मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना...कभी उनकी भी तो दुनिया आबाद हो

…कभी उनकी भी तो दुनिया आबाद हो

वो जो ईंटों को जोड़कर चूल्हे जलाते हैं,
फावड़े को पलट उस पर रोटी बनाते हैं,
थकान ओढ़कर सो जाते हैं जो पत्थरों पर,
कभी उनके भी तो हक की बात हो,
कभी उनके हिस्से में भी तो चांदनी रात हो।
वो जो गुब्बारे बेचते हैं हमारी गलियों में,
हाथ जकड़े हैं जिनके बेबसी की हथकड़ियों में,
रगड़ कर चमका देते हैं सबके जूतों को,
कभी उनके भी तो पूरे कुछ अरमान हों,
कभी उनके चेहरों पर भी तो मुस्कान हो।
वो जो दरिया निकाल देते हैं रेगिस्तानों में,
खपा देते हैं जिंदगी अपनी खानों में,
चीर देते हैं जो पत्थरों का सीना भी,
कभी उनके लिए भी तो जिंदाबाद हो,
कभी उनकी भी तो दुनिया आबाद हो।
-एड. बृज लाल तिवारी, गोंडा 

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