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कश्मीर में एसओपी होती है नजरअंदाज!

-प्रत्येक आतंकी हमले के बाद जारी होते हैं दिशानिर्देश

सुरेश एस डुग्गर / जम्मू

करीब ३९ दिनों के उपरांत जिस पुलिस अधिकारी को डाक्टरों ने सिर में गोली लगने के कारण मृत घोषित कर दिया, उसकी मृत्यु के बाद कश्मीर में एक बार फिर एसओपी अर्थात मानक संचालन प्रक्रिया चर्चा में है। यह चर्चा में इसलिए है क्योंकि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने फिर दोहराया है कि पुलिस को एसओपी का सख्ती से पालन करना होगा। हालांकि, यह एक कड़वी सच्चाई है कि कश्मीर में पुलिस पर हुए प्रत्येक आतंकी हमले के उपरांत ऐसे दिशानिर्देशों को हमेशा ही नजरअंदाज किया जाता रहा है।
ज्यादा पुरानी बात न करें तो भी १३ दिसंबर २०२१ को आतंकियों ने श्रीनगर के जेवान चौक में एक पुलिस बस पर हमला बोल कर तीन पुलिसवालों को मार डाला था, जो बिना किसी सुरक्षा कवच के अपनी ड्यूटी निभाकर वापस आ रही थी। इस हमले के उपरांत जब बहुत हो हल्ला मचा तो यह फैसला लिया गया था कि भविष्य में पुलिसकर्मियों को बुलेट प्रूफ वाहन मुहैया करवाने के अतिरिक्त उन्हें एस्कार्ट भी दिए जाएंगे।
इस साल ३१ अक्टूबर को आतंकियों ने एक पुलिसकर्मी गुलाम मुहम्मद डार को पाटन में उस समय गोली मारी जब वे अपने घर आए हुए थे। ऐसे कई मामले हैं, जिसमें छुट्टी पर घर आए पुलिसकर्मियों पर आतंकियों ने हमले किए।
प्रत्येक ऐसी घटना के लिए एसओपी का पालन न करने की बात कही गई और फिर से दोहराया गया कि सभी को एसओपी का सख्ती से पालन करना होगा। जिस पुलिस इंस्पेक्टर मसरूर वानी को श्रीनगर के खेल मैदान में गोली मार दी गई थी, उसको लेकर अब वरिष्ठ पुलिस अधिकारी दावा करते हैं कि उन पर हमला किए जाने के इनपुट थे, लेकिन मानक संचालन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था जो एक भारी भूल थी।
ऐसे ही एसओपी की अनदेखी १४ फरवरी २०१९ को पुलवामा हमले के दौरान भी सामने आई थी, जब केरिपुब के ४७ से अधिक जवान कश्मीर में आज तक के हुए सबसे भयानक विस्फोट में शहीद हुए थे। यह एक कड़वी सच्चाई है कि कश्मीर में ३६ सालों से पैâले हुए पाक समर्थित आतंकवाद के दौर में न जाने कितनी बार मानक संचालन प्रक्रिया का पालन करने के निर्देश जारी किए गए होंगें और कितनी बार उनकी अनदेखी की गई होगी, इसका कोई रिकॉर्ड ही नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि हर बार ऐसी कथित लापरवाही का खामियाजा सुरक्षाबलों को ही भुगतना पड़ा है।

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