मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनासियासतनामा : राष्ट्रीय विकल्प पर प्रहार

सियासतनामा : राष्ट्रीय विकल्प पर प्रहार

सैयद सलमान। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद पार्टी में उठा-पटक और मंथन का दौर जारी है। हार की नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा देने की सोनिया गांधी की पेशकश ठुकराई जा चुकी है। अगस्त में संभावित आंतरिक चुनाव तक वे पद पर बनी रहेंगी। लेकिन हार की जिम्मेदारी किसी की तो बनती है। असंतुष्टों को भी पता है बिना गांधी परिवार के कांग्रेस का क्या अस्तित्व रह जाएगा। इसलिए बीच का मार्ग निकालने के लिए किसी को तो जाना होगा। पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल को उनके पद से हटाने पर सहमति बन सकती है। उसके बाद उत्तर भारत की राजनीति को समझने वाले और हिंदी को बेहतर जाननेवाले किसी नेता को यह पद दिया जा सकता है। एक तरफ साम-दाम-दंड-भेद के माध्यम से भाजपा का कांग्रेसमुक्त अभियान चल ही रहा है, दूसरी तरफ असंतुष्टों का दबाव भी बना हुआ है। लगभग चौदह दशक पुरानी कांग्रेस का खत्म होना राष्ट्रीय विकल्प के खात्मे का संकेत होगा। ऐसी स्थिति में केंद्र और निरंकुश हो सकता है। कांग्रेस को इस समस्या से कोई और नहीं बल्कि खुद कांग्रेस ही बचा सकती है।
योगी बनाम कफील
२०१७ में गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से ६३ बच्चों की मौत हुई थी। उस मामले में डॉ. कफील खान भी गिरफ्तार हुए थे। उनका लंबा समय जेल में बीता। वे गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में अपनी बहाली की लड़ाई लड़ रहे हैं। वही कफील खान अब समाजवादी पार्टी से विधान परिषद का चुनाव लड़ने जा रहे हैं। यह एक तरह से चौंकानेवाली खबर है कि आखिर अखिलेश ने कफील को ही क्यों उम्मीदवार बनाया? कफील खान के अलावा बहुतेरे मुस्लिम लीडर हैं, जिन्हें अखिलेश चुनाव लड़ा सकते थे। दरअसल, विधान परिषद में कफील को भेजकर अखिलेश योगी को चिढ़ाना और मुस्लिम मतदाताओं को खुश करना चाहते हैं। आखिर कफील परेशान तो योगी के कारण ही हुए हैं। कफील खान भाजपा और योगी के खिलाफ जमकर अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। अगर ऐसे में वह जीत जाते हैं तो योगी विरोधी एक चर्चित लेकिन शिक्षित मुस्लिम चेहरा बैठे-बिठाए अखिलेश को मिल जाएगा। आजम खान के बाद उत्तर प्रदेश में सपा को एक ऐसे चेहरे की शिद्दत से जरूरत भी है।
नीतीश की लाचारी
नीतीश कुमार कभी सुशासन बाबू के नाम से मशहूर थे और साझा विपक्ष के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी का विकल्प बनने की चाहत रखते थे। लेकिन उन्होंने हथियार डालकर आखिर भाजपा के साथ ही सरकार बनाने के मार्ग को चुनकर अपनी भद्द पिटवा ली। अब जब भी मौका आता है, भाजपा उनको दबा ले जाती है और वे उफ तक नहीं कर पाते हैं। अभी पिछले दिनों नीतीश बिहार विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा से सदन में ही भिड़ गए थे। यह बात भाजपा को रास नहीं आई। मामला सिन्हा के चुनाव क्षेत्र से जुड़े एक थानेदार और डीएसपी के तबादले का था, जिसे सिन्हा ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। नीतीश इसके लिए तैयार नहीं थे। लेकिन जब भाजपा का दबाव तंत्र अपने काम पर लगा तो नीतीश की बोलती बंद हो गई। आखिर विवाद के दो दिनों के भीतर उन्होंने होली के दिन सरकारी कार्यालय में अवकाश के बावजूद तबादले की अधिसूचना जारी करवा दी। कुर्सी बचाने के लिए नीतीश की इस लाचारी पर उनके प्रशंसक निराश हैं लेकिन भाजपा का ‘जोश हाई’ है।
परीक्षा से क्यों परहेज?
हिजाब मुद्दे को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट के पैâसले का विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा। इस पैâसले के खिलाफ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में जाने का एलान किया है। इससे पहले कई छात्राओं की तरफ से इस केस को लेकर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हो चुकी हैं। लेकिन मुस्लिम समाज का युवा वर्ग सुप्रीम कोर्ट के पैâसले का इंतजार किए बिना, न जाने क्यों अधिक उग्र रूप लेकर सामने आ रहा है। हिजाब के खिलाफ आए पैâसले के बाद कर्नाटक स्थित उप्पिनंगडी में २३१ मुस्लिम छात्रों का शासकीय पीयू कॉलेज की परीक्षा में बैठने से इनकार करना अब नए विवाद को जन्म दे रहा है। हालांकि, कई स्थानीय मुस्लिम नेताओं ने छात्रों को समझाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन वे परीक्षा में शामिल हुए बगैर ही लौट गए। अगर मामला कोर्ट में है और न्याय की उम्मीद है तो इस जिद का क्या अर्थ है कि बिना हिजाब परीक्षा नहीं देंगे? अशिक्षा को लेकर बदनाम मुस्लिम समाज की नई पीढ़ी को गंभीरता से सोचना होगा कि आखिर परीक्षा से परहेज करने से नुकसान किसका होगा?

(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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