मुख्यपृष्ठस्तंभद्वेष की राजनीति बंद करो.... केंद्र की जांच लोकतंत्र पर आंच

द्वेष की राजनीति बंद करो…. केंद्र की जांच लोकतंत्र पर आंच

कविता श्रीवास्तव। कांग्रेसी नेता राहुल गांधी पिछले दो दिनों से समाचारों में छाए हुए हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) उनसे नेशनल हेराल्ड मामले में पूछताछ कर रहा है। हालांकि इसी मामले में राहुल गांधी और सोनिया गांधी से कुछ साल पहले पूछताछ हो चुकी है। तब इन दोनों के खिलाफ ईडी को कोई सबूत नहीं मिला था, परंतु उसी फाइल को फिर खोल कर पुन: जांच के लिए बुलाया गया है। यह केंद्र सरकार के दबाव में हो रहा है, ऐसा कांग्रेस को लगा। कांग्रेसियों के क्रोध के लिए इतना ही पर्याप्त था। इसी वजह से परसों राहुल गांधी की पेशी के दिन देश के तमाम राज्यों और शहरों में कांग्रेस ने शांति मार्च और सत्याग्रह मार्च के माध्यम से अपना तगड़ा विरोध जताया। नई दिल्ली में जमकर हंगामा हुआ। हालांकि राहुल गांधी जिम्मेदार नेता हैं इसलिए वे पैदल ही चलकर निर्धारित समय पर ईडी कार्यालय में पेश हुए और उन्होंने सवालों का जवाब दिया। वे जांच से पीछे नहीं हटे।
उल्लेखनीय है कि हमारी जांच एजेंसियां आपराधिक मामलों की जांच करके देश हित में सच सामने लाने का काम करती हैं। उन्हें खोजबीन व पूछताछ करने, हिरासत में लेने, जेल में डालने और आरोपी बनाकर अदालत तक पहुंचाने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन उन्हें अदालत में सबूतों के साथ आरोप को सिद्ध भी करना होता है। उस पर आरोपित पक्ष की बचाव की दलीलें सुनने के बाद अंतिम न्याय देना अदालत का काम है। यह सामान्य प्रक्रिया है। कोई व्यक्ति अपराधी है या नहीं, यह अदालत का पैâसला तय करता है। उससे पहले व्यक्ति अपराधी नहीं, केवल आरोपी रहता है। जरूरी नहीं है कि हर आरोप सही हो। लोग दुर्भावना और दुश्मनी के कारण भी दूसरे पर आरोप लगाते हैं। लेकिन राजनीति में किसी पर भी आरोप लगाना आम बात हो गई है। राजनीति में यह बहुत ही साधारण बात है। पक्ष-प्रतिपक्ष में प्राय: आरोप-प्रत्यारोप चलते ही रहते हैं लेकिन पिछले कुछ अर्से से राजनीतिक आरोप के साथ-साथ केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का विषय भी उठने लगा है। क्या केंद्रीय जांच एजेंसियां सरकार के इशारे पर विपक्ष के नेताओं को निशाना बना रही हैं? यह सवाल लंबे अर्से से चर्चा में है। केंद्र सरकार के अधीन कार्यरत प्रवर्तन निदेशालय (इनफोर्समेंट डायरेक्टरेट या ईडी), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) व अन्य ने कई मामलों में जिन राजनेताओं पर कार्रवाइयां शुरू की हैं, उनमें अधिकांश सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के विरोधी दलों से हैं। इनमें कई गिरफ्तारियां भी हुई हैं। इन दिनों ईडी कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी और राहुल गांधी से पूछताछ की प्रक्रिया में है। नेशनल हेराल्ड से जुड़े मामले की फाइल को न जाने क्यों फिर से खोला गया है। इसे तानाशाही और जुल्म बताते हुए कांग्रेसियों ने नई दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय से ईडी कार्यालय तक जबर्दस्त शांति मार्च निकाला। इसमें कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों, सांसदों, विधायकों व कार्यकर्ताओं सहित ढेर सारे लोगों ने शामिल होकर केंद्र के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। कल पूरे देश में कांग्रेसियों ने सड़कों पर निकल कर इसी तरह का सत्याग्रह किया और दिनभर सरगर्मी बनाए रखा। कई गिरफ्तारियां भी हुर्इं। इस पर अपनी प्रतिक्रिया में फिर एक बार भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता, नेता और केंद्रीय मंत्रियों ने भी बयान शुरू कर दिए। इन लोगों ने कांग्रेस और उनके प्रमुख नेता पर सीधे आरोप लगाए। यदि जांच एजेंसी अपना काम कर रही है तो सत्ता पक्ष को ऐसे राजनीतिक बयान से बचना चाहिए था। जवाब में कांग्रेसियों ने भी कहा कि वे जांच से डरते नहीं। खुद भाजपा जब डरती है तो पुलिस को आगे करती है। कांग्रेसियों ने कहा कि भाजपा अपने एक प्रवक्ता के विवादित बयान से दुनियाभर में हुई किरकिरी से डरी हुई है। इसलिए वह ध्यान भटकाने का काम कर रही है। कांग्रेसियों ने कहा है कि भाजपा जब विपक्ष में थी तब उसने कांग्रेस और गांधी परिवार पर आरोपों की झड़ी लगाकर देश में एक माहौल बनाया। २०१४ में उसी तेवर के दम पर सत्ता भी हासिल कर लिया। २०१९ में सत्ता में दोबारा वापसी की। अनेक राज्यों में भी सत्ता पा ली। कांग्रेस सत्ता से बहुत दूर हो गई लेकिन डरी हुई भाजपा आज भी कांग्रेस को कोसने और गांधी परिवार पर छींटें कसने की कोई कसर नहीं छोड़ती है। गांधी परिवार की ओर से कोई प्रतिकार या प्रतिक्रिया न आने पर भी वे अपनी छींटाकसी लगातार जारी रखते हैं। कांग्रेस जब भी महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक भेदभाव की समस्या पर आवाज उठाती है तब भाजपा के लोग गांधी परिवार को घेर लेते हैं। देश की मूल समस्याओं को एकतरफ रखकर कोई अन्य मुद्दा उठाते हैं। बाकी का काम इनके समर्थक चैनल शुरू कर देते हैं। आज राबर्ट वाड्रा भी सामने आए और कहा कि आज सड़कों पर कांग्रेसियों के साथ आम नागरिकों का गुस्सा भी दिखा। आम लोग भी महंगाई और बेरोजगारी से परेशान हैं। उन्हें समझ में आया कि उनकी समस्याओं को लेकर कांग्रेस ही सड़कों पर उतर सकती है। लोगों को बदलाव का आधार चाहिए। कांग्रेस देश के लिए लड़ेगी। उन्होंने कहा कि देश की मूल समस्याओं पर आवाज उठाना ही होगा।
यदि समस्याओं के संदर्भ में व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो आज देश में हालात सामान्य नहीं हैं। कई शहरों में पत्थरबाजी, आगजनी और हिंसा की घटनाएं हो रही हैं। हनुमान चालीसा और लाउडस्पीकर पर विवाद हो रहे हैं। ज्ञानवापी को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है। केंद्र द्वारा जांच एजेंसियों के दुरुपयोग को लेकर भी तगड़ा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है। महंगाई बेलगाम होती जा रही है। रुपए का मूल्य लगातार गिरता जा रहा है। बेरोजगारी बढ़ती ही जा रही है। सरकारी संस्थानों का निजीकरण लगातार होता जा रहा है। कश्मीरी पंडितों की हत्या हो रही है। आतंकवाद खत्म नहीं हो रहा है। इन तमाम परिस्थितियों में विपक्ष यदि आम लोगों के दर्द पर कुछ कहना चाहता है तो केंद्र की तगड़ी भूमिका विपक्ष को दबाने पर होती है, इसीलिए उस पर निरंकुशता बरतने और प्रतिपक्ष की आवाज को कुचलने जैसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में केंद्र की ओर से जांच एजेंसियों को सक्रिय करने का दबाव दिखाकर और लालच देकर विधायकों को खरीदा गया, ऐसे आरोप भी लगाए गए हैं। सवाल है कि अब इनकी जांच कौन करेगा?
ध्यान रहे कि स्वस्थ लोकतंत्र में पक्ष-प्रतिपक्ष दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। निर्णय भले ही शासन पक्ष ले परंतु आम जनता के हितों के लिए दोनों पक्षों की बातों पर गौर करना पड़ता है। सामाजिक और आर्थिक न्याय सबको मिले, ऐसी व्यवस्था बनानी पड़ती है। यह सुनिश्चित करना होता है कि सबको सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक स्वतंत्रता हो। सब मिलकर ही देश को आधुनिकता, विकास और समृद्धि की ओर आगे बढ़ाते हैं। पक्ष निर्णायक भूमिका निभाए। लेकिन प्रतिपक्ष की सलाह, आलोचना और आपत्ति पर भी सकारात्मक विचार हो। स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र में आरंभिक काल में यह हुआ। अधिकांश आम लोग राजनीति से दूर रहे। नागरिकों ने राजनेताओं पर भरोसा किया। उनको सम्मान दिया लेकिन बाद में हालात बदलते गए। आम लोगों की अपेक्षाओं पर अधिकांश राजनेता उतने खरे नहीं उतरे जितनी उम्मीद थी। पहले राजनीति पूर्णत: समाजसेवा थी। लेकिन राजनीति में ढेर सारे अपराधी और लालची लोग भी घुस आए। केवल सत्ता पाना ही उनका लक्ष्य हो गया है। फिर भी लोकसेवा को समर्पित लोग अपना काम कर रहे हैं, पर किसी का एकछत्र शासन हो जाए और वह तानाशाह और निरंकुश हो जाए तो लोकतंत्र पर खतरा मंडराने लगता है। इससे बचा जाए, ऐसा आज के राजनीतिक वातावरण में दिखना भी चाहिए। किसी ने कुछ गलत किया है तो कानून उस पर कार्रवाई अवश्य करे। लेकिन कोई केवल इसलिए शिकार न बनाया जाए क्योंकि वह सत्ताधारियों का प्रतिपक्ष है। इसलिए द्वेष की राजनीति बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। कोई यदि नाहक फंसाया गया तो यही समझा जाएगा कि बहुमत के दम पर आए सत्ताधारियों पर अहंकार हावी हो गया है। ऐसा होना लोकतंत्र और आम नागरिकों के हित में नहीं।

(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

अन्य समाचार