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कभी-कभी : मां के बिना कुछ नहीं…-साहिर लुधियानवी

यू.एस. मिश्रा

माता-पिता के बिना क्या कोई व्यक्ति जीवन की कल्पना कर सकता है। बिल्कुल भी नहीं न। हमारे इर्द-गिर्द ऐसे कई लोग हैं, जो बिना माता-पिता की इजाजत के कोई काम नहीं करते और कई ऐसे भी हैं, जो उनसे इजाजत लेना तो दूर उनका सम्मान तक नहीं करते। अपने जमाने के मशहूर गीतकार जिन्होंने एक से बढ़कर एक नायाब गीत लिखे, से जब कोई व्यक्ति कोई बात कहता तो वे उस बात को खुद तक सीमित रखने की बजाय उस बात से अपनी मां को भी अवगत कराते और उस विषय पर उनसे उनकी राय मांगते। अपनी मां के बिना एक कदम भी आगे न बढ़ानेवाले गीतकार बिना अपनी मां को साथ लिए किसी भी प्रोग्राम या मुशायरे में शिरकत तक नहीं करते थे।
८ मार्च, १९२१ को लुधियाना में एक पंजाबी मुस्लिम परिवार में जन्मे अब्दुल हयी उर्फ साहिर लुधियानवी का शुमार क्रांतिकारी कवियों में किया जाता है। अपने पति से अलग होने के बाद उनकी मां सरदार बेगम ने बेटे साहिर का पालन-पोषण किया। अपनी मां से बेपनाह मोहब्बत करनेवाले साहिर को ताउम्र अपने पिता से नफरत रही। फिल्म ‘नौजवान’ के गीतों से फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनानेवाले साहिर लुधियानवी के जीवन में मां की बहुत अहमियत थी। साहिर न सिर्फ मां की इज्जत करते थे, बल्कि वो उनकी इबादत भी करते थे। अपनी मां को ऊंचा दर्जा देनेवाले साहिर बिन मां के अधूरे थे। प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, स्टार या म्यूजिक डायरेक्टर से बिना किसी डर के लड़ जानेवाले और बेहिचक अपनी बात फिर चाहे सामने मिनिस्टर ही क्यों न खड़ा हो कह देनेवाले साहिर मां के सामने इतने मजबूर हो जाते थे कि उसे देखकर लोगों को हैरत होती थी। मुंबई के वर्सोवा इलाके में रहनेवाले साहिर के बंगले में ड्राइंग रूम के बाद एक कमरा था, उसके बाद कॉरिडोर था और सबसे अंत में उनकी मां का कमरा था। यानी एक छोर पर मां का कमरा था तो दूसरे छोर पर ड्राइंग रूम था। जावेद अख्तर का उनके घर अक्सर आना-जाना लगा रहता। जावेद अख्तर जब कभी साहिर साहब से मिलने उनके घर पहुंचते तो ड्राइंग रूम में बैठ जाते। बातचीत के दौरान जब साहिर साहब हाथ में गिलास ले लेते तो जब तक शराब पीते, फिर चाहे वो कितने ही घंटे क्यों न हो, टहलते हुए शराब पीते। कभी बैठकर उन्होंने शराब नहीं पी। वो ड्राइंग रूम में टहलते हुए अथवा एक जगह खड़े होकर शराब पीते थे लेकिन शराब पीते हुए बिल्कुल भी नहीं बैठते थे और ये उनकी आदत थी। ये देखकर जावेद अख्तर को बड़ा अजीब लगता था कि साहिर साहब खड़े हैं और वो बैठे हुए हैं। खैर, दोनों के बीच चल रही गुफ्तगू के दौरान मान लीजिए जावेद अख्तर या सामने बैठे किसी दूसरे व्यक्ति ने उनसे कोई बात कह दी कि ‘साहिर साहब, ये तो आपका बहुत अच्छा ऑब्जर्वेशन है और सही बात है, आजकल बिल्कुल ऐसा ही हो रहा है।’ अब खुद को ‘फकीर’ कहनेवाले साहिर साहब उस व्यक्ति से कहते, ‘अब फकीर के दिमाग में एक बात आ गई तो कह दी। अब तुम लोगों को अच्छी लगी तो बड़ी बात है। खुशी हुई मुझे कि तुम्हें पसंद आई ये बात।’ अभी दोनों के बीच बात चल ही रही है कि इसी बीच साहिर साहब पलक झपकते ही ड्राइंग रूम से पूरे घर को अपने कदमों से नापते हुए मां के कमरे में पहुंच जाते। अपने कमरे में बैठी हुई मां किसी काम में व्यस्त रहतीं और उन्हें बिल्कुल भी पता नहीं होता कि ड्राइंग रूम में किस विषय पर बातचीत चल रही थी। अब वहां पहुंचते ही साहिर अपनी मां से कहते, ‘मां, वहां ये बातचीत चल रही थी तो मैंने ये कहा। मेरी बात सुनकर उन लोगों ने कहा कि ये तो बड़े कमाल की बात कह दी है आपने। वैसे कोई कमाल की बात थी नहीं।’ साहिर की बात सुनकर मां कहतीं, ‘नहीं बेटा, ये तो तूने बहुत अच्छी बात कह दी। बहुत सही है, बहुत अच्छा।’ अब मां को अपनी बात बताकर साहिर फिर वहां से ड्राइंग रूम में आ जाते। बात कोई भी क्यों न हो ४०-४५ वर्ष के हो जाने के बावजूद साहिर अपनी मां से छोटी से छोटी बात बताकर उनसे उनकी राय जरूर लेते। मां के बिना वो अपना एक कदम भी कहीं किसी ओर नहीं बढ़ा सकते थे। देश के किसी भी कोने से गर साहिर को मुशायरे के लिए आमंत्रित किया जाता तो वे अपने साथ मां को कार में ले जाना नहीं भूलते। बिना मां के वो किसी भी फंक्शन या मुशायरे में शिरकत नहीं करते और न ही सफर करते थे। अपनी कलम से कागज पर मोहब्बत के नगमें उकेरने वाले साहिर की शख्सियत के बारे में वैâफी आजमी ने सच ही कहा था, ‘साहिर की शायरी उनकी मां की पीड़ा से उठती हुई भाप की तासीर थी।’

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