मुख्यपृष्ठस्तंभसियासतनामा : नैतिकता और राजनीति

सियासतनामा : नैतिकता और राजनीति

सैयद सलमान मुंबई

उम्मीद के मुताबिक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण बिल को अपनी मंजूरी दे दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्रेय लेने की होड़ में सबसे आगे हैं। इस कानून को बनाने में विपक्ष से सहयोग की मांग करनेवाले प्रधानमंत्री अब विपक्ष पर तंज कस रहे हैं कि उन्होंने मजबूरी में समर्थन दिया। वह इन तंजिया अल्फाज को मध्य प्रदेश की चुनावी सभा में बोल रहे हैं। जाहिर है इस कानून का सहारा लेकर वह मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों और आगामी लोकसभा की चुनावी वैतरणी पार करना चाहते हैं। कानून बन गया है, कब लागू होगा कहना मुश्किल है। एमपी में अब तक जारी की गई भाजपा प्रत्याशियों की ३९-३९ की दो सूची में मात्र ६ और ४ महिलाओं को ही टिकट दिया गया है। होना तो २६ को चाहिए था। भले ही आरक्षण लागू न हुआ हो, नैतिक बढ़त लेनी होती तो एमपी के विधानसभा चुनाव में ३३ फीसद महिलाओं को उतारा जा सकता था। लेकिन महिला हितैषी होने का दावा करनेवाली भाजपा की कथनी और करनी का फर्क साफ दिख रहा है। नैतिकता मुखौटा है, राजनीति असल चेहरा है।
वसुंधरा पर असमंजस
राजस्थान में होनेवाले आगामी चुनाव को लेकर गहमागहमी तेज हो गई है। सबसे ज्यादा चर्चा में अशोक गहलोत, वसुंधरा राजे सिंधिया और सचिन पायलट हैं। पायलट समर्थकों का गाहे-बगाहे यह बयान आता रहा है कि वसुंधरा के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को लेकर गहलोत ने अगर सख्ती दिखाई होती तो कांग्रेस को चुनाव जीतने के लिए कम मेहनत करनी पड़ती। दरअसल, गहलोत और वसुंधरा दोनों को पायलट लपेटते रहे हैं। फिलहाल हाईकमान की पहल पर गहलोत-पायलट में युद्ध विराम की स्थिति है। लेकिन वसुंधरा भाजपा में किनारे लगा दी गई हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी की सभा में वह मंच पर तो थीं, लेकिन उन्हें बोलने नहीं दिया गया। हालांकि, भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जानता है कि राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा की जड़ें गहरी हैं, इसलिए उन्हें नजरअंदाज कर सत्ता हासिल करना आसान नहीं होगा। शायद यही वजह है कि अमित शाह ने पहल करते हुए नई रणनीति के तहत बनाए गए प्लान में वसुंधरा को आगे लाने का संकेत दिया है। वसुंधरा बिना नैया पार होती शायद न दिख रही हो।
प्रयोग असफल न हो जाए
भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव से पहले होने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गए हैं। हिमाचल और कर्नाटक में सरकार गंवाकर उसे झटका मिला है। इसलिए इन तीनों राज्यों के चुनाव को वह एसिड टेस्ट मानकर चल रही है। बहुत कुछ इन तीन राज्यों के फैसले से तय हो जाएगा। इसी कड़ी में विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा ने एमपी में अब तक अपने सात सांसदों को चुनावी समर में उतार दिया है, जिनमें से तीन तो केंद्रीय मंत्री ही हैं। छत्तीसगढ़ में ऐसे ही संकेत दिए गए हैं। राजस्थान में भी ऐसा ही किया जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए। मजे की बात, हर जगह चुनावी चेहरा नरेंद्र मोदी को ही बनाया जा रहा है। यह इंडिया गठबंधन का दबाव है या हताशा कि विधानसभा चुनाव को भी लोकसभा की तर्ज पर लड़ा जा रहा है। सांसदों को विधानसभा चुनाव में उतारकर भाजपा विपक्ष पर दबाव बनाना चाहती है। लेकिन कहीं यह दांव उल्टा न पड़ जाए, जैसा कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में हुआ था, जहां सांसदों-मंत्रियों को उतारने के बावजूद असफलता ही हाथ लगी थी।
व्यवस्था का अहंकार?
अमेठी इस बार सोनिया, प्रियंका, राहुल ही नहीं बल्कि वरुण गांधी को लेकर भी चर्चा में हैं। दरअसल, स्थानीय संजय गांधी अस्पताल में इलाज के दौरान एक महिला की मौत का मुद्दा काफी गरमा गया था। आनन-फानन में संजय गांधी अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर दिया गया। अस्पताल बंद होने से संजय गांधी अस्पताल के ४५० कर्मचारी और उनके परिवार सहित प्रदेश के सैकड़ों मरीज प्रभावित होंगे। ये आरोप लगने लगे कि इसके पीछे स्थानीय सांसद और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का हाथ है। अस्पताल संजय गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट चलाता है, जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। अस्पताल बंद होने पर भाजपा सांसद वरुण गांधी भी भड़क गए हैं। उन्होंने इसे ‘व्यवस्था का अहंकार’ बताकर अपनी सरकार को घेरा है। कांग्रेस, सपा, भाकपा (माले) सहित कई विपक्षी दल सरकार के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। स्मृति उलटे कांग्रेस को कोस रही हैं। इस मामले में वरुण के शामिल होने से भाजपा के लिए शर्मनाक स्थिति पैदा हो गई है।
(लेखक देश के प्रमुख प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं।)

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