मुख्यपृष्ठनए समाचारसमाज के सिपाही : अनाथों के नाथ शंकर

समाज के सिपाही : अनाथों के नाथ शंकर

रवींद्र मिश्रा

आर्थिक सहयोग कर लोगों की मदद करनेवाले हजारों-लाखों लोग मिल जाएंगे। लेकिन तन-मन से सहयोग करनेवाला कोई बिरला ही होगा, जो किसी मुसीबत में पड़े इंसान की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता हो। शंकर मधुकर मुगलखेड़ जिसे लोग प्यार से शंकर अन्ना कहकर बुलाते हैं, एक छोटी सी सूचना मिलने पर लोगों की मदद के लिए दौड़ जाते हैं।
शंकर अन्ना की दिनचर्या अजीब है। जब लोग अपने घरों में चैन की नींद सो रहे होते हैं तब मजलूमों की सहायता के लिए वे घर से निकल पड़ते हैं। अपनी गाड़ी में खाने-पीने के सामान सहित थर्मस में चाय, कुछ पुराने कपड़े और मरहमपट्टी का सामान लेकर निकलनेवाले शंकर अन्ना के इस सेवाकार्य में पत्नी के साथ-साथ उनका बेटा भी उनकी मदद करता है। रास्ते में बीमार या मजलूम व्यक्ति के दिखाई देते ही शंकर अन्ना की गाड़ी रुक जाती है। पूछ-परख के बाद उसे चाय-नाश्ता दिया जाता है। अगर व्यक्ति बीमार हो तो उसे अस्पताल पहुंचाया जाता है और अगर अनाथ हो तो उसे अनाथालय पहुंचाने का काम करते हैं शंकर अन्ना। किसी भी मजबूर इंसान की सेवा वो भगवान की सेवा मानकर करते हैं। शंकर अन्ना बताते हैं कि सन २००० में देश में एचआईवी की चर्चा जोरों पर थी। लोग एक-दूसरे को छूने से भी डरते थे। उस समय रेड लाइट एरिया में एचआईवी रोग से ग्रसित महिलाओं को अस्पताल पहुंचाना, उनका इलाज करवाना तथा स्वस्थ होने पर उनका पुनर्वसन करवाना हमारा नित्य का कार्य था। जब किसी पुलिस स्टेशन से लावारिस लाश की सूचना मिलती, वहां पहुंचकर लाश का पंचनामा करवाने के बाद उसकी अंत्येष्टि करना हमारा नित्य का कर्तव्य बन गया है। अब तक पांच हजार से भी अधिक लावारिशों के वारिस बनकर वे उनका अंतिम संस्कार कर चुके हैं। किसी कारणवश अगर कोई अपने घर अथवा परिवार से बिछड़ गया है तो उसे मिलाने का काम भी शंकर अन्ना करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में अब तक ५०० से भी अधिक बिछड़े लोगों को उनके परिवार से मिलाकर उनके परिजनों के चेहरों पर खुशियां लाने का भी काम शंकर अन्ना ने किया है। मदर टेरेसा फाउंडेशन में मरहमपट्टी की ट्रेनिंग करनेवाले शंकर अन्ना बताते हैं कि लोग जिन्हें हाथ लगाने से डरते हैं हम उनके पास जाकर उनकी मरहमपट्टी करते हैं। उनके बढ़े हुए बालों को छोटा कर उनका उचित इलाज करवाते हैं और स्वस्थ होने पर उनके परिजनों से मिलाते हैं। दक्षिण मुंबई के किसी भी पुलिस स्टेशन से फोन आने पर लावारिस को वहां से उठाकर अस्पताल ले जाना, स्वस्थ होने पर उसे उसके गंतव्य तक पहुंचाना या उसका पुनर्वसन करना हमारा कार्य होता है। इस कार्य के लिए हमें मुंबई सहित महाराष्ट्र के कुछ टेंपरेरी सेल्टर कर्जत, चिंचवाड़, वाकड, एरोली, सांताक्रुज, बोईसर से भी मदद मिलती है। मुंबई मनपा के सहयोग से हमें माहुल में बेगर होम मिला है, जहां ग्रेस फाउंडेशन नामक संस्था के माध्यम से हम इस तरह के लोगों की मदद कर रहे हैं।

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