मुख्यपृष्ठस्तंभसियासतनामा: गुजरात बनाम दिल्ली मॉडल

सियासतनामा: गुजरात बनाम दिल्ली मॉडल

सैयद सलमान। भाजपा के प्रचार अभियान में ‘गुजरात मॉडल’ का सबसे ज्यादा प्रयोग होता है। भाजपा हर हाल में इस कीमती हथियार को थामे रखती है। भाजपा की अपनी डिक्शनरी में गुजरात मॉडल का अर्थ है, रोजगार, कम महंगाई-ज्यादा कमाई, अर्थव्यवस्था का विकास, शिक्षा, सुरक्षा और बेहतरीन जीवन। लेकिन भाजपा विरोधी इसे छलावा बताते हैं। उनकी नजर में धार्मिक विद्वेष, दंगा-फसाद, भ्रष्टाचार, फिजा में पैâली नफरत ही असल गुजरात मॉडल है। लेकिन पंजाब में ‘दिल्ली मॉडल’ के चल जाने से भाजपा खेमे में बेचैनी है। अरविंद केजरीवाल के दिल्ली मॉडल में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ३०० यूनिट तक मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी के कनेक्शन जैसी सुविधाएं शामिल हैं। उन्होंने १८ साल से अधिक उम्र की महिलाओं को आर्थिक मदद देने का भी वादा किया है। लोगों को यह पसंद आया। कांग्रेस के बागी कैप्टन के साथ पंजाब की सत्ता हथियाने निकली भाजपा वहां औंधे मुंह गिरी। भाजपा के विजय रथ को केजरीवाल ने पहले दिल्ली और अब पंजाब में रोक कर मोदी-शाह-योगी और उत्तर प्रदेश की जीत को बौना साबित कर दिया है।
कुछ तो गड़बड़ है
उत्तर प्रदेश में बहुमत मिलने के बावजूद भाजपा को ख़ुशी के बजाय तकलीफ ज्यादा हुई है। आंकड़ों वाली जीत का चाहे जितना दंभ भरा जाए लेकिन २०१७ के मुकाबले इस बार ४९ सीटों का कम आना भाजपा नेताओं को खल रहा है। उस पर तुर्रा यह कि अखिलेश यादव ने पिछली बार के मुकाबले ७३ सीटें बढ़ाकर एक तरह से भाजपा को चिढ़ाने का काम किया है। मोदी-शाह देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री हैं जबकि योगी देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं। इतने हाई प्रोफाइल नेता के रूप में प्रचार कर रहे इन तीनों के आगे आखिर अखिलेश तो कमजोर पड़ते ही हैं, लेकिन उनके प्रदर्शन ने साबित किया कि बंदे में दम है। अगर चुनावी मशीनरी, धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण, अकूत धन का उपयोग, झूठे और तथ्यहीन व्हॉट्सएपिया यूनिवर्सिटी ज्ञान को निकाल दिया जाए तो भाजपा का जीत पाना मुश्किल था। आश्चर्य तो यह है कि जिन-जिन इलाकों से भाजपा के मंत्री और विधायकों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया हो, उन्हें प्रचार तक न करने दिया गया हो वहां वह कैसे जीती? हालांकि योगी सरकार के ११ मंत्री चुनाव हार गए। दया की तर्ज पर ‘कुछ तो गड़बड़ है’ वाली बात है न?
अकेले के बस का रोग नहीं
पांच राज्यों में हुए चुनाव सबसे ज्यादा कांग्रेस के लिए नुकसानदायक रहे। पंजाब के अलावा उत्तराखंड और गोवा में तो वह मानकर चल रही थी कि वहां उसकी वापसी हो रही है लेकिन ऐसा हो नहीं सका। अब कांग्रेस नेता गोवा की हार के लिए ममता बनर्जी को दोष दे रहे हैं। कांग्रेस का मानना है कि वह भाजपा को खुश करने के लिए गोवा गर्इं। अशोक गहलोत तो मीडिया और प्रधानमंत्री की लच्छेदार बातों को कांग्रेस की हार का जिम्मेदार मान रहे हैं। यही बात मायावती भी कह रही हैं। साथ ही बसपा की हार के लिए वह मीडिया को कोस रही हैं। यहां तक कि उन्होंने अपने प्रवक्ताओं को टीवी डिबेट में जाने से भी रोक दिया है। इन नेताओं के बयान बताते हैं कि ये सभी हार से बौखला कर आक्रामक हो रहे हैं। यह समय सकारात्मक होकर अपनी-अपनी हार की समीक्षा करने और आगे की रणनीति बनाने का है। भाजपा को रोकने के नाम पर की जार ही बयानबाजियों में ही भाजपा की जीत छुपी हुई है। भाजपा समर्थक जिस तरह अन्य दलों को देशद्रोही तक बता देते हैं, उसकी काट सभी को मिलकर निकालनी होगी। यह अकेले के बस का रोग नहीं है।
दुश्मन का दुश्मन दोस्त
उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणाम की वजह से बिहार की सियासत गर्म हो गई है। चुनाव में करारी हार का सामना करनेवाले विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) सुप्रीमो और सन ऑफ मल्लाह कहे जानेवाले मुकेश सहनी को कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा नेता लगातार सहनी पर हमलावर हैं और उन्हें बिहार में गठबंधन से बाहर का रास्ता दिखाने की बात कर रहे हैं। दरअसल बिहार में भाजपा के सहयोगी मुकेश सहनी ने उत्तर प्रदेश में योगी के संसदीय कार्य मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला को ही हरवा दिया। बैरिया सीट से टिकट कटने पर वहां के भाजपा के कद्दावर नेता सुरेंद्र सिंह बागी को मुकेश सहनी ने अपना उम्मीदवार बना दिया जो १६ फीसदी वोट लेकर खुद भी हारे भाजपा को भी हरवाया और इस लड़ाई में बाजी अखिलेश के उम्मीदवार जय प्रकाश अंचल ने मारी। मुकेश सहनी की नीतीश कुमार के कैबिनेट से छुट्टी तय मानी जा रही है। लेकिन दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता की तर्ज पर अपने ही सहयोगी के टारगेट पर आए सहनी का आरजेडी ने समर्थन किया है।

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