मुख्यपृष्ठस्तंभकभी-कभी : तुझे दिल ढूंढ रहा है...!

कभी-कभी : तुझे दिल ढूंढ रहा है…!

यू.एस. मिश्रा

वो पढ़े-लिखे नहीं थे। न तो स्कूल गए थे और न ही कॉलेज लेकिन समझदार इतने थे कि पढ़े-लिखों के कान काटते थे। सीखने का जज्बा और कुछ कर दिखाने की उनमें इतनी ललक थी कि वे कहते थे इल्म किताबों से नहीं, सोसायटी और सोहबत से हासिल होता है। बचपन से ही हीरो बनने का सपना देखा करते थे लेकिन पिता इसके खिलाफ थे। अस्तबल में घोड़े की नाल की मरम्मत करनेवाले एक शख्स से उनकी मुलाकात क्या हुई उसके साथ वे मुंबई चले आए। यहां आने के बाद अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने न केवल फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया, बल्कि उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों ने इतिहास रच दिया और वे एक जाने-माने कामयाब डायरेक्टर बन गए।
९ सितंबर, १९०७ को गुजरात के बिलीमोरा में एक पुलिस कॉन्स्टेबल के घर रमजान खान उर्फ महबूब खान का जन्म हुआ था। वे पढ़े-लिखे तो नहीं थे लेकिन कुछ कर गुजरने की चाहत और सीखने के जज्बे ने उनकी एक अलग पहचान बनाई। बचपन से ही हीरो बनने का सपना देखनेवाले महबूब खान के इस सपने के खिलाफ उनके घरवाले थे। लेकिन जब भी उन्हें मौका मिलता वे रेलगाड़ी पकड़कर फिल्म देखने अगल-बगल के शहरों में चले जाते और शाम तक घर लौट आते। परिवार में किसी को भी इस बात की भनक तक नहीं लगती। हीरो बनने की यही चाहत १६ बरस की उम्र में एक दिन उन्हें मुंबई खींच लाई। वे घर से भागकर मुंबई पहुंच गए। उनके इस तरह घर से भाग जाने के बाद घर में कोहराम मच गया। अंतत: जब उनके पिता को उनके मुंबई आने का पता चला तो वे भी उनके पीछे-पीछे मुंबई पहुंच गए और उन्हें पकड़कर अपने साथ ले गए। बेटा दोबारा घर से न भागे इसके लिए उन्होंने छोटी उम्र में उनकी शादी कर उनके पैरों में विवाह रूपी बेड़ी ये सोचकर डाल दी कि पारिवारिक जिम्मेदारियों में फंसकर बेटा फिल्मों में हीरो बनने के अपने सपनों को तिलांजलि दे देगा। एक बेटे का पिता बन जाने के बावजूद उनका मन पारिवारिक जिंदगी में नहीं रमा। उसी दौरान उनकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई, जो फिल्मों में घोड़ा सप्लाई करने का काम किया करता था। उसके साथ वे मुंबई चले आए और फिल्मों में छोटा-मोटा काम करने लगे। साइलेंट फिल्मों के दौर में उन्हें फिल्में असिस्ट करने का मौका मिला। जब अर्देशिर ईरानी ने पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ के लिए बतौर हीरो उन्हें साइन किया तो फाइनेंसर्स के कहने पर उन्होंने अपना इरादा बदल दिया और ये फिल्म विट्ठल को मिल गई। इस वाकये के बाद महबूब खान समझ गए कि उन्हें फिल्मों में लीड रोल नहीं मिलनेवाला। अब उन्होंने हीरो बनने की बजाय कुछ नया करने की सोची और वो फिल्मों की कहानियां लिखने में जुट गए। अपनी कहानियों को लेकर एक स्टूडियो से लेकर दूसरे स्टूडियो में घूमते हुए प्रोड्यूसर्स के चक्कर काटा करते। आखिरकार, उनकी कहानी एक प्रोड्यूसर को पसंद आ गई और १९३५ में उन्हें फिल्म ‘अल हिलाल’ को डायरेक्ट करने का मौका मिला। इसके बाद तो उन्होंने ‘डेक्कन क्वीन’, ‘एक ही रास्ता’, ‘अलीबाबा’, ‘औरत’ और ‘बहन’ जैसी एक से बढ़कर एक फिल्में डायरेक्ट की। १९४० में फिल्म ‘औरत’ को डायरेक्ट करनेवाले महबूब खान ने दो वर्ष बाद ही अपनी पहली पत्नी को तलाक देकर फिल्म ‘औरत’ की हीरोइन सरदार अख्तर से विवाह कर लिया। पहली पत्नी से उन्हें तीन बेटे थे लेकिन सरदार अख्तर से शादी करने के बाद उन्होंने एक बेटे को गोद ले लिया। १९४५ में ‘महबूब प्रोडक्शन’ की स्थापना करनेवाले महबूब खान ने अपने बैनर तले ‘अनमोल घड़ी’, ‘अमर’, ‘आन’, ‘मदर इंडिया’, ‘सन ऑफ इंडिया’ जैसी बेहतरीन फिल्में बनाई। १९५४ में ‘महबूब स्टूडियो’ की स्थापना करनेवाले महबूब खान ने १९६२ में फिल्म ‘सन ऑफ इंडिया’ का निर्माण किया, जो उनकी अंतिम फिल्म थी। ‘सन ऑफ इंडिया’ के फ्लॉप होने के बाद महबूब खान अपनी अगली फिल्म पर काम कर ही रहे थे कि तभी २७ मई, १९६४ को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया। जवाहरलाल नेहरू की मौत का सदमा महबूब खान को इतना गहरा लगा कि अगले दिन २८ मई, १९६४ को हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई।

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