" /> नहीं चहकेगी गौरैया!… खत्म हो जाएंगी १० लाख प्रजातियां

नहीं चहकेगी गौरैया!… खत्म हो जाएंगी १० लाख प्रजातियां

संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने जताई चिंता
देश और दुनिया में जैसे-जैसे इंसानों की जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, वैसे-वैसे पशु-पक्षियों जैसी अनेक जीवों की संख्या घटती जा रही है। इन्हीं जीवों में शामिल है, गौरैया चिड़िया। ये पक्षी कुछ ही दशक पहले तक सबके घर-आंगन में चहचहाते थे लेकिन अब नहीं के बराबर दिखते हैं। कौवों की भी ऐसी स्थिति है। अब वे भी बेहद कम या न के बराबर दिखते हैं। दरअसल ऐसा केवल हिंदुस्थान में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक अभी धरती पर जीवों की ९० लाख प्रजातियां हैं और इनमें से १० लाख प्रजातियों के इसी सदी में विलुप्त हो जाने का खतरा है।
इसी महीने आयोजित संयुक्त राष्ट्र के १५वें जैव विविधता सम्मेलन (सीओपी१५) में इन बातों पर चिंता जताई गई है। इस सम्मेलन में पारित जैव विविधता पर ‘कुनमिंग घोषणा पत्र’ की शुरुआत कुछ इस तरह की गई है, ‘जैव विविधता को सुधार की राह पर लाना इस दशक की एक बड़ी चुनौती है।’ लेकिन सवाल उठ रहा है कि अगर धरती से इसी तरह जीव विलुप्त होते रहे तो क्या यह धरती इंसानों के लायक रहेगी?
इस ऑनलाइन आयोजन के बाद अब जनवरी २०२२ में जिनेवा में एक बैठक होगी और ये वार्ताएं अप्रैल २०२२ में चीन के कुनमिंग में औपचारिक रूप से समाप्त होंगी, जिसमें दुनिया आगामी दशक के लक्ष्यों के साथ वैश्विक जैव विविधता प्रारूप पर सहमति बनाएगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि जैव विविधता गंभीर रूप में कम हो रही है। इस संबंध में २०१९ में एक रिपोर्ट में कहा गया था कि पृथ्वी पर करीब ९० लाख प्रजातियों में से १० लाख प्रजातियां इसी सदी के अंत तक खत्म हो जाएंगी।
प्रदूषण से जुड़ा है जैव विविधता संकट
वैश्विक संकटों पर अक्सर अलग-अलग चर्चा की जाती है। दुनिया जैव विविधता संकट, जलवायु संकट और वायु प्रदूषण संकट का सामना कर रही है, लेकिन वास्तव में ये सभी मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं। इन्हें अलग-अलग करके देखने से प्रजातियां और अंतत: मानवता पर इनके मिलकर पड़नेवाले प्रभाव नजरअंदाज हो जाते हैं। दुनिया २०१० तक जैव विविधता में कमी की दर पर अंकुश लगाने के लक्ष्य से चूक गई और फिर उसने २०२० के लिए २० लक्ष्य निर्धारित किए। भले ही इस दिशा में कुछ प्रगति हुई है लेकिन २० में से अधिकांश लक्ष्य पूरे नहीं हुए।
आगे क्या होगा?
ग्लासगो में आयोजित होनेवाली सीओपी२६ जलवायु वार्ता में जैव विविधता की रक्षा करने पर मुख्य रूप से वार्ता की जाएगी। यह महत्वपूर्ण है कि जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता में कमी आपस में जुड़ी समस्याएं मानी जाती हैं, इसलिए जलवायु परिवर्तन संबंधी कदम जैव विविधता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। जैविक फसलों को उगाने या कार्बन उत्सर्जन को कम करने के एकमात्र उद्देश्य से वनों का प्रबंधन करने का मतलब जैव विविधता वाले आवासों को बदलना हो सकता है। इसके विपरीत, बाढ़ को कम करने के लिए तटीय आवासों की रक्षा करने जैसे प्रकृति आधारित समाधान जैव विविधता की बहाली में मददगार हो सकते हैं।