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कभी-कभी : तोड़ दिया कॉन्ट्रैक्ट…!

  • यू.एस.मिश्रा

कभी-कभार सिचुएशन ऐसी बन जाती है कि हम क्या करें और क्या न करें इस पर बात आकर अटक जाती है। आगे कुआं तो पीछे खाई नजर आती है। लेकिन इन दुविधा भरे पलों में कोई-न-कोई खेवनहार बनकर सामने आ जाता है और अंतत: किनारा मिल ही जाता है। अपने जमाने की एक मशहूर गायिका को भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ा जब वो इंडस्ट्री में नई-नई आई थीं। कॉन्ट्रैक्ट में बंधी इस गायिका को जब इंडस्ट्री में हर रोज एक नया ऑफर मिलने लगा तो मजबूरन उनके पिता को कॉन्ट्रैक्ट तोड़ना पड़ा।
बचपन से चोरी-छिपे गीत गानेवाली हेमलता को उनके शास्त्रीय गायक पिता जयचंद भट्ट उस्ताद अल्लारखा के पास इसलिए ले गए, ताकि वे हेमलता की आवाज को सुनकर उन्हें कुछ समझा सकें। लेकिन अल्लारखा ने जब हेमलता की आवाज सुनी तो उन्होंने पंडित जी को सलाह दी कि वो बेटी को लेकर उस्ताद रईस खां के पास चले जाएं क्योंकि उनका कनेक्शन फिल्मों से था और वो फिल्मों में सितार बजाते थे। वहीं पर पंडित हरि प्रसाद चौरसिया, पंडित शिव कुमार और अजीज नाजा ने जयचंद भट्ट को नौशाद का पता देते हुए उन्हें नौशाद के पास जाने को कहा। अगले दिन हेमलता को लेकर वे उस पते पर पहुंच गए। वहां पहुंचकर उन्होंने हेमलता की आवाज उन्हें सुनाई। वहां से लौटकर वापस आने के बाद उन्हें पता चला कि उन्होंने जिसे बेटी की आवाज सुनाई है वो कोई और नहीं, बल्कि मशहूर संगीतकार नौशाद थे। नौशाद के बुलावे पर दूसरे दिन जब जयचंद भट्ट बेटी को लेकर दोबारा उनके पास पहुंचे तो उन्होंने उनके पिता से एग्रीमेंट की बात की। पिता जयचंद भट्ट ने एग्रीमेंट के लिए ‘हां’ कह दिया। ५ साल के इस एग्रीमेंट में तय हुआ कि नौशाद साहब हेमलता को बाकायदा संगीत सिखाते हुए आगे चलकर उनकी आवाज को लॉन्च करेंगे। लेकिन अगले ही दिन अखबारों में मोटे-मोटे अक्षरों में छपा, ‘नौशाद की नई देन हेमलता’। अब ये खबर इंडस्ट्री में आग की तरह फैल गई और हर कोई हेमलता की आवाज सुनने के लिए उत्सुक हो उठा। बिना किसी मशक्कत किए उन्हें फिल्मों में गीत गाने के ऑफर्स मिलने लगे। लेकिन डायरेक्टर और प्रोड्यूसर को जब एग्रीमेंट की बात पता चलती तो वे उनसे कहते कि नौशाद साहब की हम इज्जत करते हैं और वो हमारे लिए पूजनीय हैं लेकिन आप हमें कम-से-कम अपनी आवाज तो सुना दो। उनके बहुत कहने पर हेमलता चोरी-चुपके उन्हें अपनी आवाज या एकाध गीत सुना देतीं क्योंकि वे इतनी छोटी थीं कि उन मेकर्स को मना करना उनके लिए आसान नहीं था। खैर, ऐसे ही एक दिन उन्हें ताड़देव के ‘फेमस लैब’ में बुलाया गया। उन्हें नहीं पता था कि वो स्टूडियो है। उन्हें लगा कोई घर होगा, जहां उनकी आवाज सुनने के लिए उन्हें बुलाया गया है। लेकिन जब वो वहां पहुंची तो उन्हें पता चला कि वो तो रिकॉर्डिंग स्टूडियो है। डर के मारे अब वो वहां से उल्टे पैर ये कहते हुए भागी कि वो एग्रीमेंट में बंधी हैं। वहां पर ‘राजश्री प्रोडक्शन’ की फिल्म ‘तकदीर’ का एक गाना ‘पप्पा जल्दी आ जाना…’ उन्हें लता मंगेशकर के साथ रिकॉर्ड करना था। उनके इस तरह भाग आने पर नौशाद साहब के असिस्टेंट मोहम्मद शफी ने उन्हें बहुत डांटा और गुस्से में बोले, ‘लता मंगेशकर तुम्हारे लिए डेढ़ घंटे बैठी रहीं। स्टूडियो के चार्ज के साथ उन ढेर सारे म्यूजिशियन को ओवरटाइम भी देना पड़ता है। ये क्या पागलपन है। किसने कहा था तुम्हें वहां जाने के लिए। इंडस्ट्री में तुम्हारी इस हरकत की चर्चा हर तरफ हो रही है।’ शफी साहब के डांटने पर उन्हें एहसास हुआ कि टेक पर नहीं जाने का कितना नुकसान होता है। अब शर्मिंदगी से भरी हेमलता अपने पिता के साथ फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकांत के पास पहुंचकर एक कोने में खड़ी हो गईं । लेकिन माफी मांगने के लिए उन्हें शब्द नहीं मिल रहे थे। किसी तरह मुंह से बस इतना ही निकल पाया कि ‘हमें इंडस्ट्री के तौर-तरीकों के बारे में नहीं पता था।’ तब लक्ष्मीकांत ने जयचंद भट्ट के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘पंडित जी, मैं सब समझता हूं लेकिन जब पांच साल के बाद आपकी बेटी इस एग्रीमेंट से बाहर निकलेगी तब आप उसे कौन-सी इंडस्ट्री में गाना गवाएंगे क्योंकि तब तक तो आप इस इंडस्ट्री को नाराज कर चुके होंगे। ये वो इंडस्ट्री है, जहां लता जी जैसी ग्रेट सिंगर ने भी चप्पलें तोड़ी हैं। आपकी बिटिया को तो ट्रे में करियर मिल गया और आप सबको ना कर रहे हैं। मैं आपसे बिल्कुल भी नाराज नहीं हूं, आप चिंता न करें।’ हेमलता के पिता घर तो आ गए लेकिन रात भर उन्हें नींद नहीं आई। अगले दिन वो नौशाद साहब के पास पहुंचे और बड़े ही बुझे मन से उन्होंने कॉन्ट्रेक्ट को तोड़ दिया। कॉन्ट्रैक्ट के टूटते ही अगले दिन उषा खन्ना के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘एक फूल एक भूल’ के ‘दस पैसे में राम ले लो…’ गीत से इंडस्ट्री में हेमलता का आगाज हुआ।

 

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