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श्री-वास्तव उ-वाच : सैनिटरीलैंड बन गया स्कॉटलैंड

  • अमिताभ श्रीवास्तव

सैनिटरीलैंड बन गया स्कॉटलैंड
यह एक क्रांति है। सफल क्रांति है। विश्वभर में अब तक कोई ऐसा देश नहीं था जिसने महिलाओं की संवेदनाओं, उनकी समस्याओं को गंभीरता से समझा हो। भले अभी भी हर मामलो में न समझा जा सका हो मगर स्कॉटलैंड ने गजब कर दिखाया है। स्कॉटलैंड महिलाओं सैनिटरी सुविधा उपलब्ध कराने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। दूसरी ओर अपने देश समेत दुनिया के कई हिस्सों में पीरियड्स को आज भी टैबू समझा जाता है। अपने यहां कानून बनाने के बाद स्कॉटलैंड के नेताओं ने जोर-शोर से कहा कि उन्होंने अपने देश से पीरियड्स पॉवर्टी को खत्म कर दिया है। पीरियड पॉवर्टी उस स्थिति को कहते हैं, जहां कोई महिला आर्थिक तंगी की वजह से सैनिटरी प्रोडक्ट नहीं खरीद पाती है। एक आंकड़े के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान यूरोप की एक तिहाई महिलाओं ने पीरियड पॉवर्टी का सामना किया। जॉर्ज मैसन यूनिवर्सिटी के एक रिसर्च के मुताबिक कॉलेज जानेवाली १४ प्रतिशत अमेरिकी लड़कियां पीरियड पॉवर्टी की शिकार थीं। स्कॉटलैंड की इस प्रगति पर विश्व नतमस्तक है।
बासी नहीं होता ये पेड़ा
मिठाइयों में पेड़ा एक प्रकार को मिठाई है और कोई भी मिठाई हो ज्यादा समय तक रखी नहीं जा सकती। बासी भी हो जाती है और खराब भी। मगर कृष्ण की नगरी में ऐसा नहीं होता। दुनियाभर में मशहूर मथुरा का पेड़ा ऐसे ही थोड़ी न हो गया। इस पेड़े की आखिर क्या खासियत है? वृंदावन में सबसे पुरानी पेड़े की दुकान राधे श्याम हलवाई की है। १९२१ में उन्होंने पेड़ा बनाने का काम शुरू किया। दुकान के मालिक ने गौरव अग्रवाल कहते हैं, ‘मथुरा के पेड़े की एक खासियत है कि इन्हें बनाने के लिए दूध को तब तक पकाया जाता है, जब तक कि वो लाल न पड़ जाए। इसके दो फायदे होते हैं। पहला पेड़े का स्वाद बढ़ जाता है। दूसरा पेड़ा ५० से ६० दिनों तक खराब नहीं होता। तीन प्रकार के होते हैं ये पेड़े। इलायची, पिस्ता और मलाई पेड़ा। मलाई पेड़ा भगवान कृष्ण को चढ़ाए जाने वाले छप्पन भोग का मुख्य हिस्सा है। यह पेड़ा जन्माष्टमी में खास तौर पर तैयार किया जाता है। इसे बनाने में केवल मावा और मलाई का प्रयोग होता है। इसका रंग सफेद  होता है और इसका दाम भी दूसरे पेड़ों से ज्यादा रहता है। तो कभी स्वाद लीजिए मथुरा के पेड़ों का।
स्पेस में ढूंढा जा रहा बुढ़ापे का तोड़
क्या मनुष्य जवान ही बना रह सकता है? नहीं, ऐसा कभी होता है क्या? कभी हो ही नहीं सकता। मगर वैज्ञानिक सतत अध्ययनरत हैं बुढ़ापे का तोड़ ढूंढने में। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से ४०० किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) में बुढ़ापा घटाने का तोड़ ढूंढा जा रहा है। इसमें बैठे वैज्ञानिक इस विषय पर शोध कर रहे हैं कि क्या माइक्रो ग्रेविटी में रहते हुए बुढ़ापे को धीमा या कम किया जा सकता है। इसके लिए ऊत्तकों को बनाती कोशिकाओं पर माइक्रो ग्रेविटी के असर का अध्ययन किया जा रहा है। यह अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) अंतरिक्ष में कल शुक्रवार से घूमता नजर आ रहा है। आईएसएस आज यानी २० अगस्त को छोड़कर आगामी दिनों में २७ अगस्त तक दिखेगा। यह स्टेशन शिमला से एक चमकीले तारे की तरह चलता हुआ नजर आएगा।
मुर्गे का मारा ये परिवार
क्या कभी सोच सकते हैं कि कोई मुर्गा भी आपको न केवल परेशान कर सकता है, बल्कि उसको लेकर आप अदालत तक चले जाते हैं। ऐसा है भी। जर्मनी के बेड सल्ज़ुफ्लेन में रहनेवाले बुजुर्ग जोड़े की दिक्कत ये है कि उन्हें पड़ोसी का मुर्गा दिन में किसी भी वक्त चैन से बैठने नहीं देता और सुबह-सुबह ही बांग देकर जगा देता है। पश्चिमी जर्मनी के रहनेवाले ७६ साल के बुजुर्ग प्रâीडरिच विलहेम और उनकी पत्नी जुता की शिकायत है कि उन्होंने लंबे वक्त से अपने ही घर में सुकून का एक दिन नहीं बिताया है। इसकी वजह है उनके पड़ोसी का पाला हुआ मुर्गा। वो रोजाना सुबह करीब ८ बजे से बांग देना शुरू कर देता है और उसका ये सिलसिला तब तक खत्म नहीं होता, जब तक सूरज ढल न जाए। माग्दा नाम के इस मुर्गे को उसके मालिक बाकी मुर्गे-मुर्गियों का साथ ही बंद करके रखते हैं। बुजुर्ग दंपती ने इस मामले पर उनके बातचीत कर हल निकालने की कोशिश की लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। आखिरकार उन्होंने मामला कोर्ट तक पहुंचा दिया। मुर्गे की बांग ८० डेसिबल से भी ऊपर है, जो आमतौर पर व्यस्त सड़क का शोर होता है। उसकी वजह से कई पड़ोसी घर छोड़कर जा चुके हैं।

लेखक सम सामयिक विषयों के टिप्पणीकर्ता हैं। ३ दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं व दूरदर्शन धारावाहिक तथा डाक्यूमेंट्री लेखन के साथ इनकी तमाम ऑडियो बुक्स भी रिलीज हो चुकी हैं।

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