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संपादकीय : ‘इसरो’ का विशेष अभिनंदन, चंद्रोत्सव!

भारत की चंद्रयान मुहिम सफल हो गई और यह १४० करोड़ भारतीयों की दृष्टि से गौरवपूर्ण क्षण है। इसके लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अर्थात ‘इसरो’ के सभी वैज्ञानिकों का जितना भी अभिनंदन किया जाए उतना कम है। चंद्रयान सफलतापूर्वक चांद पर उतरा तो सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी की वजह से ऐसा उनके भक्त कहते फिर रहे हैं। ‘चंद्रयान’ चांद तक पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत करनेवाले वैज्ञानिकों का यह अपमान है। भारत से पहले रूस ने चंद्र मुहिम चलाई थी, लेकिन उनका यान ‘लूना’ चांद पर उतरने से पहले ही ध्वस्त हो गया। अंतरिक्ष यान का थ्रस्टर तय ८४ सेकंड के बदले १२७ सेकंड के लिए उड़ गया जिसकी वजह से रशिया का चंद्रयान व्रैâश हो गया। रशिया की चंद्र मुहिम की असफलता से अंतरिक्ष की स्थिति पर सवालिया निशान खड़े हो गए थे, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने इस परिस्थिति को मात देकर अपना चंद्रयान चंद्रमा पर उतार दिया। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष यान उतारनेवाला भारत पहला देश बन गया है। देश के सभी वैज्ञानिक उपक्रमों के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण क्षण है। पृथ्वी से चांद की दूरी लगभग ३ लाख ८४ हजार किलोमीटर है। हम पृथ्वी से चांद का जो प्यारा व शीतल रूप देखते हैं वह अलग है और प्रत्यक्ष तौर पर चांद का स्वरूप अलग है। चांद के दक्षिणी ध्रुव की जमीन ऊबड़-खाबड़ है। मुंबई-गोवा महामार्ग के गड्ढों की याद दिला दें, ऐसे बड़े-बड़े गड्ढे चांद पर हैं। इसीलिए चंद्रयान के उतरते समय एक चुनौती थी। उन्नत सेंसरों का उपयोग करके प्रकाश योजना को बदलना पड़ा। कई कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए पृथ्वी के अपने वैज्ञानिकों ने चंद्रयान को चांद पर उतारा। चंद्रयान मानव रहित है, लेकिन मानव का उस पर नियंत्रण है। राकेश शर्मा यह प्रथम भारतीय व्यक्ति थे, जो अंतरिक्ष में गए थे। भारतीय मूल की अमेरिकन सुनीता विलियम अंतरिक्ष में सबसे लंबे समय तक रहीं। कल्पना चावला यह प्रथम अमेरिकी मूल की भारतीय महिला अंतरिक्ष में गई थीं। अब भारतीय यान चांद पर उतर चुका है। चांद पर हवा, पानी, खनिज इत्यादि संपत्तियों की खोज यह ‘चंद्रयान-३’ करेगा। विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह पर उतरा और अपना निर्धारित मिशन शुरू किया। आज की इस यशस्वी मुहिम का राजनैतिक श्रेय जो लेना चाहते हैं उन्हें लेने दो, लेकिन स्वतंत्रता के बाद देश को विज्ञान, तकनीक, परमाणु शक्ति जैसे क्षेत्रों में तरक्की करनी चाहिए इसके लिए पंडित नेहरू ने खूब मेहनत की। पंडित नेहरू और शोधकर्ता विक्रम साराभाई की संकल्पना से वर्ष १९६२ में इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च की स्थापना हुई। इसी के माध्यम से आगे चलकर १५ अगस्त, १९६९ को ‘इसरो’ की स्थापना हुई। तब से ‘इसरो’ द्वारा कई मील के पत्थर स्थापित किए गए हैं। स्थापना के मात्र छह सालों के भीतर, अर्थात १९७५ में इसरो ने ३६० किलो भार वाले ‘आर्यभट’ इस प्रथम कृत्रिम उपग्रह को सफलतापूर्वक लॉन्च किया और अपने भविष्य के अंतरिक्ष मुहिम कार्य का मुहूर्त साधा। ‘मिशन मंगल’ मुहिम भी इसरो ने सफलतापूर्वक पूरा किया। भारत मंगल ग्रह पहुंचनेवाला पहला देश बना। मंगल मुहिम की तरह ही ‘मिशन मून’ भी इसरो ने अब सफलतापूर्वक पूरा किया है। २००८ में इस मुहिम का प्रथम चरण ‘चंद्रयान-१’ के रूप में सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में पहुंचा। लेकिन एक साल के भीतर ही उसका संपर्क टूट गया। इसके बाद चांद के दक्षिण ध्रुुव पर ‘चंद्रयान-२’ उतारने की चुनौतीपूर्ण और कठिन मुहिम इसरो ने शुरू की। लेकिन दुर्भाग्य से ६ सितंबर, २०१९ को अंतिम क्षण में विक्रम लैंडर को चांद के दक्षिण ध्रुव पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने में सफलता नहीं मिल सकी। इसके बावजूद हार न मानते हुए ‘इसरो’ के वैज्ञानिकों-तकनीशियनों ने ‘चंद्रयान-३’ मुहिम की तैयारी की और इसे सफल कर दिखाया। चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष यान उतारनेवाला भारत पहला देश बन गया है। पिछले छह दशकों से हम सभी चांद से हस्तांदोलन करने का सपना देख रहे थे। बुधवार को यह सपना पूरा हो गया। चंद्रयान-३ ने जैसे ही चांद पर ऐतिहासिक ‘कदम’ रखे वैसे ही संपूर्ण भारत में मानो ‘चंद्रोत्सव’ ही मनाया गया। भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के लिए गौरव का क्षण है। इसलिए समस्त ‘इसरो’ परिवार का हम विशेष अभिनंदन करते हैं।

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