विदीर्ण करके उसे रणभूमि में गिरा दिया। उस समय (मरने से बचे हुए सब) राक्षसों के साथ रावण की अनाथा स्त्रियां विलाप करने लगीं, तब श्रीरामचंद्र जी की आज्ञा से विभीषण ने उन सबको सांत्वना दे, रावण के शव का दाह-संस्कार किया। ब्रह्मा जी तथा स्वर्गवासी महाराज दशरथ ने आकर स्तुति करते हुए कहा- ‘श्रीराम! तुम राक्षसों का संहार करने वाले साक्षात श्रीविष्णु हो।’ फिर श्रीराम के अनुरोध से इंद्र ने अमृत बरसाकर मरे हुए वानरों को जीवित कर दिया। समस्त देवता युद्ध देखकर, श्रीरामचंद्र जी के द्वारा पूजित हो, स्वर्गलोक में चले गए। श्रीरामचन्द्र जी ने लंका का राज्य विभीषण को दे दिया और वानरों का विशेष सम्मान किया, तब से पूरे संसार में दशहरे का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है।

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