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श्रीवास्तव उवाच: रंगीली मछली

अमिताभ श्रीवास्तव।  प्रकृति अद्भुत है। निराली है और उसका कोई पार नहीं है। यहां हर वो चीज उपलब्ध है, जो कल्पना से परे है। कभी तो ढूंढ़ी जाती हैं ऐसी चीजें और कभी अचानक से सामने आ जाती हैं, जो हैरान कर देती है। अब देखिए न प्रकृति का ये खूबसूरत उपहार। उसकी रचना दुनिया की सबसे रंग-बिरंगी मछली मिली है, जिसे देखकर आंखों पर विश्वास न हो या सोचने में आए कि विधाता ने किस धैर्य के साथ बैठकर उसमें रंग भरे हैं? जी हां, इसे दुनिया की सबसे रंगीन मछली यानी मल्टीकलर्ड फिश माना गया है। इस मछली के शरीर में लगभग सारे रंग हैं। इसे मालदीव के समुद्र में देखा गया। पहले इस मछली के रंगों को देखकर वैज्ञानिक न केवल अचंभित हुए बल्कि कंफ्यूज भी रहे। मगर बाद में जाना गया कि ये रंगीन प्रजाति की एक अलग किस्म की मछली है। इसे जहां इंद्रधनुषी मछली कह रहे हैं, वहीं इसे नाम दिया गया है `रोज विल्ड फेरी रासे’। इसकी प्रजाति का नाम है `सिल्हिलेब्रेस फिनिफेनमा’। ये मूंगा पत्थरों के बीच में रहती है। है न कमाल अपनी इस प्रकृति का।
बदले की आग
मानवीय मस्तिष्क कैसा है? जिसमें यदि कोई शैतानी या राक्षसी प्रवृत्ति हावी हो जाए तो आसानी से नहीं छूटती। अब देखिए न इसका एक ऐसा काला पन्ना, जो इंसानी फितरत का हवाला देता है। किसी अपमान को अपने दिमाग में आदमी कब तक बसाए रखता है? अधिकतर भूल जाते या नजरअंदाज कर देते समय के साथ-साथ मगर, जब ऐसा नहीं होता तो वो बड़े वीभत्स रूप में सामने आता है। ऐसी ही एक घटना हुई बेल्जियम में। तब वो बच्चा था। बताइए स्कूल के दिनों में टीचर द्वारा मिली सजा को कोई बच्चा इस तरह भी दिल पर ले लेगा कि तीस साल बाद खौफनाक बदला ले ले। बेल्जियम में एक व्यक्ति ने तीस साल बाद अपने शिक्षक से बदला लेते हुए उनकी चाकुओं से गोद-गोदकर हत्या कर डाली। आरोपी ने शिक्षक पर सौ से अधिक बार वार किया और तब तक किया, जब तक वो मौत के मुंह में न चले गए। करीब दो साल बाद आरोपी स्टूडेंट ने स्वीकार किया है कि बचपन में उसके शिक्षक ने अपमानित किया था, उस अपमान का बदला उसने लिया है। है न मस्तिष्क का काला हिस्सा।
बिच्छू होली
हमारे देश के पर्व और परंपराएं अद्भुत हैं। अनोखी हैं और कुछ तो ऐसी कि दांतों तले उंगली दबा ली जाए। होली के पर्व पर जहां लठमार होली होती है वहीं जूते-चप्पलों, पत्थरमार होली भी होती है, किंतु क्या आपने सुना है कि बिच्छू होली भी होती है? ये इस बार ही खबर लगी कि इटावा के एक गांव में लोग बिच्छू के साथ होली खेलते हैं। अपने आप में ही रोचक है ये खबर। इटावा में एक गांव है सौथना। यहां भैसान टीले पर होली के दिन एक साथ कई बिच्छू निकलते हैं। गजब बात यह कि एक बिच्छू देख कोई भी डर जाए मगर, यहां जुटने वाले लोग इतने सारे बिच्छू देख खुश होते हैं। बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक इन बिच्छुओं को अपने शरीर पर छोड़कर खेलते हैं। बड़ी बात यह कि ये डंक भी नहीं मारते। यहां आकर एक बात और सोचने को मजबूर कर देती है कि क्या बिच्छू संगीत प्रेमी होते हैं? दरअसल, इस टीले पर फाग के साथ ढोलक की थाप गूंजते ही बिच्छू बाहर निकलने शुरू होते हैं। विज्ञान के युग में यह दृश्य आश्चर्यचकित करता है। गांव वाले बताते हैं, यह प्रथा वर्षों पुरानी है। है न अजीब।
पहल जो पेड़ बचाए
अपनी तरह का यह एक ऐसा प्रयास माना जा सकता है, जो यदि बड़े पैमाने पर प्रारंभ हो जाए तो यकीनन हम पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा काम कर सकते हैं। पेड़ बचाना और ज्यादा से ज्यादा लगाना ये आज की जरूरत है और इसके लिए फिलहाल केंद्रीय स्कूल के कुछ ऐसे प्रोग्राम हैं, जो निस्संदेह पर्यावरण बचाओ आंदोलन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ ऐसी ही समस्या को सुलझाने के लिए केंद्रीय विद्यालयों में इन दिनों पुस्तकोपहार उत्सव का आयोजन चल रहा है। इसमें शिक्षक बच्चों से अपील कर रहे हैं कि वह जिस कक्षा में उत्तीर्ण हो चुके हैं, उस कक्षा की पुस्तकें पुस्तकालय में जमा करें, ताकि इन पुस्तकों को दूसरे बच्चे इस्तेमाल कर सकें। खासकर ऐसे अभिभावक जो कि बच्चों की किताबें नहीं खरीद पाते हैं, उनके लिए ये पुस्तकें उपयोगी हो सकती हैं। इस पहल से हम कागज बचा सकेंगे और पेड़ कटने से भी बचा पाएंगे। स्कूल ने अपील पत्र भी लिखा है और पुस्तकों के उपयोग पर जोर दिया है। बच्चे भी सहभागी होते हैं और खासकर उनके अभिभावकों का भी साथ मिल जाए तो बहुत बड़ा लाभ संभव है पर्यावरण के लिए।

लेखक सम सामयिक विषयों के टिप्पणीकर्ता हैं। ३ दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं व दूरदर्शन धारावाहिक तथा डाक्यूमेंट्री लेखन के साथ इनकी तमाम ऑडियो बुक्स भी रिलीज हो चुकी हैं।

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