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कभी-कभी : हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं…

यू.एस. मिश्रा

कोई व्यक्ति अपने घर में रखी पार्टी में अपने साथ काम कर रहे लोगों को आमंत्रित करे और एक व्यक्ति को निमंत्रित न करे तो उस व्यक्ति को कितना बुरा लगेगा, इस बात का अंदाजा तो वही लगा सकता है जिसे निमंत्रित न किया गया हो। खैर, बीते जमाने की एक फिल्म में काम कर रहे कलाकार ने अपने घर में होनेवाली पार्टी का निमंत्रण सेट पर उपस्थित सभी लोगों को दिया लेकिन वहां उपस्थित बाल कलाकार को नहीं दिया। निमंत्रण न मिलने पर उस बाल कलाकार को इतना बुरा लगा कि उसने बिना हिचके इस बात का इजहार कर दिया और…
१९६८ में रिलीज हुई फिल्म ‘सुहागरात’ की शूटिंग के दौरान महमूद सेट पर उपस्थित सभी लोगों को बेटी जिनी के पैदा होने की खुशी में घर आने का निमंत्रण दे रहे थे लेकिन जूनियर महमूद को निमंत्रण देना भूल गए। ये बात जूनियर महमूद को इतनी चुभ गई कि उन्होंने महमूद साहब की आंखों में आंखें डालकर कहा, ‘क्या भाईजान, मेरा बाप कोई प्रोड्यूसर-डायरेक्टर या राइटर नहीं है तो क्या मैं आपकी बच्ची के फंक्शन में आपके घर नहीं आ सकता?’ जूनियर महमूद की बात सुनकर महमूद साहब सकते में आ गए। उन्होंने तुरंत छूटते हुए कहा, ‘तू भी आना यार।’ महमूद साहब का निमंत्रण मिलते ही जूनियर महमूद बोले, ‘भाईजान, मैं आपका फंक्शन हिलाकर रख दूंगा।’ जूनियर महमूद की बात सुनकर महमूद साहब बोले, ‘तू वहां ऐसा क्या करेगा?’ जूनियर महमूद बोले, ‘भाईजान मैं आपका डांस करूंगा ‘हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं…’ मैं पूरा प्रोग्राम हिलाकर रख दूंगा और साथ में एक छोटी हेलन भी लेकर आऊंगा।’ खैर, महमूद ने उनसे कहा कि ‘तू जरूर आना।’ फंक्शन वाले दिन जूनियर महमूद ने अपने पिता से महमूद साहब के घर अंधेरी चलने का आग्रह किया। जूनियर महमूद की बात सुनकर उनके पिता ने कहा, ‘क्या तू पागल है। इतने बड़े आदमी के घर फंक्शन पर हम जाएंगे।’ किसी तरह मान-मनौव्वल के बाद उनके पिता राजी हो गए और वो पिता के साथ अंधेरी स्टेशन के बाहर पहुंच गए। एस.वी. रोड पर पहुंचने के बाद उनके पिता ने जूनियर महमूद से पूछा, ‘कहां है महमूद साहब का घर?’ अब जूनियर महमूद बोले, ‘भाईजान ने कहा था कि स्टेशन से बाहर आने के बाद किसी से भी मेरा घर पूछ लेना।’ अब उन्होंने एक राहगीर से पूछा, ‘अंकल यहां महमूद साहब कहां रहते हैं?’ राहगीर ने उनसे कहा, ‘ये गाड़ियों की लाइन जहां खत्म होगी न बेटा वही उनका घर है।’ बड़ी-बड़ी गाड़ियों के लगे इस तांते को देख जूनियर महमूद के पिता ने झेंपते हुए उनसे कहा, ‘बेटा, अभी भी समय है, तू जिद मत कर, चल वापस घर लौट चलते हैं।’ जूनियर महमूद अड़ गए और बोले, ‘भाईजान बहुत अच्छे हैं चलो, चलो।’ महमूद के घर पहुंचने के बाद जूनियर महमूद ने वॉचमैन को बताया कि वो महमूद साहब के साथ फिल्म ‘सुहागरात’ में काम कर रहे हैं और महमूद साहब ने उन्हें इन्वाइट किया है। खैर, जूनियर महमूद की बात पर यकीन करने और उनका हुलिया देखने के बाद वॉचमैन ने उन्हें मेन गेट से नहीं, बल्कि पीछे जहां खाना वगैरह बन रहा था वहां से अंदर जाने को कहा। अंदर पहुंचने के बाद जूनियर महमूद ने देखा कि वहां बने स्टेज पर एक आदमी चहलकदमी कर रहा है और बाकी कलाकार तैयार हो रहे हैं। खैर, चहलकदमी कर रहे उस व्यक्ति से जूनियर महमूद ने कहा, ‘अंकल, भाईजान से कहना नईम आया है।’ अब जूनियर महमूद के पिता ने उन्हें पीछे से मारते हुए कहा, ‘तू ये कर क्या रहा है? क्या तुझे तमीज नहीं है। तू किसको मैसेज देने को कह रहा है? तुझे पता है वो कौन हैं?’ अब जूनियर महमूद ने पूछा, ‘कौन हैं?’ उनके पिता बोले, ‘अमीन सयानी साहब हैं।’ खैर, अमीन सयानी ने जूनियर महमूद का मैसेज महमूद साहब तक पहुंचा दिया। मैसेज मिलते ही महमूद साहब बाहर निकले और जूनियर महमूद से बोले, ‘आ गया तू… जा तू तैयार हो जा और जब मैं तुझे बोलूं तब तू स्टेज पर आ जाना।’ इसके बाद जूनियर महमूद उस फंक्शन में जमकर नाचे। इस गाने के बाद जूनियर महमूद को वहां उपस्थित लोगों ने गोद में उठा लिया। प्रोग्राम खत्म होने के बाद महमूद ने जूनियर महमूद के पिता से कहा, ‘एक काम कीजिए, इस बच्चे को थोड़ा-सा मेरे कंट्रोल में रखिए। आप कल ‘रंजीत’ स्टूडियो दादर ले आइए इसे। मैं इसको अपना चेला बनाऊंगा और इसे अपना नाम दूंगा।’ दूसरे दिन महमूद साहब के कहे अनुसार जूनियर महमूद ‘रंजीत’ स्टूडियो पहुंच गए। बतौर गुरु दक्षिणा सवा पांच रुपए उन्होंने महमूद के सामने रख दिए। नईम सय्यद को गंडा बांधते हुए महमूद ने उन्हें अपना नाम जूनियर महमूद देकर उन्हें फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया।

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