मुख्यपृष्ठनए समाचारलोगों के हक के लिए ५३ वर्षों से कर रहे हैं संघर्ष

लोगों के हक के लिए ५३ वर्षों से कर रहे हैं संघर्ष

अनिल मिश्रा 

उल्हासनगर में सच्चे, नि:स्वार्थ, निडर समाज के प्रहरी कहे जाने वाले चंद्रकांत मिश्रा, जो लोगों को उनके घरों का मालिकाना हक दिलाने के लिए पिछले ५३ वर्षों से प्रशासन से लड़ रहे हैं। वयोवृद्ध चंद्रकांत मिश्रा उल्हासनगर को वैâसे उल्हास बनाया जाए, इस बात को लेकर अक्सर प्रशासन से सुझाव व शिकायतें करते रहते हैं। उल्हासनगर की जनता से योजनाओं के नाम पर टैक्स लिया जाता है लेकिन योजना को पूरा करने से पहले लूटखसोट मच जाती है। उल्हासनगर में शहर के नेता-अधिकारियों की सह पर अवैध निर्माण शुरू है। परिवहन समिति द्वारा करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं लेकिन परिवहन सेवा नदारद है। चंद्रकांत मिश्रा कहते हैं कि उनकी पारिवारिक स्थिति सुदृढ़ थी। पिता रामखेलावन मिश्रा स्वतंत्रता सेनानी थे। दादा श्याम बिहारी मिश्रा मुंबई में अच्छे पद पर कार्यरत थे। चंद्रकांत मिश्रा १२ वीं तक विज्ञान से पढ़ने के बाद पढ़ाई छोड़कर एक ज्वेलरी कंपनी में सेल्स मैनेजर का काम किया। उसके बाद सेंचुरी रेयान (शहाड) में दो साल तक नौकरी करके छोड़ दिया। इसके बाद किरण मिल (ठाणे) में भी काम किया। दीघा परिसर की बिरला की बल्वंâलभ टेक्सटाइल मिल में लेबर ऑफिसर के पद पर उन्होंने काम किया। चंद्रकांत मिश्रा ने लेबर को-ऑपरेटिव सोसायटी बनाकर कई इमारतों का भी निर्माण कराया। उल्हासनगर में शहीद चंद्रशेखर आजाद क्रांतिकारी के नाम से हिंदी विद्यालय की स्थापना की। साल १९८० में मराठी, सिंधी समाज में बढ़ते क्लेश को लेकर हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख माननीय बालासाहेब के साथ भी बैठक कर चुके हैं। चंद्रकांत मिश्रा बताते हैं कि १९७० में उल्हास नागरिक समिति के बाद फिर सर्वदलीय संघर्ष समिति के मार्फत उल्हासनगर सिंधी और गैर सिंधी समाज के बीच के बढ़ते भेदभाव को मिटाया। यहां मनपा विद्यालय की पढ़ाई रामभरोसे हैं। शहर में पार्किंग की सुविधा नहीं है। पार्किंग की जगह पर अतिक्रमण किया गया है। उल्हासनगर में विकास की रूपरेखा (टीपी) दिखावटी हैं। उल्हासनगर में सड़क, पार्किंग, लाइट की दशा बद से बदतर है। उल्हासनगर के अधिकांश गरीब झोपड़पट्टी में रहने वाले लोगो को उनके मकान का मालिकाना हक नहीं है। चंद्रकांत मिश्रा ने शहर की झोपड़पट्टी की बुनियादी समस्याओं जैसे पानी, लाइट, सड़क से समाज को निजात दिलाई। एक उत्तर भारतीय होने के नाते उत्तर भारतीय समाज में इनका खास बोलबाला है। लेकिन अपने सामजिक कार्यों की वजह से ये केवल उत्तर भारतीयों ही नहीं बल्कि हर जाति-धर्म के बीच काफी लोकप्रिय हैं। आज ७७ वर्ष यानी जीवन के ढलान की तरफ होने के बावजूद समाजसेवा के लिए तत्पर रहते हैं। पत्रकार, समाजसेवक, राजनीतिक लोग अपनी हर समस्या को लेकर उनसे सलाह लेने पहुंचते रहते हैं। चंद्रकांत मिश्रा को उल्हासनगर के लोग सच्चा समाज का सिपाही मानते हैं।

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