मुख्यपृष्ठस्तंभश्री-वास्तव उ-वाच : भूतों का मेला

श्री-वास्तव उ-वाच : भूतों का मेला

अमिताभ श्रीवास्तव

अब तक आम इंसानों के द्वारा लगाए गए मेलों के बारे में तो बहुत सुना था मगर भूतों के मेला के बारे में सुनना अजीब लगेगा। जी हां, यूं तो ये अंधविश्वास है मगर जब लोगों की आस्था इससे जुड़ जाती हो या विश्वास बढ़ जाता हो तो क्या किया जा सकता है? ज्ञान पैâलाने की कोशिशें तो बहुत हुई इस भारतवर्ष में मगर श्रद्धा और आस्था के नाम पर सब गड़बड़ हो गर्इं। अब जो हो गया है यह उसी का नजारा है। हमारे देश में एक जगह ऐसी है, जहां हर साल भूतों का मेला लगता है। मान्यता है कि यहां लोगों पर चढ़े भूत उतर जाते हैं वो ठीक होकर घर लौट जाते हैं। उत्तरप्रदेश के बरही गांव का है यह मेला। कहा जाता है मेले में लोगों के अंदर भूत-प्रेत बात करते हैं। बरही गांव में बेचू वीर बाबा के दरबार में यह मेला लगता है। भूत-प्रेत बाधाओं से परेशान लोग यहां जमा होते हैं। किसीको नाचते हुए यहां देख सकते हैं तो कोई गा रहा होता है तो कोई सिर पटक रहा होता है तो कोई जमीन पर लोट लगाते हुए दिखता है। कुल-मिलाकर बरही गांव इस मेले के नाम पर बहुत प्रसिद्ध हो गया है।
इंजन चालू रखना वरना…
यहां कार के इंजन को चालू रखना वरना कार चलेगी ही नहीं। ऐसा नहीं है कि कार का इंजन खराब है या कार ही पुरानी हो गई है बल्कि ये तो यहां रहनेवाले सभी लोगों के लिए आवश्यक है। अब आप सोचिए कि इस शहर में हर जगह कारें हमेशा चालू रहती हैं। चाहे चल रही हो या खड़ी हो। पार्क की जानेवाली कारों का इंजन भूल से भी बंद कर दिया तो फिर अगली आनेवाली गर्मियों में ही शुरू होगा। जी हां, हम बात कर रहे हैं दुनिया के सबसे ठंडे शहर की। ये है रुस का याकुत्स्क शहर। इस शहर में ठंड के दौरान तापमान -६२ के भी नीचे चला जाता है। हालत ऐसी हो जाती है कि सुबह से रात तक लोग सिर्फ कपड़ों के तह के अंदर ही घुसे रहते हैं। अगर यहां ठंड में लोगों को घर से बाहर जाने को कह दिया जाए तो इससे अच्छा उन्हें मौत आना लगता है। ठंड का ऐसा प्रकोप इस शहर पर पड़ता है कि यहां रातभर कार इंजिन को लोग ऑन रखते हैं। अगर ये ऑफ हो गया तो अगली गर्मियों में ही कार चल पाएगी। इतनी ठंड में सरवाइव करना काफी मुश्किल हो जाता है। जैसे यहां रोजमर्रा की चीजें भी मुश्किल से की जाती हैं। यहां कपड़े धोकर जैसे ही सूखने को डालो, ये जम जाते हैं। इस शहर में फ्रिज की जरुरत किसी को नहीं पड़ती। जिस भी चीज को जमाना होता है, उसे खिड़की से बाहर टांग दिया जाता है। वो अपने आप जम जाता है।
ये डेलीकेट डंपिंग क्या है?
इसे समझ लेना चाहिए क्योंकि बड़े काम की चीज है। इससे लड़ाई झगड़े से बच जाते हैं और अपने रिश्ते को भी आसानी से तोड़ लिया जाता है। आजकल डेलीकेट डंपिंग का नाम बहुत चर्चा में आने लगा है। ये जो बॉयफ्रेंड, गर्लफ्रेंड का ट्रेंड चल पड़ा है, लिव इन रिलेशनशिप है, जिसमें आए दिन लड़ना-झगड़ना भी होता है, एकदूसरे से दूर होना चाहते हैं मगर नहीं हो पाते, कोई न कोई ऐसा कारण फंस जाता है, जिसकी वजह से रिश्ता ढोना भी पड़ता है और झगड़े टंटे अलग से होते रहते हैं तो डेलीकेट डंपिंग बड़े काम की चीज है। क्या होता है ये? डंपिंग का मतलब है किसी चीज को खत्म करना या ब्रेकअप लेना। आमतौर पर डंप करते हैं। मगर डेलीकेट ऐसी विधा है या कह लें कंडीशन है जिसमें बिना किसी लड़ाई-झगड़े के रिश्ते को खत्म कर लिया जाता है। इसमें एकदूसरे को यह भी पता चल जाता है कि अब रिश्ते में किसी को रूचि नहीं रह गर्इं है। यानि रिश्ते में एफर्ट डालना बंद कर दिया जाता है और अपनेआप रिश्ता टूट जाता है। इसमें दूरी बना ली जाती है। इसमें कोई स्पष्टीकरण नहीं देना पड़ता। सामने वाला समझ लेता है कि रिश्ते में रूचि नहीं है तो स्वतः ही दूरियां बन जाती हैं। इसे कहते हैं डेलीकेट डंपिंग।
चलें क्या बेवकूफ?
अब शीर्षक पढ़कर लगेगा ये क्या उवाच में लिखा जा रहा है? पर हैरान मत हो। दरअसल, यह एक ऐसी जगह के बारे में हैं, जहां बेवकूफ शब्द न केवल फेमस है बल्कि कई सारी खाने-पीने की दुकानें, होटल इसी नाम से हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि बेवकूफ यहां सबसे बड़ा ब्रॉन्ड है। तो चलें का बेवकूफ? जी हां, झारखंड राज्य के गिरिडीह जिले में है यह जगह जहां आपको बेवकूफ नाम के कई होटल मिल जाएंगे। आप चाहें तो बेवकूफ नंबर १ में जाइए, चाहें तो महा बेवकूफ में जाइए,यहां श्री बेवकूफ भी मौजूद है तो न्यू बेवकूफ भी आपको मिलेगा। जहां जाएं जा सकते हैं, मगर एक बात सभी होटलों में मायने रखती है कि खाना स्वादिष्ट मिलता है। लोगों की पसंद को यहां महत्वपूर्ण माना जाता है। दरअसल, आज से कोई पचास साल पहले बीरबल प्रसाद नामक व्यक्ति ने अपने होटल का नाम बेवकूफ होटल रखा था। यह इतना फेमस हो गया कि अब हर कोई अपनी दुकान या होटल का नाम बेवकूफ रखने लगा है। है न दिलचस्प बात। तो कब जा रहे हैं आप बेवकूफ में?

अन्य समाचार