" /> सोलहवें दिन का चांद!

सोलहवें दिन का चांद!

सोलहवें दिन का ये चांद
मेरी खिड़की में से झांकता है!
और ले आता है अपने साथ
हवा के मध्यम झोंकों को
ताकि ये मेरे चेहरे पर आई हुई
मेरी सुनहरी लटों को हटा सके!
और कभी जब मैं नींद में होती हूं
तब ये गुस्सा हो जाता है और
बादलों को बुला कर हल्की सी
फुहार से मुझे जगाने की कोशिश करता है
ये इतना बेताब रहता है मुझे छूने को
कि अगर इसकी बाहें होती तो शायद
पूरी रात मेरा हाथ इसके हाथ में ही होता
इतनी अठखेलियों के बाद हम पूरी रात
झरनों, पहाड़ों,नदी, जंगलों, फूलों
और घास की बहुत सारी बातें करते
रात के कतरा-कतरा पिघलने तक
हम दोनों एक-दूसरे के साथ रहते
क्योंकि हम दोनों महीने भर का
इंतजार करते हैं इक पूरी रात
इक दूसरे के साथ बिताने के लिए
क्योंकि मुझे सोलहवें दिन का चांद पसंद है
और चांद को मैं…
-नेहा सोनी, दतिया (मध्य प्रदेश)