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उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा अभी तो शुरुआत है!

सुषमा गजापुरे

पिछले कुछ वर्षों में ऐसा कोई वर्ष नहीं गया जब पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन, हिमस्खलन, भूकंप, पहाड़ों का दरकना, बादल फटना और ग्लेशियर झीलों के फटने जैसी घटना न घटित हुई हो। इन प्राकृतिक आपदाओं का कहर कुछ वर्षों से ज्यादा ही बढ़ गया है। पहाड़ धंस रहे हैं, नदियां उफान पर हैं, बारिश हद से ज्यादा हो रही है, भूकंप के झटके लग रहे हैं और पहाड़ों पर बर्फ़बारी भी डरा रही है। अभी पिछले पखवाड़े उत्तराखंड के उत्तरकाशी में सिलक्यारा सुरंग के धंसने की घटना से देश में दुख का माहौल बन गया था, जिसमें फंसे ४१ श्रमिक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। यमुनोत्री हाईवे सिलक्यारा और पोल गांव के बीच यह सुरंग बन रही थी, जिसके मुहाने के पास सुरंग का ३० से ३५ मीटर हिस्सा टूटकर नीचे आ गया था। ईश्वर की कृपा रही कि कई दिनों के अथक प्रयासों से सभी ४१ श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।

लेकिन इस घटना ने कई प्रश्न पैदा कर दिए हैं। मुख्य प्रश्न ये कि बिना पर्यावरण प्रभाव आकलन के ८८० किलोमीटर के चारधाम हाईवे स्वीकृत वैसे हुए, जबकि ये सभी हाईवे सबसे युवा हिमालयन शृंखला में निर्मित किए जा रहे थे। यहां किसी भी किस्म का निर्माण बिना ईआईए के वैसे हो रहा था। सच ये है कि ईआईए को टालने के लिए सरकार ने ८८० किलोमीटर के प्रोजेक्ट को ५० से अधिक टुकड़ों में बांट दिया, ताकि इस ईआईए की जरूरत ही न रहे। ये एक आपराधिक कृत्य है, जिसे कभी भी माफ नहीं किया जा सकता है। दूसरे सिलक्यारा प्रोजेक्ट टनल, जो कि ४.५ किलोमीटर लंबी थी उसमें एक भी एस्केप टनल क्यों नहीं बनाया गया। ये सभी गंभीर चूक हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना एक बहुत बड़े प्रलय को अंजाम देना है।

अगर आप भूले नहीं होंगे तो याद दिलाना आवश्यक है कि इसी तरह जोशीमठ के धंसने की चर्चा भी कई हफ्तों तक चली थी, सरकार हरकत में आई और फिर कुछ दिनों के बाद यह आपदा भी आई-गई हो गई। पहाड़ दरक रहे हैं, एक बसा-बसाया शहर जोशीमठ पूर्ण रूप से धंसने के कगार या विनाश के कगार पर है या फिर ये कहें कि अब वो आधा धंस चुका है, पर हमें फिक्र नहीं। हम सब शायद और बड़ी त्रासदी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। फिर कोई जांच होगी, कमिटी बिठाई जाएगी और खानापूर्ति की प्रक्रिया संपन्न की जाएगी। इंसानी जानों की किसी को कोई फिक्र नहीं। आस्था की अंधी दौड़ में हम ऐसी दिशा में बढ़ चुके हैं, जहां से कोई यू टर्न नहीं है।

अभी अक्टूबर महीने की बात है जब सिक्किम में हिम-लोहांक झील, ग्लेशियल लेक आउटबस्र्ट फ्लड (जीएलओएफ) यानी कि हिमनदी से निर्मित झील के फटने की घटना घट चुकी है। इसमें तीस्ता नदी पर बना ११,४०० करोड़ से निर्मित बांध पूरी तरह से बह गया। नदी पर बने १३ पुल भी पूरे बह गए। १०० से अधिक लोगों की जानें गर्इं और कई गांव पूरी तरह से नष्ट हो गए। कुल मिलाकर, १३,००० करोड़ का नुकसान हुआ। हिम झील के फटने की ये भारत में एक अद्भुत घटना थी और पर्यावरण बदलाव अथवा क्लाइमेट चेंज के दुष्परिणामों में से एक हमने इस वर्ष सिक्किम में भुगता। इसके अलावा उत्तराखंड और हिमाचल में हुआ विनाश किसी से भी छुपा नहीं है।

हम पर विकास का भूत ऐसा सवार है कि हम हिमालय के नाजुक ईको सिस्टम की महत्ता को पहचान ही नहीं पा रहे। पहाड़, नदियां, ग्लेशियर, जंगल और खाइयां इन सबकी अपनी संरचना होती है जिसके आधार पर वह स्थिर रहते हैं और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखते हैं। किंतु हम अपने विकास के नाम पर उनके साथ छेड़छाड़ करते हुए कभी बांध बनाते हैं, कभी पुल बनाते हैं तो कभी कोई बड़ा पावर प्रोजेक्ट बनाते हैं। थोड़ा सा पीछे जाएं तो केदारनाथ की आपदा अभी तक कोई भूला नहीं है। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। रिपोट्र्स बताती हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग अगर बढ़ती रही तो सन् २१०० तक हिमालय के दो तिहाई ग्लेशियर पिघल जाएंगे। ग्लेशियर का इस प्रकार टूटने और पिघलने का मतलब है कि बारहमासी नदियों में पानी का प्रवाह सूख जाना। ग्लेशियर ऊंचे पहाड़ों पर सालों तक बर्फ जमा होने से बनते हैं। जो आज हम देख रहे हैं वह सिर्फ और सिर्फ हिमप्रलय है।

सच कहा जाए तो सरकारों की उदासीनता और पर्यावरण के प्रति असंवेदनशीलता अब स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। हम क्यों किसी बड़ी घटना की प्रतीक्षा करते हैं और फिर उसके बाद जागते हैं? यह भारत की एक त्रासदी रही है कि यहां पर वैज्ञानिक और शोध रिपोर्टों को कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाता है और सरकार के बाबू लोग निर्णय लेते हैं कि हिमालय की ऊंचाइयों पर कैसे विकास कार्य किए जाएं। नहीं मालूम हम कब विनाशकारी योजनाओं पर सोचना बंद करेंगे। अगर हमने स्वयं पर रोक नहीं लगाई तो शीघ्र ही हिमालय के हर क्षेत्र में बड़ी-बड़ी त्रासदी देखने को मिलेगी और इन सबके लिए हम ही जिम्मेदार होंगे। अभी भी समय है कि हम संभल जाएं वरना…

(स्तंभ लेखक वैज्ञानिक, आर्थिक और समसामयिक विषयों पर चिंतक और विचारक हैं)

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