मुख्यपृष्ठस्तंभसटायर : एक जूते से मेरा क्या होगा

सटायर : एक जूते से मेरा क्या होगा

डॉ. रवींद्र कुमार
चप्पल-जूते अभी तक सदन में चला करते थे, भले ही मुहावरों में ही सही, अब वे सदन के बाहर भी आ पहुंचे हैं। नेताओं को यह गम हो सकता है कि मारनेवाले एक ही जूता क्यूं फेंक के मारते हैं। दोनों तो मारें। ताकि इन्हें यूज किया जा सके अथवा बेचा जा सके। इस तरह कुछ और पैसा बनाया जा सकता है। नेताओं को यह रंज भी हो सकता है कि अमुक नेता को तो महंगे वाले जूते फेंक कर मारे और मुझे बस सस्ते से देसी जूते में ही निपटा दिया। यह तो सरासर अपमान है। आप जानते ही हैं नेता का अपमान देश का/प्रांत का,समाज का, जाित का अपमान होता है अत: वह जूते में भी अगला चुनाव जीतने की संभावना आंकने लगता है।
लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता होती है सभी ‘लोक’ एक दूसरे को गाली देने को अपना अधिकार और कर्तव्य दोनों समझते हैं।
नेता कह सकता है ‘भला एक जूते से मेरा क्या होगा।’ यह जितने हजार करोड़ का घपला, स्कैम है, कम से कम जूते उस अनुसार तो हों। कुछ तो अनुपात होना चाहिए, ये क्या कि हजारों करोड़ का स्कैम और महज एक जूता। वह भी लगे, लगे, न लगे। यह तो सरासर बेइंसाफी है। नहीं, ऐसे नहीं चलेगा।
हिंदुस्थान में बुद्धिजीवी बहुत इफरात में पाए जाते हैं। गरीबों ने चने, पकौड़े बेच अपने बच्चे पढ़ाये ताकि उनमें शैक्षिक योग्यता के साथ-साथ बुद्धि आ जाए। उन्हें क्या पता था इतनी बुद्धि आ जाएगी कि वे बुद्धिमान बनने की बजाय बुद्धिजीवी बन जाएंगे। नतीजा? नतीजा आपके सामने है, नौकरी है नहीं और उन्होंने चने,पकौड़े बेचने से कतई इनकार कर दिया है।
न खुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनम
बस तो भाऊ ! इसी तर्ज पर, न वे चने, पकौड़े बेचने वाले ही बन पाये न नौकरी–पेशा। मेरे भारत महान को खतरा हमेशा पढ़े-लिखे लोगों से रहा है। गरीब तो भगवान से, समाज से, गोत्र से, खप से, ‘लोग क्या कहेंगे’ से और अपनी अंतरात्मा से २४ घंटे,१४४० मिनट और ८६४०० सेकंड डरता है। त्याला सतत् भीति वाटते ! यह पढ़ा-लिखा जीव, बिंदास होता है। वह हर घोटाले, हर दलाली, हर जालसाजी को कर गुजरने को आतुर है और बच निकलने का माद्दा रखता है, जिसे आप मातृभूमि कहते हैं उसके लिए वो महज एक प्लॉट है, जिसको घेरा जा सकता है, कागजों में हेर-फेर कर एफ. एस. आई. बढ़वाई जा सकती है। मल्टीस्टोरी मॉल बनाये जा सकते हैं, फ्लोर के फ्लोर बेनामी बेचे जा सकते हैं। घोटाले पढ़े-लिखे, ओहदे दार लोग करते हैं। गरीब, अनपढ़, सामान्य जन तो आज भी दूसरे गरीब, अनपढ़, सिम्पल लोगों की मदद को तैयार रहते हैं। वे उन्हें सड़क के किनारे देख कर नाक-भों नहीं सिकोड़ते। हाउ डर्टी कह कर मुंह नहीं फेरते। ना यह कहते हैं ‘दिस कंट्री इज गोइंग/गॉन टू डॉग्स’
मुझे सुन कर दुख: हुआ, ना जाने कौन फैला रहा है कि जूता-वीर पागल है विक्षिप्त है. अरे भले- मानुषो! इस १४० करोड़ के मेरे भारत महान में एक वो ही तो बंदा बहादुर है, बुद्धिमान है। हमारे पास तो जूते भी नहीं। हवाई चप्पल है जो संभाल कर रखी है अपनी हवाई उड़ान के लिए।

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