मुख्यपृष्ठस्तंभश्री-वास्तव उ-वाच : सर्पदंश का तोड़ कृत्रिम एंटीबॉडी

श्री-वास्तव उ-वाच : सर्पदंश का तोड़ कृत्रिम एंटीबॉडी

अमिताभ श्रीवास्तव

सर्पदंश का उपचार तो है मगर जहरीले सांप के काटने की वजह से आज भी सैकड़ों लोगों को जान गंवानी पड़ती है। लेकिन, अब जल्द इस समस्या से निजात मिल सकती है। वैज्ञानिकों ने कृत्रिम ह्यूमन एंटीबॉडी तैयार की है, जो कोबरा, किंग कोबरा व करैत जैसे अत्यधिक विषैले सर्पों के दंश को भी निष्क्रिय करेगी। शोधकर्ताओं ने दावा किया कि एंटीबॉडी का असर पारंपरिक एंटीवेनम (जहर का असर खत्म करनेवाला पदार्थ) की तुलना में लगभग १५ गुना अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं का यह निष्कर्ष साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित हुआ है। जिस तरह से एचआइवी व कोविड-१९ की एंटीबॉडी विकसित की गई थी, उसी तरह इस नए एंटीबॉडी को विकसित किया गया है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आइआइएससी), बेंगलुरु से पीएचडी कर रही सेनजी लक्ष्मी ने कहा कि यह पहली बार है कि सर्पदंश के उपचार के लिए एंडीबॉडी विकसित करने की यह रणनीति अपनाई गई। शोध दल में शामिल अमेरिका के स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने कहा कि यह अध्ययन यूनिवर्सल एंटीबॉडी सोल्यूशन की ओर एक कदम है, जो विभिन्न तरह के सर्पों के विष से हमारी सुरक्षा कर सकता है। सर्पदंश से सबसे अधिक प्रभावित होने वालों में हिन्दुस्थान और उप सहारा अफ्रीका के इलाके शामिल हैं।
पत्नी देगी भरण पोषण!
अब तक तलाक मामले में पति को पत्नी के भरण पोषण के लिए बाध्य होना पड़ता था मगर एक ऐसा फैसला आया, जिसमें पत्नी को पति के लिए भरण पोषण देना होगा। मामला मध्य प्रदेश के उज्जैन का है। यहां फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए पत्नी को भरण-पोषण के लिए हर माह ५ हजार रुपए अदा करने के निर्देश दिए। साथ ही कोर्ट व्यय की राशि भी चुकानी होगी। आमतौर पर भरण पोषण के मामले में पति को पत्नी को राशि अदा करनी पड़ती है, लेकिन संभवत: यह पहली बार है कि पति को हर महीने ५ हजार रुपए अदा करने का फैसला हुआ है। उज्जैन में रहनेवाले अमन (२३) का है। उन्होंने पत्नी के खिलाफ प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए फैमिली कोर्ट की शरण ली थी। वर्ष २०२० में अमन की पहचान एक युवती से हुई। प्रेम होने पर दोनों ने साल २०२१ में आर्य समाज मंदिर में शादी की और इंदौर में किराए पर मकान लेकर रहने लगे। अमन का आरोप है कि पत्नी और उसके परिवार के लोग उसे प्रताड़ित करते थे। परेशान होकर वह शादी के करीब दो महीने बाद ही पत्नी को छोड़कर माता-पिता के पास चला गया। इस बीच पत्नी ने उसकी गुमशुदगी थाने में दर्ज करा दी। अमन पत्नी के साथ रहना नहीं चाहता था। इस बीच पत्नी ने उस पर घरेलू हिंसा का केस दर्ज करा दिया। अमन ने कोर्ट में बताया कि वह १२वीं पास है और पत्नी के कारण आगे पढ़ नहीं पाया, उसकी पत्नी ग्रेजुएट है और ब्यूटी पार्लर चलाती है। गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने के दौरान पत्नी ने पुलिस को इसकी जानकारी भी दी थी। सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पत्नी को भरण-पोषण की राशि अदा करने के निर्देश जारी कर दिए।
कूड़ापति है करोड़पति
कूड़ा बीनने वालों को पहली नजर में आप एक गरीब, मजबूर आदमी मानेंगे मगर यदि हम बताएं कि ये एक ऐसे कूड़ापति की कहानी है, जो करोड़पति है तो? आपके कान खड़े हो जाएंगे। है न? दरअसल, यह कूड़ापति अपने खाने के आइटमों का इंतजाम कूड़े से बीन करके कर लेता है तो खाने का खर्च बच जाता है। अजीब कहानी है इसकी, सुनिए। जर्मनी के रहनेवाले इस करोड़पति का नाम हेंज बी है और उसे देखकर आप अंदाजा नहीं लगा सकते हैं कि वो कितनी संपत्ति का मालिक हैं। ये करोड़पति जिस तरह की जिंदगी जी रहा है, वो आमतौर पर किसी बेघर आदमी की होती है। हालांकि, इस शख्स के १०-१० घर हैं, फिर भी वो कूड़ा बीनकर अपने लिए खाना जुटाता है। आमतौर पर लोगों के खाने का अच्छा-खासा खर्च होता है, लेकिन हेंज बी के लिए महीने में सिर्फ ४५० रुपए का खर्चा होता है। वो भी तब, जब उन्हें कोई चीज फ्राई करने के लिए तेल चाहिए होता है। बाकी वक्त में वो कूड़ा-कचरे में फेंके गए खाने में से ही अपने खाने का इंतजाम कर लेते हैं। वे १० घरों के मालिक हैं। करीब ९० लाख रुपए उनके फिक्स डिपॉजिट में हैं। उन्हें हर महीने ३ लाख २३ हजार रुपए की पेंशन मिलती है, एक और पेंशन से भी उन्हें १४ हजार रुपए मिलते हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी हेंज अपनी जिंदगी किसी भिखारी की तरह जीते हैं और टूटी साइकिल से चलते हैं।
लाल नहीं काल स्याही
अब लाल स्याही तो स्याही है, उससे लिखें या न लिखें मगर यहां लाल स्याही काल है। ऐसी काल कि लोग इससे घबराते हैं। इसे अशुभ मानते हैं। है अंधविश्वास, मगर इतनी जड़ें जमाए हुए हैं कि कोई कुछ सुनने,समझने के लिए तैयार नहीं होता। जी हां, क्या आप जानते हैं, दक्षिण कोरिया में लाल स्याही से लिखना अशुभ माना जाता है। यहां सामाज‍िक तौर पर इसे बुराई मानते हैं। यही वजह है कि लाल रंग की कलम को बच्चों से भी बचा कर रखा जाता है। मान्‍यता है कि अगर किसी ने लाल पेन से किसी का नाम लिख दिया तो उसकी मौत हो जाती है। इसी वजह से लोग लाल पेन का प्रयोग नहीं करते। उसे घर में नहीं लाते। दरअसल, लाल पेन से लिखने से किसी की मौत नहीं होती, बल्कि पारंपरिक कोर‍ियाई संस्‍कृति में मृतकों का नाम लाल रंग के पेन से लिखने की परंपरा रही है। इसी वजह से लोग इस पेन का इस्‍तेमाल जीवित लोगों का नाम लिखने में नहीं करते। यहां तक कि स्कलों में भी बच्‍चों को मना किया जाता है। यहां अगर कोई गलती से भी किसी का नाम लाल रंग के पेन से लिख दे तो माना जाता है कि वह उसे मरवाना चाहता है। पुर्तगाल और जापान में भी लाल रंग को मृत्यु का सूचक माना जाता है। अंधविश्वास है मगर बहुत गहरा पैठा हुआ है। इसलिए इसे लाल नहीं काल स्याही कहते हैं।

(लेखक ३ दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं व सम सामयिक विषयों के टिप्पणीकर्ता हैं। धारावाहिक तथा डॉक्यूमेंट्री लेखन के साथ इनकी तमाम ऑडियो बुक्स भी रिलीज हो चुकी हैं।)

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