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श्री-वास्तव उ-वाच : नाबालिग पायलट

अमिताभ श्रीवास्तव

पायलट की एक उम्र होती है। वैसे भी हमारे देश में १८ साल से कम को नाबालिग माना जाता है और १० साल तो बच्चों की उम्र है। जी हां, जिस उम्र में बच्‍चे खिलौनों से खेलते हैं, उसी उम्र में एमी स्पाइसर विमान से उड़ान भरने के सपने देख रही थी। ७ साल की उम्र में उसने बादलों की सैर शुरू कर दी। जब ८ साल की हुई तो विमान उड़ाने की ट्रेनिंग लेने लगी। फ्लाइंग क्‍लासेस लेनी शुरू कर दी। एमी स्पाइसर आज इलेक्ट्रिक विमान से उड़ान भरनेवाली दुनिया की सबसे कम उम्र की पायलटों में शामिल है। महज १० साल की उम्र में वह काफी देर तक हवा में रहती है। एमी जो विमान चलाती हैं, वह एक घंटे तक उड़ान भर सकता है। एव‍िएशन एक्‍सपर्ट कहते हैं कि वह विमानन के भवि‍ष्‍य को नया आकार दे रही है। एमी जो विमान उड़ाती हैं, उसे पिपिस्ट्रेल अल्फा इलेक्ट्रो नाम से जाना जाता है। पूरी तरह बिजली से चलनेवाला यह इलेक्ट्रिक टू-सीटर प्‍लेन है, जि‍से उड़ाना आसान है। एमी की विमानन यात्रा तब शुरू हुई जब वह महज ढाई साल की थी। मां काइली ने पहली बार उड़ान के बारे में उसकी जिज्ञासा जगाई, और बाद में यही उसका जुनून बन गया। एमी एक मैगजीन भी निकालती हैं, जिसका नाम ‘गर्ल्स वैâन फ्लाई एनीथिंग’ है। वह बताने की कोश‍िश करती हैं कि‍ लड़कियां कुछ भी कर सकती हैं।

पानी पानी हुआ मंगल
तो अब यह जान लीजिए कि मंगल पर पानी है। पानी-पानी हुआ है मंगल। दरअसल, मंगल ग्रह पर पानी की खोज बहुत समय से हो रही है। कई बार पानी मिलने के दावे भी किए गए। साफ तौर पर यह नहीं साबित किया जा सकता है कि मंगल पर पानी कहां और कितना है। हाल ही में हुए नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने विस्तार से पता लगाया है कि मंगल ग्रह पर पानी कहां, वैâसा और कितना है। शोधकर्ताओं का कहना है कि मंगल की भूमध्यरेखा के पास पानी मौजूद है, जो इतनी अधिक मात्रा में है कि पूरे ग्रह को ढक सकता है यानी कि लाखों लोग यहां मौजूद पानी को सदियों तक पी सकते हैं। इस खोज से मंगल पर जीवन होने या रहे होने की संभावना बढ़ गई है। मंगल की भूमध्य रेखा पर मेडॉसे फोसाए फॉर्मेशन इलाके की जमीन के नीचे बहुत ही बड़ी बर्फ की सिल्ली मिली है। यह बर्फ की चट्टान कई किलोमीटर गहरी है और पिघलने पर मंगल की सतह ढक सकती है। इससे बना महासागर डेढ़ से तीन मीटर गहरा होगा। मेडॉसे फोसाए फॉर्मेशन की खोज सबसे पहले साल २००७ में हुई थी, लेकिन उस समय वैज्ञानिकों को नहीं पता था कि वह किससे बना है। यह खोज एक बार फिर साबित करती है कि मंगल ग्रह पर कभी जीवन होने की संभावना जरूर रही होगी। यह पहली बार है कि मंगल की भूमध्य रेखा पर इस तरह से इतना सारा पानी मिला है। स्मिथसन इंस्टीट्यूशन के भूगर्भीय वैज्ञानिक थॉमस वाटर्स का कहना है कि यह खोज मार्स एक्सप्रेस के मार्सिस राडार से मिले नए आंकड़ों के आधार पर की गई है।

अमर है लोहा
क्या आप जानते हैं हमारी पृथ्वी पर लोहा कैसे आया और कैसे यह अमर हो गया यानी कभी नष्ट नहीं होगा? है न दिलचस्प बात। तो आज लोहे पर ही बात करते हैं। दरअसल, एक रिसर्च से पता चला है करीब-करीब साढ़े चार अरब साल पहले जब धरती की उत्‍पत्ति‍ हुई तो इसकी सतह ज्वालमुखी और पिघले हुए चट्टानों से भरी पड़ी थी। ज्वालामुखी के लावे की वजह से लाखों साल तक धरती की बाहरी परत पर गिरा लोहा पिघलता रहा और धीरे-धीरे यह घुलकर धरती के केंद्र में पहुंच गया। यह लोहा उल्‍का पिंडों की बारिश में साथ आया था। अभी धरती में २,८९० किलोमीटर नीचे तक सिर्फ लोहा और मैग्नीशियम का भंडार है। लोहा सबसे भारी तत्वों में से एक है, जिसे परमाणु संलयन द्वारा बनाया जा सकता है, वह प्रक्रिया जो तारों को शक्ति प्रदान करती है। संलयन तब होता है, जब हल्के परमाणु आपस में टूटते हैं और भारी परमाणु बनाते हैं। हेमेटाइट चट्टानों और मिट्टी में व्यापक रूप से पाया जानेवाला एक सामान्य आयरन ऑक्साइड यौगिक है। यहीं से लोहे का उत्‍पादन शुरू हो गया। इसे ‘बैंडेड आयरन फॉर्मेशन’ के रूप में जाना जाता है तो क्‍या लोहा कभी खत्‍म नहीं होगा? साइंटिस्‍ट्स के मुताबिक, जब तक धरती पर ऑक्‍सीजन है और ऐसी चट्टानें मौजूद हैं, तब तक लोहे का उत्‍पादन होगा। लाखों साल तक अभी इसके खत्‍म होने की कोई संभावना नहीं है।

साड़ी पर मानस
यह सचमुच अद्भुत है। प्रतिभा है और कलाकारी है। अब देखिए न, देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में एक ऐसी अद्भुत साड़ी तैयार हुई है, जिसमें रामचरित मानस के बाल कांड से लेकर उत्तर कांड तक के कई प्रसंगों को चित्रों के जरिए उकेरा गया है। इस साड़ी को तैयार करने में ३ महीने से अधिक का समय लगा है। रामचरित मानस के प्रसंगों पर बनी इस साड़ी पर करीब १,८०० चित्रों के जरिए मानस के सभी ७ कांड के बारे में जानकारी दी गई है। यह अद्भुत साड़ी बाजार में बेचने के लिए नहीं, बल्कि अयोध्या के राम मंदिर में प्रभु श्री राम और माता सीता को अपर्ण करने के लिए बनाई गई है। २२ जनवरी के बाद इसे श्री राम मंदिर जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र को सौंपा जाएगा। दुकानदार विकास ने बताया कि यह साड़ी साढ़े ६ मीटर लंबी है और १२ कारीगरों ने मिलकर इसे तैयार किया है। अपनी खूबियों के कारण प्योर सिल्क की बनी इस साड़ी की कीमत अनमोल बताई जा रही है। विकास की मानें तो ५० रंगों का प्रयोग कर मानस के प्रसंगों का चित्रण इस साड़ी पर किया गया है। इनमें उकेरे गए चित्रों को रामचरित मानस या फिर दूसरी धार्मिक किताबों से लिया गया है। खास बात ये भी है कि इसे बनाते समय शुद्धता और पवित्रता का पूरा ख्याल रखा गया है। साड़ी पर काम करने से पहले कारीगर स्नान करके प्रभु श्री राम का पूजन करते थे और उसके बाद इसे बनाने में जुटते थे।
लेखक ३ दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं व सम सामयिक विषयों के टिप्पणीकर्ता हैं। धारावाहिक तथा डॉक्यूमेंट्री लेखन के साथ इनकी तमाम ऑडियो बुक्स भी रिलीज हो चुकी हैं।

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