" /> करे कोई भरे कोई… बस कंडक्टर को मिली पुलिसकर्मियों के गुनाह की सजा

करे कोई भरे कोई… बस कंडक्टर को मिली पुलिसकर्मियों के गुनाह की सजा

भले ही सौ गुनहगार छूट जाएं लेकिन किसी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए, ये इंसाफ का तकाजा है। लेकिन कई बार पुलिस की लापरवाही कहें या फिर जानबूझकर निर्दोष लोगों को सलाखों के पीछे ठूंस देती है। पिछले दिनों अमेरिका में हत्या के एक मामले में २८ साल से जेल में बंद शख्स को कोर्ट ने निर्दोष पाया। वर्ष १९९१ में फिलाडेल्फिया में हुई एक हत्या के मामले में अमेरिकन पुलिस अश्वेत व्‍यक्ति चेस्‍टर हॉलमैन को जेल में बंद कर दिया था। इस केस की जांच २८ साल यानी २०१९ तक चली। कोर्ट ने अब उसे बाइज्जत बरी कर दिया है और प्रशासन को निर्देश दिया है कि निर्दोष कैदी चैस्टर हॉलमैन को ७२ करोड़ रुपए का हर्जाना दे। निर्दोष लोगों को जेल में डालने के ऐसे मामले हिंदुस्थान में अक्सर सामने आते हैं। हरियाणा के गुरुग्राम में तीन साल पहले हुई बहुचर्चित प्रिंस (बाल सत्र न्यायालय द्वारा दिया गया नाम) हत्याकांड में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। प्रिंस की हत्या के आरोप में बंद बस कंडक्टर को सीबीआई ने अपनी जांच में निर्दोष पाया है। इसे दैवीय कृपा ही कहेंगे कि आरोपी बस कंडक्टर निर्दोष साबित हुआ है लेकिन बेवजह जेल में बिताए गए उसके जीवन के कीमती तीन साल और उसके परिवार द्वारा भुगती गई यातनाओं का हिसाब कौन देगा? यह सवाल अभी भी बरकरार है।
साढ़े ३ साल पहले गुरुग्राम के रेयान पब्लिक स्कूल में हुई ७ साल के मासूम प्रिंस की हत्या को शायद ही कोई भूला होगा। उस वक्त इस घटना ने स्कूल प्रशासन पर बहुत बड़े सवाल खड़े कर दिए थे। ८ सितंबर २०१७ को दिल्ली से सटे हरियाणा के गुरुग्राम के भोंडसी स्थित एक निजी स्कूल में ७ वर्षीय मासूम प्रिंस (बाल सत्र न्यायालय द्वारा दिया गया नाम) की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। उसका गला रेता गया था। प्रिंस की खून से सनी लाश शौचालय में मिली थी। पुलिस ने इस मामले में स्कूल बस के कंडक्टर अशोक कुमार को गिरफ्तार किया था। बस कंडक्टर अशोक को फंसाने के लिए पुलिसकर्मियों ने अदालत में झूठा बयान भी दर्ज कराया। कहा जा रहा था कि कंडक्टर अशोक ने गलत काम करते देख लेने पर बच्चे की हत्या की थी। १२ सितंबर, २०१७ को चश्मदीद सुभाष गर्ग ने बताया कि अशोक की गोद में बच्चा जिंदा था। लेकिन परिजनों ने अशोक को फर्जी मामले में फंसाने का आरोप लगाया और इस केस की जांच सीबीआई से कराने की मांग उठाई। लगभग दो महीने बाद यानी १५ सितंबर को केस की जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई की जांच में पूरा मामला ही पलट गया। २३ सितंबर को स्कूल पहुंची सीबीआई की टम ने पूरी घटना का सीन री-क्रिएट किया और फॉरेंसिक टीम की मदद से सबूत जुटाए। सीबीआई से बस कंडक्टर अशोक को क्लीन चिट मिल गई और इससे पहले जिस छात्र भोलू (बाल सत्र न्यायालय द्वारा दिया गया नाम) को एसआईटी ने मुख्य गवाह बनाया था, उसे अशोक की जगह आरोपित बनाया गया। दरअसल पीटीएम (पेरेंट्स मीटिंग) कैंसिल करवाने के मकसद से उसी स्कूल के ११वीं क्लास के छात्र भोलू ने मासूम प्रिंस का कत्ल किया था, जबकि दबाव से बचने के लिए गुरुग्राम पुलिस ने बस कंडक्टर अशोक कुमार को प्रिंस हत्याकांड मामले में झूठा फंसाया। ७ नवंबर को सीबीआई ने स्कूल के ११वीं कक्षा के छात्र भोलू को आरोपी मानते हुए हिरासत में लिया। २१ नवंबर को कंडक्टर अशोक की जमानत मंजूर हुई तो २२ की शाम वह जेल से रिहा हो गया। अशोक जेल से छूट तो गया लेकिन पुलिस हिरासत में उसे इतना पीटा गया कि अब वह भारी सामान नहीं उठा सकता है। पीड़ित अशोक को जेल से बाहर आने पर कहीं काम नहीं मिला, परिवार सड़क पर आ गया और उसके बच्चों को स्कूल से निकाल दिया गया। सर्दियां आते ही वह दर्द से परेशान रहता है, उसका उठना-बैठना भी मुश्किल हो जाता है। अर्थात पुलिस के इस गुनाह की सजा पीड़ित बस कंडक्टर अशोक कुमार और उसके परिवार को भुगतनी पड़ी। फिलहाल सीबीआई ने अशोक को फर्जी मामले में फंसानेवाले चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ पंचकूला की विशेष कोर्ट में चालान पेश कर दिया। तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करने के आरोपित तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) बिरम सिंह, भोंडसी थाने के तत्कालीन प्रभारी नरेंद्र खटाना, सब-इंस्पेक्टर शमशेर सिंह एवं ईएएसआइ सुभाषचंद का भविष्य १५ जनवरी को तय होगा।